भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 141 जो अन्य विषय इसमें निरूपित हैं— (१) अग्निवेदी का निर्माण, (२) मन की महिमा, (३) प्रहेलिकाएँ, (४) देवों की विविध उपाधियाँ आदि। २६ अध्याय से २९ अध्याय तक खिलसूक्त तथा ४०वाँ अध्याय ईशावास्योपनिषद् है। इन सबका विस्तृत विवरण निम्नलिखित है— दर्शयज्ञ :- दर्शयज्ञ से सम्बन्धित मन्त्रों का विन्यास प्रथम अध्याय में मिलता है। वस्तुतः दर्श, अमावस्या है जिसमें रात्रि में आकाश में चन्द्र दर्शन नहीं होता। अतः पृथ्वीवासी चन्द्र अदर्शन से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिए ही ज्योत्सना की कामना करते हैं। यह दोष सविता दूर कर सकता है तथा शीतलता प्रदान करने की शक्ति जल में है। औषधियाँ चन्द्रमा द्वारा पोषित होती हैं। दर्श-यज्ञ इन सबको भोज्य पदार्थ प्रदान करता है। यही संक्षेप में दर्श-यज्ञ का विषय है। प्रथम अध्याय के अन्तिम मन्त्रों में देव यज्ञ की ओर संकेत किया गया है— स॒वि॒तुस्त्वा॑ प्र॒सव॑ उत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॑:। तेजो॑ऽसि शु॒क्रम॑स्य॒मृत॑मसि॒ धाम॒ नामा॑सि प्रि॒यं दे॒वाना॒मना॑धृष्टं देव॒यज॑नमसि।। (यजु० १/३१) अर्थात् जो यज्ञ परमेश्वर द्वारा उत्पन्न किए गए विश्व में सदैव पवित्र एवं प्रकाशवान् सूर्य की रश्मियों के साथ मिलकर समस्त पदार्थों को शुद्ध करता है, वह यज्ञ, यज्ञकर्ता को उत्कृष्टता के साथ पवित्र करता है। हे ब्रह्मन्! जिस कारण आप स्वयं प्रकाशवान् शुक्र नाशरहित समस्त पदार्थों के आधार वन्दनीय विद्वानों के प्रीतिकारक एव अन्य विद्वानों के पूज्य हैं, इससे मैं आपका ही आश्रय करता हूँ। पौर्णमास-यज्ञ :- पौर्णमास-यज्ञ विषयक मन्त्रों का संग्रह द्वितीय अध्याय में प्राप्त होता है। यह यज्ञ पूर्णमासी से सम्बन्धित है। द्वितीय अध्याय के प्रथम मन्त्रों में पूर्णिमा के आकर्षण का संकेत मिलता है। यह संकेत हमें ‘कृष्णोऽसि’ पद से मिलता है। इस अध्याय के अन्तिम मन्त्रों में पितरों का वर्णन है। जो व्यक्ति अपनी स्वार्थ पूर्ति को त्यागकर जनहित के कार्य करते हैं, वे ‘पितर’ होते हैं। मृत्यु के पश्चात् ये चन्द्रलोक के वासी बनते हैं। पितरों को किन पदार्थों से सत्कार करना चाहिए, इस विषय में निम्नलिखित मन्त्र में उपदेश निहित है— ऊर्जं॒ वह॑न्तीर॒मृतं॑ घृ॒तं पय॑: की॒लालं॑ प॒रिस्रु॒तम्। स्व॒धा स्थ॑ त॒र्पय॑त मे पि॒तॄन्।। (यजु० २/३४) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar