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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 353 में से

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पृष्ठ 170

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142 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् हे पुत्रों! तुम मेरे पितरों को अनेक प्रकार के उत्तम रस, सुख प्राप्त करने वाले स्वादिष्ट जल, सभी व्याधियों की नाशक औषधि, मिष्ठानादि पदार्थ, दूध, घी, उत्तम विधि से पकाया गया अन्न तथा रस से परिपूर्ण फल प्रदान करके तृप्त करो। अग्निहोत्र एवं चातुर्मास्य यज्ञ :- तीसरा अध्याय अग्निहोत्र तथा चातुर्मास्य यज्ञ का विवरण प्रस्तुत करता है। अग्नि की स्थापना एवं प्रतिदिन प्रातः एवं सायं यज्ञ का सम्पादन 'अग्निहोत्र' कहलाता है। इस अध्याय की प्रथम ऋचा में ही अग्निहोत्र के सम्पादन का उपदेश दिया गया है। इसी अध्याय में चातुर्मास्य यज्ञ से सम्बन्धित मन्त्रों में याजक प्रार्थना करता है- इन्धा॑नास्त्वा श॒तमिं॑ हिमा॑ द्यु॒मन्त॒ समि॑धीमहि। वय॑स्वन्तो वय॒स्कृतँ॑ सह॑स्वन्तः सह॒स्कृतम्। अग्ने॑ सपत्न॒दम्भ॑नमदब्धासो अदा॒भ्यम्। चि॒त्राव॑सो स्व॒स्ति ते॑ पारम॑शीय॥ (३/१८) हे अग्निदेवता! आप अनन्त प्रकाश वाले, तेजस्वी, शत्रुविनाशक, सहनशील, आश्चर्यरूप धनसम्पन्न एवं अहिंसक हैं। सौ वर्षों तक आपको प्रकाशित करते हुए, अग्निहोत्रादि करते हुए, हम भी पूर्ण आयु वाले, शक्तिसम्पन्न एवं अदब्ध, अविजेय बने रहें। हे परमेश्वर! हमें पाप से दूर करो। हमारा जीवन मङ्गलमय बने। जो यज्ञ प्रत्येक चार मास के पश्चात् किया जाता है, वह 'चातुर्मास्य' यज्ञ कहलाता है। इसके लिए धनधान्य से परिपूर्ण गृहस्थाश्रम की आवश्यकता होती है। सोमयाग :- सोमयगों का वर्णन चतुर्थ से लेकर अष्टम अध्याय तक उपलब्ध होता है। अग्निष्टोम के प्रकृतियाग होने से विस्तृत विवेचन किया गया है। इन यज्ञों में सोम को पत्थरों से कूटकर, रस निकाल कर दूध में मिलाया जाता है। उससे प्रातः काल, मध्याह्न तथा सांयकाल अग्नि से हवन किया जाता है। इसकी 'सवन' संज्ञा है जो तीनों कालों के अनुसार विभिन्न संज्ञाओं से प्रसिद्ध है। सोम यागों का उद्देश्य जीवन को संयत क्रम में बाँधना है। इनसे हमारे संकल्पों को शक्ति प्रदान होती है। सोमरस तो शारीरिक शक्ति को प्राण देता है तो मानसिक शक्ति को ऋक्-यजु-साम का ज्ञान भी प्रदान करता है। वाजपेययज्ञ :- नवम अध्याय का सम्बन्ध 'वाजपेय यज्ञ' से है। 'एकाह' अर्थात् एक दिन में समाप्त सोमयागों में 'वाजपेय' अन्यतम है। याजक अन्न, बल, ज्ञान अथवा किसी भी प्रकार की शक्ति ग्रहण करना चाहता है तो उसको इन सबको

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar