वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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142 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् हे पुत्रों! तुम मेरे पितरों को अनेक प्रकार के उत्तम रस, सुख प्राप्त करने वाले स्वादिष्ट जल, सभी व्याधियों की नाशक औषधि, मिष्ठानादि पदार्थ, दूध, घी, उत्तम विधि से पकाया गया अन्न तथा रस से परिपूर्ण फल प्रदान करके तृप्त करो। अग्निहोत्र एवं चातुर्मास्य यज्ञ :- तीसरा अध्याय अग्निहोत्र तथा चातुर्मास्य यज्ञ का विवरण प्रस्तुत करता है। अग्नि की स्थापना एवं प्रतिदिन प्रातः एवं सायं यज्ञ का सम्पादन 'अग्निहोत्र' कहलाता है। इस अध्याय की प्रथम ऋचा में ही अग्निहोत्र के सम्पादन का उपदेश दिया गया है। इसी अध्याय में चातुर्मास्य यज्ञ से सम्बन्धित मन्त्रों में याजक प्रार्थना करता है- इन्धा॑नास्त्वा श॒तमिं॑ हिमा॑ द्यु॒मन्त॒ समि॑धीमहि। वय॑स्वन्तो वय॒स्कृतँ॑ सह॑स्वन्तः सह॒स्कृतम्। अग्ने॑ सपत्न॒दम्भ॑नमदब्धासो अदा॒भ्यम्। चि॒त्राव॑सो स्व॒स्ति ते॑ पारम॑शीय॥ (३/१८) हे अग्निदेवता! आप अनन्त प्रकाश वाले, तेजस्वी, शत्रुविनाशक, सहनशील, आश्चर्यरूप धनसम्पन्न एवं अहिंसक हैं। सौ वर्षों तक आपको प्रकाशित करते हुए, अग्निहोत्रादि करते हुए, हम भी पूर्ण आयु वाले, शक्तिसम्पन्न एवं अदब्ध, अविजेय बने रहें। हे परमेश्वर! हमें पाप से दूर करो। हमारा जीवन मङ्गलमय बने। जो यज्ञ प्रत्येक चार मास के पश्चात् किया जाता है, वह 'चातुर्मास्य' यज्ञ कहलाता है। इसके लिए धनधान्य से परिपूर्ण गृहस्थाश्रम की आवश्यकता होती है। सोमयाग :- सोमयगों का वर्णन चतुर्थ से लेकर अष्टम अध्याय तक उपलब्ध होता है। अग्निष्टोम के प्रकृतियाग होने से विस्तृत विवेचन किया गया है। इन यज्ञों में सोम को पत्थरों से कूटकर, रस निकाल कर दूध में मिलाया जाता है। उससे प्रातः काल, मध्याह्न तथा सांयकाल अग्नि से हवन किया जाता है। इसकी 'सवन' संज्ञा है जो तीनों कालों के अनुसार विभिन्न संज्ञाओं से प्रसिद्ध है। सोम यागों का उद्देश्य जीवन को संयत क्रम में बाँधना है। इनसे हमारे संकल्पों को शक्ति प्रदान होती है। सोमरस तो शारीरिक शक्ति को प्राण देता है तो मानसिक शक्ति को ऋक्-यजु-साम का ज्ञान भी प्रदान करता है। वाजपेययज्ञ :- नवम अध्याय का सम्बन्ध 'वाजपेय यज्ञ' से है। 'एकाह' अर्थात् एक दिन में समाप्त सोमयागों में 'वाजपेय' अन्यतम है। याजक अन्न, बल, ज्ञान अथवा किसी भी प्रकार की शक्ति ग्रहण करना चाहता है तो उसको इन सबको
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 143 आत्मसात् करना पड़ता है। तब वह वाजपेयी बनने का अधिकारी होता है। जो वाज को पेयरूप में ग्रहण कर लें तथा उसे व्यर्थ न जाने दें, वही वाजपेय यज्ञ का कर्ता कहलाता है। यह यज्ञ मूलतः योद्धाओं तथा राजाओं द्वारा किया जाता था। इसका सम्बन्ध घोड़ों की धावन प्रतियोगिता से जोड़ा जाता है। इसमें सुरामिश्रित सोमरस का पान होता था। इस सुरापान का ब्राह्मण-ग्रन्थों के काल में निषेध किया गया था। राजसूय यज्ञ :- दशम अध्याय में राजसूय यज्ञ वर्णित है। यह राजा जनक के राज्याभिषेक के अवसर पर किया गया था। राज्याभिषेकोपरान्त राज्य का भार राजा के शिर पर आ जाता है जिसका उसे सफलतापूर्वक निर्वाह करना पड़ता है। इसीलिए इस अध्याय में राजनीति, राजतन्त्र तथा राजोपयोगी शिक्षा का निरूपण हुआ है। अन्तिम मन्त्र में राजा तथा प्रजा के सम्बन्ध का निर्देश है- पु॒त्रमि॑व पि॒तरा॑वि॒श्विनो॒भेन्द्रा॑वथुः का॒व्यैर्ऋधं॒ सना॑भिः। यत्सु॒रामं॒ व्यपि॑बः॒ शची॑भिः॒ सर॑स्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्॥ (१०/३४) हे विशिष्ट धन से सम्माननीय समस्त सभाओं के स्वामी! आप बुद्धिबल से आरामदायक रस को विविध प्रकार से पीवें, आप विद्या से उत्तम शिक्षा प्राप्त वाणी के समान स्त्री सेवन करे। राजा से आज्ञा प्राप्त (तुम दोनों) सेनापति तथा न्यायाधीश, परम विद्वानों द्वारा किए कर्मों से जैसे माता-पिता अपने सन्तान की रक्षा करते हैं वैसे समस्त राज्य की रक्षा करें। अग्निचयन :- अध्याय ११ से १८ तक 'अग्निचयन' का विस्तारपूर्वक वर्णन है। अग्निचयन का अभिप्राय है- 'याज्ञीय होमाग्नि के लिए वेदिका निर्माण।' यह गृहस्थ के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके निर्माण में १०,८०० ईंटों का प्रयोग होता है। यज्ञकुण्ड पंख खोले पक्षी के आकार का बनाया जाता था। वैखानस गृह्यसूत्र तथा शतपथ ब्राह्मण में वेदि तथा उसके विविध ईंटों के आध्यात्मिक रूप का व्याख्यान बड़ी मार्मिकता के साथ किया गया है। ११वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में अग्निचयन का स्पष्ट उल्लेख है। यह न केवल पार्थिव अग्निचयन का ही अपितु मानसिक एवं आध्यात्मिक अग्निचयनों का भी निर्देश कर रहा है- यु॒ञ्जानः प्र॑थ॒मं मन॑स्त॒त्त्वाय॑ सवि॒ता धियः॑। अ॒ग्नेर्ज्योति॑र्नि॒चाय्य॑ पृथि॒व्या अध्याऽभ॑रत्॥ (११/१) अर्थात् जो ऐश्वर्य का इच्छुक मनुष्य उन परमेश्वरादि पदार्थों के ज्ञान के लिए प्रथम विचार स्वरूप अन्तःकरण की वृत्तियों को योगाभ्यास तथा भूगर्भविद्या में युक्त CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 144 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता हुआ पृथिवी आदि में निवास करने वाली बिजली के प्रकाश को निश्चय करके भूमि के ऊपर धारण करे वह योगी तथा भूगर्भविद्या का ज्ञाता होवे। शतरूद्रीययज्ञ :- १६वें अध्याय में शतरूद्रीय-यज्ञ का विवेचन है। इसमें रुद्र की कल्पना का अत्यन्त साङ्गोपाङ्ग विवरण प्राप्त होता है। वेदज्ञों में यह रुद्राध्याय अत्यन्त उपयोगी होने से अतिप्रसिद्ध है। इस अध्याय के देवता 'रुद्र' ही है। सौत्रामणी यज्ञ :- १९वें अध्याय से लेकर २१वें अध्याय तक उपलब्ध मन्त्रों में उत्सवरूपी सौत्रामणी यज्ञ का वर्णन है। इस यज्ञ में सोमरस के साथ सुरापान का भी उल्लेख है। कहा भी गया है- “सौत्रामण्यां सुरां पिबेत्।” सोमरस को निचोड़कर सुरा मिलाकर पान करना बलवर्द्धक होता है। यह सुरा अश्विनीकुमार सरस्वती तथा इन्द्र को आहुति द्वारा दी जाती है। इस यज्ञ को अश्विनी कुमार ने इन्द्र के रोग दूर करने के लिए किया था क्योंकि अधिक सोमपान से इन्द्र रोगग्रस्त हो गए थे। यह यज्ञ किसी भी प्रकार के व्यक्ति द्वारा अपनी सफलता के लिए किया जाता था। यथा राजा द्वारा राज सिंहासन की पुनः प्राप्ति के लिए, विजयेच्छु योद्धा के लिए, ऐश्वर्याभिलाषी वैश्य के लिए इस यज्ञ का अनुष्ठान विहित है। अश्वमेध यज्ञ :- अध्याय २२ से २५ तक अश्वमेध यज्ञ से सम्बन्धित प्रार्थनाओं का संग्रह है। यह यज्ञ सार्वभौम आधिपत्य के अधिकारी सम्राट द्वारा किए जाते रहे हैं। इस यज्ञ का सम्पादन चक्रवर्ती सम्राट द्वारा ही किया जा सकता है। अध्याय २० के प्रथम १३ मन्त्रों में राजतन्त्र की उपमा मानवीय शरीर से दी गई है। इस यज्ञ में घोड़ा छोड़ा जाता है। जिस राज्य में घोड़ा निर्वाद रूप से अतिक्रमण कर लेता है, वह राज्य अश्वमेध यज्ञ के कर्ता के अधीन हो जाता है। जहाँ अश्व को बाधा पहुँचाई जाती है, वहाँ संग्राम होता है तथा संग्राम का परिणाम ही चक्रवर्ती सम्राट के पद का निर्णायक होता है। अध्याय २२ का प्रथम मन्त्र ही अश्व छोड़े जाने की प्रक्रिया बतलाता है। अश्व छोड़े जाने के समय निम्नलिखित ऋचा का पाठ किया जाता है- स्वगा॒ त्वा दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ ब्रह्म॒न्नश्वं॑' भुन्त्स्यामि दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ तेनं॑ राध्यासम्। तं ब॑धान दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ तेनं॑ राध्नुहि।। (२२/४) इस मन्त्र में प्रजा की ओर से पुरोहित सम्राट् को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह प्रजा के अभ्युदय तथा रक्षा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करे। सभी स्वतन्त्रता तथा ऐश्वर्य का उपभोग करें। दूसरे के हितों का सभी ध्यान रखें। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 145 खिलसूक्त :- २६वें अध्याय से ४० अध्याय तक के मन्त्रों को निःसन्देह रूप से परवर्तीकालीन रचना स्वीकार किया जाता है। इनमें से २६ से २९ अध्याय तक का अंश खिलसूक्त के नाम से जाना जाता है। विषयवस्तु की दृष्टि से खिल सूक्तों में कोई नवीन वस्तु नहीं है, अपितु पिछले अध्यायों में कथित अनुष्ठानों के सम्बन्ध में नवीन मन्त्रों द्वारा वर्णन किया गया है। पुरुषमेध यज्ञ :- पुरुषमेध यज्ञ का वर्णन ३०वें अध्याय में किया गया है। यह अध्याय एक जोड़ के सदृश प्रतीत होता है क्योंकि इस अध्याय में एक भी प्रार्थना नहीं उपलब्ध होती है। इस अध्याय में १८४ पदार्थों व व्यक्तियों का आलम्भन उपलब्ध होता है। यह आलम्भन यथार्थ आलम्भन नहीं है बल्कि पुरुष मेध यज्ञ के अवसर पर प्रतीक रूप में किया जाता था। भारत में कभी भी पुरुषमेध यज्ञ हुआ हो, ऐसा वर्णन कहीं भी इतिहास पुराणादि में उपलब्ध नहीं होता। यह यज्ञ कल्पनाप्रसूत है, इसमें पुरुष की विभिन्न प्रतिनिधिभूत वस्तुओं के लिए पृथक्-पृथक् पदार्थों में दान का विधान था। जैसे नृत्तार्थ सूत की, गीत के लिए नट की, धर्म के लिए समाचार की, पुरोहित के लिए ब्राह्मण की, राजवंश के लिए वीर योद्धा की, मरुताणों के लिए वैश्य की, संन्यासी के लिए शूद्र की, अन्धकार के लिए चोर की, नरकार्थ हत्यारे की, कामार्थ वाराङ्गना की, कोलाहलार्थ गायक की, अक्षार्थ द्यूतकर की, निद्रार्थ नेत्रहीन की, अन्यायार्थ बधिर की, यथार्थ रजक पत्नी की, कामनार्थ रजक पत्नी की, यथार्थ वन्ध्या की, आनन्दार्थ वीणा वादक की, क्रन्दनार्थ मुरली वादक की, स्वर्गार्थ खल्वाट् की तथा पृथ्वी के लिए पंगु की आलम्भन की विधि विहित है। पुरुषसूक्त :- ३१वाँ अध्याय प्रसिद्ध पुरुष-सूक्त है। यहाँ पुरुष को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में उपस्थित किया गया है। इस अध्याय को एक 'उपनिषद्' भी कहा जाता है। पुरुष-मेध-यज्ञ करते समय पुरोहित द्वारा इसी के मन्त्रों का सस्वर पाठ किया जाता है। ऋग्वेद में दशम मण्डलान्तर्गत उपलब्ध ९०वें सूक्त में संसार की उत्पत्ति पुरुषबलि के द्वारा बतलाई गई है तथा विश्व व पुरुष को अभिन्न निरूपित किया गया है। यजुर्वेदीय पुरुष सूक्त में ऋग्वेदीय पुरुष सूक्त से ८ मन्त्र अधिक मिलते हैं। सर्वमेध यज्ञ :- ३२वें तथा ३३वें अध्याय में सर्वमेध यज्ञ का वर्णन किया गया है। ३२वें अध्याय में केवल १६ तथा ३३वें अध्याय में कुल ९६ मन्त्र हैं। यह वह सर्वोत्कृष्ट यज्ञ है जिसके समाप्त होने पर यज्ञ करने वाला यजमान पुराहित को यज्ञ के पश्चात् अपना सब कुछ दक्षिणा के रूप में समर्पित करता है और शेष जीवन के निर्वाह हेतु वानप्रस्थ ग्रहण कर लेता है। यही इस यज्ञ का वैशिष्ट्य है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 146 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन की महिमा :- ३४वें अध्याय के प्रारम्भ में 'शिवसंकल्प उपनिषद्' नामक ६ मन्त्रों का सङ्कलन दृष्टिगोचर होता है। यह संकलन तथा उसकी वृत्तियों के स्वरूप निरूपण में अत्यन्त उपयोगी है। इसमें मन की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। इस मन में वेग है, कर्म को प्रेरणा देने वाली शक्तियाँ हैं, चेतना है, धृति है, त्रिकाल का ज्ञान है। इसमें तीनों वेद विद्यमान है और यह स्वयं हृदय में स्थित है। इसके अन्त में मन को 'शिव सङ्कल्प' होने की प्रार्थना की गई है, जिससे उसकी इच्छा सदैव मंगलदायक बने— सु॒षारथिरश्वा॑नि॒व॒ यन्म॑नु॒ष्या॒न्नेनीयते॒ऽभीशु॑भि॒र्वाजि॑न इव। हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यदजिरं॒ जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मन॑: शि॒वस॑न्कल्पम॑स्तु।। (३४/५) अर्थात् जो मन, जैसे सुन्दरचतुरसारथि गाड़ीवान लगाम से घोड़ों को सभी ओर से चलाता है, वैसे मनुष्यादि प्राणियों को शीघ्रतापूर्वक इधर-उधर घुमाता है तथा जैसे रस्सियों से वेग वाले घोड़ों को सारथि वश में करता तथा नियम में रखता है, जो हृदयस्थ विषयादि में प्रेरक या वृद्धादि अवस्था रहित तथा अत्यन्त वेगवान् है, वह मेरा मन मङ्गलमय नियम में इष्ट होवे। पितृमेधयज्ञ :- ३६वें अध्याय में पितृमेध सम्बन्धी मन्त्रों का संग्रह है। इसमें पितरों की संतुष्टि के लिए ऋचाएँ संगृहीत है। इसके कतिपय मन्त्र अन्त्येष्टि क्रिया से सम्बन्धित हैं। इन मन्त्रों को ऋग्वेद से ग्रहण किया गया है। प्रवर्ग्य यज्ञ :- ३६वें अध्याय से लेकर ३९वें अध्याय तक प्रवर्ग्य यज्ञ की प्रार्थनाओं का संकलन है। इन अध्यायों में प्रवर्ग्ययज्ञ का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस यज्ञ में एक थाली को यज्ञाग्नि पर खूब गर्म किया जाता है। यह थाली सूर्य की प्रतिनिधि के रूप में मानी जाती है। इस दहकती हुई अग्नि में दूध को उबाला जाता है। इस प्रकार उष्ण किया गया दूध अश्विनी कुमारों द्वारा मिलाया जाता है। इस यज्ञ में एक गूढ़ रहस्य निहित है। इसमें यज्ञ के पात्र ऐसे क्रम से रखे जाते हैं कि वह सब मिलकर एक पुरुष की आकृति का रूप धारण कर लेते हैं। यथा— दूध की थाली मस्तक हो, पावन तृण से निर्मित शिखा केशपाश हो, दो लघु दुग्धपात्र कान हों, दो छोटे सुनहले पत्ते आँखें हों, दो पात्र ऐडी हों, माड़ा हुआ आटा मेद तथा मज्जाएँ हो, दूध से मिला शहद ही रुधिर हो आदि। इसी प्रकार अन्य अंगों की भी कल्पना की गई है। यह समस्त विधान रहस्यात्मक है। ईशावास्योपनिषद् :- ४०वाँ अथवा अन्तिम अध्याय 'ईशावास्योपनिषद्' के रूप में विख्यात है। इसका यह अभिधान अपने प्रारम्भिक दो शब्दों के कारण पड़ा। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 147 यह अत्यन्त लघु उपनिषद् समस्त उपनिषदों में आदि स्वीकार किया जाता है। यही एक मात्र ऐसा उपनिषद् है जो किसी संहिता का अंश है। अन्य उपनिषदों के साथ ऐसी बात नहीं है, वे किसी संहिता के अंश न होकर स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी उपनिषद् है, इसमें आद्योपान्त ज्ञान की चर्चा की गई है। अपने पृथक् वर्ण्य विषय के कारण यह अवान्तर कालीन रचना प्रतीत होती है। वस्तुतः कर्मकाण्ड का समापन इसी प्रकार की ज्ञान चर्चा से होना चाहिए। हिरण्मये॑न॒ पात्रे॑ण स॒त्यस्यापि॑हि॒तं मुख॑म्। यो॒ऽसावा॑दि॒त्ये पुरु॑षः॒ सो॒ऽसाव॒हम्। ॐ खं ब्रह्म॑।। (४०/१७) अर्थात् हे मनुष्यों! जिस ज्योति स्वरूप रक्षक मुझसे अविनाशी यथार्थ कारण के ढके हुए मुख के सदृश उत्तम अंग का आलोक किया जाता है, जो वह सूर्यमण्डल में पूर्ण परमात्मा है। वह परोक्षरूप मैं आकाश के सदृश व्यापक सबसे गुण कर्म और स्वरूप करके अधिक हूँ। सबका रक्षक जो मैं हूँ उसका ऐसा नाम जानो। कृष्ण यजुर्वेद का वर्ण्य विषय :- कृष्ण यजुर्वेद की चरण व्यूह के अनुसार ८५ शाखाएँ हैं किन्तु वर्तमान काल में केवल चार शाखाएँ तथा उससे सम्बन्धित साहित्य मिलता है। वे शाखाएँ निम्नलिखित हैं- १. तैत्तरीय शाखा (२) मैत्रायणी शाखा (३) कठ शाखा (४) कपिष्ठल शाखा शुक्ल यजुर्वेद के वर्ण्य विषय में तथा कृष्ण यजुर्वेद के वर्ण्य विषय में कोई विशेष भेद नहीं है। दोनों में जिन अनुष्ठानादि विधियों का वर्णन किया गया है, वे प्रायः एक समान ही हैं। अन्तर है तो केवल इतना ही कि शुक्ल यजुर्वेद में केवल मन्त्रों का संकलन है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में मन्त्रों के साथ ब्राह्मणों का भी संमिश्रण है। तैत्तरीय संहिता में भी शुक्ल यजुर्वेद के समान ही पुरोडाश, याजमान, वाजपेय, राजसूय आदि अनेक यज्ञीय अनुष्ठानों का विस्तारपूर्वक वर्णन है। मैत्राणयी संहिता गद्यपद्यात्मक है। इस संहिता के प्रथम काण्ड में दर्शपूर्णमाश, अध्वर, आधान, पुनराधान, चातुर्मास्य तथा वाजपेय यज्ञ चर्चित है। द्वितीय काण्ड में काम्य ईष्टि, राजसूय तथा अग्निचित्ति वर्णित है। तृतीय काण्ड में अग्निचित्ति, अध्वरविधि, सौत्रामणी तथा अश्वमेध यज्ञ का विस्तृत विवेचन है। चतुर्थ काण्ड में पूर्वकथित यज्ञों के सम्बन्ध में अन्य आवश्यक सामग्री एकत्रित की गई है। कठ संहिता में पाँच खण्ड हैं- इठिमिका, मध्यमिका, ओरिमिका, याज्यानुवाक्या काण्ड एवं अश्वमेधाधुवचन। इन खण्डों को टुकड़ों में विभाजित किया गया है, टुकड़ों का नाम है- 'स्थानक'। इठिमिका में १८ स्थानक हैं जिनमें पुरोडाश, अध्वर, पशु-बन्ध, वाजपेय, राजसूय CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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148 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता आदि वर्णित है। माध्यमिका में १२ स्थानक हैं, जिसमें सावित्री, पञ्चचूड, स्वर्ग, दीक्षित, आयुष्य आदि का विवेचन मिलता है। ओरिमिका काण्ड में १० स्थानक हैं, जिनमें पुरोडाश ब्राह्मण, यजमान ब्राह्मण, सत्र, प्रायश्चित्ति चातुर्मास्य, सब, सौत्रामणी आदि का विवेचन है। चतुर्थ काण्ड का भी यही वर्ण्यविषय है। अन्तिम काण्ड १३ अनुवचनों वाला है। कपिष्ठल कठ संहिता का वर्ण्य विषय भी अन्य यजुर्वेदीय शाखाओं के समान ही कर्मकाण्ड का प्रतिपादन है। वस्तुतः यजुर्वेद की समस्त मन्त्र संहिताएँ मन्त्रों तथा यज्ञीय अनुष्ठानों की दृष्टि से अत्यधिक समानता का निर्वाह करती है। यजुर्वेदीय प्रहेलिकाएँ :- जिस प्रकार ऋग्वेद में प्रहेलिकाओं की प्रतिपत्ति है, उसी प्रकार यजुर्वेद में भी प्रहेलिकाओं की उपलब्धि होती है। इस वेद में आध्यात्मिक प्रहेलिकाओं का एक विशेष अंश समाविष्ट है। इन आध्यात्मिक प्रहेलिकाओं को ब्राह्मण ग्रन्थों की कल्पना की प्राक्कल्पनाएँ कहा जा सकता है। उस काल में प्रहेलिकाएँ एक प्रथा के रूप में प्रचलित थी। यह प्रथा पूर्णतः धार्मिक थी। प्राचीन काल में अश्वमेधादि यज्ञ के अवसर पर इन प्रहेलिकाओं से ब्राह्मण वर्ग अपना मनोरञ्जन किया करता था। इन प्रहेलिकाओं में विषय की दृष्टि से विविधता प्राप्त होती है। कतिपय प्रहेलिकाएँ यौवन की स्मृति को कुदेरने वाली तथा कतिपय प्रहेलिकाएँ यज्ञीय गूढ विषयों तथा औपनिषदिकतत्त्वचिन्तन से मण्डित हैं। ये प्रहेलिकाएँ वाजसनेयी संहिता के २३वें अध्याय में प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती हैं। वैदिक काल में ये प्रहेलिकाएँ देवताओं की पूजा का एक आवश्यक अंश हुआ करती थी। देवों की उपाधियाँ :- आधुनिक काल में एक ही देवता की विभिन्न संज्ञाएँ हैं। प्रत्येक देवता को अनेक नामों से पुकारा जाता है। यथा विष्णुसहस्रनाम में विष्णु के एक हजार तथा शिवसहस्रनाम में शिव के एक हजार नाम संगृहीत हैं। समाज में राम तथा कृष्णादि को भी एकाधिक अभिधान प्राप्त है, यहाँ तक कि भक्तों ने कृष्णसहस्रनाम तथा राधासहस्रनाम की भी रचना कर डाली है। इस परम्परा का भी बीज हमें यजुर्वेद में उपलब्ध होता है जिसमें वाजसनेयी संहिता के २५वें तथा तैत्तरीय संहिता के चौथें तथा पाँचवें अध्यायों में शतरूद्रीय यज्ञ के अवसर पर रुद्र के नामों की गणना की गई है। इस प्रथा का उद्देश्य विभिन्न नामों द्वारा देवताओं की अर्चना करके उससे ऐश्वर्य की प्राप्ति करना है। एकाक्षर शब्द :- यजुर्वेदीय मन्त्रों एवं प्रार्थनाओं के अन्त में हमें कुछ ऐसी ध्वनियाँ तथा उच्चारण प्राप्त होते हैं जिनका पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार कोई महत्त्व नहीं है। उनके विचार से इनमें केवल परम्परा का निर्वाह है तथा इस प्रकार के शब्दों
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 149 से साहित्य को हानि पहुँची है। इनका अभिप्राय तथा महत्त्व प्राचीन काल में भले ही रहा हो किन्तु वर्तमान काल में ना के बराबर है। इस प्रकार के शब्दों में स्वाहा, स्वधा, ओ३म् तथा वषट् आदि हैं, ये एकाक्षर शब्द हैं। विन्टरनिट्ज ने इन शब्दों को अर्थहीन बतलाया है। इन एकाक्षर शब्दों के विषय में भारतीय वेदज्ञों की भिन्न धारणा है। भारतीय इन शब्दों को अत्यन्त श्रद्धा तथा आदर के साथ उच्चारण तथा श्रवण करते हैं। 'स्वाहा' तथा 'स्वधा' शब्द क्रमशः देवों तथा पितरों के लिए प्रयुक्त होने वाले मन्त्रों में अन्तिम में उच्चारित किए जाते हैं। भारतीय की दृष्टि में इनका पर्याप्त अर्थ है किन्तु उन अर्थों को समझने वाले अधिकारी विद्वान् अब नहीं रहें। पाश्चात्य विद्वान् ओ३म् के जाप को भी निरर्थक तथा महत्त्वहीन बतलाते हैं किन्तु भारतीयों के मध्य में ओ३म् शब्द पर्याप्त समादृत है। आचार्यप्रवर डॉ० मुंशीराम शर्मा का कथन है कि "यह मूल ध्वनि है। यही ध्वनि अ+उ+म् नाम की तीन ध्वनियों में फैल जाती है। अ आविर्भाव है, उ उठना या उड़ना है और म चुप हो जाना या अपने में लीन हो जाना है। ऋक्-यजु-साम की वेदत्रयी इन्हीं तीन मात्राओं का उपबृंहण है। तीन महाव्याहृतियाँ- भूः, भुवः तथा स्वः, इन्हीं तीन मात्राओं से निकली हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय का प्रकाशन भी इन्हीं तीन मात्राओं से होता है। सत्, चित्, आनन्द नाम की तीन सत्ताएँ भी इन्हीं से प्रकट हो जाती हैं। मूल ध्वनि का यही विस्तार सब कुछ है, था और होगा।" विभिन्न उपनिषदों तथा ब्राह्मणों में भी अनेक स्थलों पर शब्द के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। यथा गोपथ ब्राह्मण में ऋषि-कथन है- तत् एतत् अक्षरं ब्राह्मणों यं कामं इच्छेत् त्रिरात्रोपोषितः प्राङ्मुखों वाग्यतो बर्हिषि उपविश्य सहस्र कृत्वा आर्वतयेत सिद्ध्यन्ति अस्य अर्थाः सर्वकर्माणि च। (१/२२) अर्थात् जो इस एकाक्षर अविनाशी ओ३म् नाम की ऋचा का एक हजार बार कुशासन पर बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके, वाणी के संयम सहित तथा तीन रातों तक उपवास करता हुआ जाप करता है, उसके समस्त अर्थ तथा काम सिद्ध हो जाते हैं। उपनिषदों के ऋषि ओ३म् के महत्त्व से भलीभाँति परिचित थे। वे अत्यन्त प्रेम के साथ ओ३म् एकाक्षर शब्द का उच्चारण करते थे तथा ओ३म् के जाप को ही परमात्मा प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन समझते थे। उनके अनुसार ओ३म् शब्द का जाप ही तम-रत के क्लेशों से छुटकारा दिला सकता है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 150 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अनेक शताब्दियों के पश्चात् तन्त्र ग्रन्थों में इस प्रकार के शब्दों का पुनः आविर्भाव दृष्टिगोचर होता है। इन ग्रन्थों में केवल ऐं, ह्रीं, क्लीं, श्रीं, क्रीं आदि अस्पष्ट ध्वनियाँ ही प्राप्त होती हैं। भारतीय तन्त्रशास्त्रियों की दृष्टि में इस प्रकार की ध्वनियाँ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। तान्त्रिक साधना के अनुयायी वज्रयानी-बौद्धों तथा शाक्तों ने अपनी उपासना पद्धति के मूल में ओ३म् को विशिष्ट स्थान प्रदान किया है। उनके प्रार्थना सम्बन्धी मन्त्रों में ओ३म् का उच्चारण अनिवार्य है। अतः पाश्चात्य वेदज्ञों के दृष्टिकोण में ये एकाक्षर शब्द भले ही निरर्थक हो किन्तु भारतीय यज्ञीय अनुष्ठानों तथा विभिन्न उपासना पद्धतियों में इन्हें आदरणीय स्थान प्राप्त है। यजुर्वेदीय गद्य का स्वरूप- यजुर्वेद में विशेष रूप से अनेक स्थलों पर भावों के विनियोग के लिए गद्य का उपयोग किया गया है। यह अधिकांशतया देवों के नामोच्चारण के साथ-साथ याज्ञिक भेटों के अर्पण के समय दृष्टिगोचर होता है। इस गद्य में पदों का मञ्जुलविन्यास तथा सारल्य प्रधान रूप से वर्णनीय है। क्लिष्ट पदविन्यास तथा दुर्गम शब्द जाल का सर्वथा अभाव है। इन्द्र को आहुति देते समय 'इदमन्द्राय' तथा अग्नि के लिए आहुति देते समय 'इदमग्नये' शब्दों का उच्चारण किया जाता है। इस प्रकार के पदों की सरलता तथा सुबोधता स्पष्ट ही है। शब्द अपने अर्थ एवं अभिप्राय को स्वतः मुखरित करते हुए प्रतीत होते हैं। यजुर्वेद का महत्त्व :- पाश्चात्य वेदज्ञ यजुर्वेद संहिता में उपलब्ध मन्त्रों को भले ही व्यर्थ तथा महत्त्वहीन समझें, किन्तु भारतवासियों की दृष्टि में यजुर्वेद का वर्ण्य विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति के विषय में यजुर्वेद में अत्यधिक जानकारी दी गई है। यथा- रुचं॑ नो धेहि ब्राह्म॑णेषु॒ रुच॒थंराज॑सु नस्कृधि। रुचं॑ वि॒श्येषु॑ शू॒द्रेषु॒ मयि॑ धेहि॒ रुचा॒ रुचं॑॥ (यजु० १८/४८) अर्थात् हे जगदीश ! आप हमारे ब्राह्मण विद्वानों में प्रीति से प्रीति को धारण करो। हमारे राजपूत क्षत्रियों में प्रीति से प्रीति को तथा मुझमें भी प्रीति से प्रीति को धारण करो। यजुर्वेद मुख्यतः कर्मकाण्ड का वेद है। इसमें यज्ञों की व्याख्या है। इसके साथ ही यजुर्वेद में सृष्टि रचना, मनोविज्ञान, समाजविज्ञान, अन्न, ऋतु, धातु, मरुत, पितर, राजनीति, दर्शन अर्थात् यज्ञ से सम्बन्धित अन्य तत्त्व भी पाए जाते हैं। अतः भारतीय धार्मिक तथा दार्शनिक परम्परा में यजुर्वेद का गौरवमय स्थान है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 151 सामवेद वैदिक संहिताओं में सामवेद को सर्वोत्कृष्ट माना जाता है। संहितासाहित्य में साम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा गौरवमण्डित स्थान पर आसीन है। जिस प्रकार अग्नि तथा वायु से आदित्य अर्थात् सूर्य श्रेष्ठ है, उसी प्रकार ऋग्वेद तथा यजुर्वेद की तुलना में सामवेद श्रेष्ठ है। मनु तथा याज्ञवल्क्य आदि अनेक ऋषियों के अनुसार ऋग्वेद की उत्पत्ति अग्नि से और यजुर्वेद की उत्पत्ति वायु से हुई है। जबकि सामवेद की उत्पत्ति आदित्य से हुई है। छान्दोग्यउपनिषद् के अनुसार 'सामवेद एवं पुष्पम्' अर्थात् सामवेद वेदरूपी वृक्ष का पुष्प है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सामवेद भी पुष्पित वृक्ष के सदृश अपने अनुरागियों को मात्र आकर्षित ही नहीं करता, अपितु आह्लादित भी करता है। छान्दोग्यउपनिषद् में सामवेद की प्रशंसा में एक उक्ति लिखी है— 'वाचः ऋक् रसः, ऋचः सामः रसः, साम्नः उद्गीथो रस' (१/१/२) अर्थात् वाणी का रस ऋचा है, ऋचा का रस साम है तथा साम का भी रस उद्गीथ है। इस प्रकार उद्गीथ को सामवेद का सार कहा गया है। उद्गीथ ओंकार शब्द का पर्यायवाची है। गीता के कथनानुसार भी 'प्रणवः सर्ववेदेषु' (७/८) तथा अनुगीता में भी 'ओंकारः सर्ववेदानाम्' कहकर समस्त वैदिक संहिताओं में ओङ्कार को सर्वोत्तम बतलाया गया है। ओङ्कार की श्रेष्ठता का प्रतिपादन ही सामवेद की श्रेष्ठता का प्रतिपादन है। भगवद्गीता में भी भगवान् श्री कृष्ण सामवेद को स्वयं का स्वरूप बतलाते हैं— 'वेदानां सामवेदोऽस्मि' अर्थात् मैं वेदों में सामवेद हूँ। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में भी अनेक स्थलों पर सामवेद की पर्याप्त प्रशंसा उपलब्ध होती है। जैसे— यो जा॒गार॒ तमृच॑ः कामयन्ते॒ यो जा॒गार॒ तमु॒ सामा॑नि यन्ति। यो जा॒गार॒ तम॒यं सोम॑ आह॒ तवा॒हम॑स्मि स॒ख्ये न्यौकाः॥१४॥ (ऋ० ५/४४/१४) अर्थात् जो अविद्यारूपी निद्रा से उठके जागरणशील है, उसको ऋचाओं के सदृश जन कामना करते हैं तथा जो अविद्यारूपनिद्रा से उठ के जागरणशील हैं, उसको भी सामवेद के विभाग प्राप्त होते हैं और जो अविद्यारूप निद्रा से उठके जागरणशील हैं उनको यह सोम सदृश निश्चित स्थान वाला मित्रत्व में आपका मैं हूँ, इस प्रकार कहता है। तथा— उद्गा॒तेव॑ शकुने॒ साम॑ गायसि, ब्रह्मपुत्रइ॑व॒ सर्वनेषु शंससि।। (ऋ० २/४३/२)
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152 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
अर्थात् हे परवेश के सदृश शक्ति सम्पन्न ! जो तुम उर्ध्व स्वर से वेद का गान करते हुए के सदृश सामवेद का गान करते हो, जैसे चतुर्वेद के ज्ञाता ब्रह्मा के पुत्र के सदृश यज्ञ सम्बन्धी प्रातः कालीन क्रियादि में स्तुति करते हो। तथा- विभिन्न स्थलों में साम की अत्यधिक प्रशंसा की गई है। उसमें 'उच्छिष्ट' तथा 'स्कम्भ' से साम का आविर्भाव बतलाया गया है। एक ऋषि का कथन है कि- 'सामानि॒ यस्य॒ लोमा॑न्यथर्वाङ्गिरसो मुखं स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः स्वि॑दे॒व सः' (अथर्व० १०/७/२०) अर्थात् साम जिसके लोम हैं और अथर्वमन्त्र मुख के सदृश हैं, वह कौन सा स्कम्भ है तू निश्चय करके कह। इसी प्रकार एक अन्य मंत्र में भी 'उच्छिष्ट' से ऋक् तथा साम का आविर्भाव बतलाया गया है- ऋच॒ः सामा॑नि॒ च्छन्दां॑सि पुरा॒णं यजु॑षा स॒ह। उच्छिष्टाज्जज्ञिरे॒ सर्वे॑ दि॒वि दे॒वा दि॑वि॒श्रित॑ः।। (अथर्व० ११/७/२७) अर्थात् ऋचाएँ, सामवेद मन्त्र, यजुर्वेद सहित अथर्ववेद मन्त्र तथा पुराण आकाश में सूर्य में ठहरे हुए गतिमान लोक (उच्छिष्ट) से उत्पन्न हुए। एक मन्त्र में ऋक् तथा साम की स्तुति की गई है- ऋचं साम॑ यजामहे याभ्यां॒ कर्मा॑णि कुर्वते॑। ए॒ते सद॑सि राजतो य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ यच्छतः।। (अथर्व० ७/५६/१) अर्थात् ऋचाएँ तथा साम का हम सत्कार करते हैं, जिन दोनों के द्वारा वे (समस्त प्राणी) कर्मों को करते हैं। ये दोनों बैठक में विराजते हैं तथा विद्वानों के बीच में संगति दान करते हैं। अतः यह निर्विवाद सिद्ध है कि सामगायन अत्यन्त प्राचीन है। अनेक प्रशंसात्मक उक्तियों के अतिरिक्त वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर वैदिक सामों का उल्लेख इनकी प्राचीनता को द्योतित करता है। जैसे- ऋग्वेद में वैरूप, वृहत, रैवत, गायत्र, भद्र आदि, यजुर्वेद में रथन्तर, वैराज, वैखानस, वामदेव्य, शाक्वर, रैवत, अभीवर्त तथा ऐतरेय ब्राह्मण में नौधस, रौरव, यौधाजय, अग्निष्टोमीय आदि विभिन्न सामों का उल्लेख है। अतः अति प्राचीन काल में भी साम गायनों का अस्तित्व पूर्णतः सिद्ध हो जाता है।
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द्वितीय अध्याय 153 साम का अर्थ- 'साम' शब्द का एक अतीव सुन्दर निर्वचन बृहदारण्यक- उपनिषद् में उपलब्ध होता है। उसके अनुसार 'सा च अमश्चेति तत्साम्नः सामत्वम्' (बृह०उ० १/३/२२)। अर्थात् साम का निर्वचन सा+अम हुआ। 'सा' का अर्थ है ऋचा तथा 'अम' का अर्थ है स्वर। यह स्वर ही ऋचा को साम का रूप देता है। अतः 'साम' शब्द का निष्पत्ति से प्राप्त अर्थ हुआ ऋक् के साथ सम्बन्धित स्वर प्रधान गायन अर्थात् 'तया सहसम्बद्ध अमो नामस्वरः यत्र वर्तते तत् साम्।' ऋग्वेद में भी अनेक पदों द्वारा स्तुति को गान के साथ संयुक्त किया गया है। जैसे 'एतोन्विन्द्रं स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्न' (ऋ० ८/९५/७) अर्थात् हम शुद्ध प्रभु की शुद्ध साम गान से स्तुति करें तथा 'इन्द्राय साम गायत' (ऋ० ८/९८/१) अर्थात् प्रभु के लिए साम को गाओ, आदि के द्वारा स्तुति को गान से जोड़ा गया है। स्तुति परमेश्वर की है तथा स्तोता कवि है। कवि की उत्पत्ति साम स्वरावली से होती है- 'त्वष्टा जनयत् साम्नः कविः' (ऋ०२/२३/१७) अर्थात् साम का कवि सर्वज्ञ आपको प्रकट करता है। वे ऋचाएँ जिन पर साम का गायन किया जाता है, 'सामयोनि' कहलाती हैं। साम संहिता इन्हीं सामयोनियों का संकलन है। 'साम' शब्द के मुख्य वाच्य गानों का संकलन- 'गान संहिता' के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः 'साम' शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। एक तो ऋक् मन्त्रों के लिए तथा दूसरे ऋक् मन्त्रों के ऊपर गाए जाने वाले गानों के लिए। अतः साम का मूलाधार ऋक् मन्त्र ही है। ऋषियों ने साम तथा ऋक् के प्रगाढ़ सम्बन्ध को द्योतित करने के लिए दाम्पत्य-भाव की कल्पना की है। अथर्ववेद के अनुसार 'अमोऽहमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यृक्त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम्, ताविह सं भवाव प्रजाम जनयावहै' (अथर्व० (१४/२/७१), अर्थात् (हे वधू!) मैं ज्ञानवान हूँ, सो तू (ज्ञानवती है।) मैं सामवेद हूँ, तू ऋग्वेद की ऋचा हैं। मैं सूर्य हूँ और तू पृथिवी है। वे हम दोनों यहाँ पराक्रमी होवें तथा प्रजा को उत्पन्न करें। जब ऋचा संगीत के स्वरों, तानों तथा लयों से बँधी होती है, तो वह 'साम' कहलाती है। जैमिनि ने अपनी मीमांसा के सूत्र २/१/३६ में कहा है- 'गीतिषु सामाख्या' अर्थात् सामवेद की साम संज्ञा गीतों के कारण है। छान्दोग्य उपनिषद् 'स्वर' के साम का स्वरूप कहा गया है। उसके अनुसार 'का साम्नों गतिः ? स्वर इति होवाच' (छा०उ०१/८/४) अर्थात् साम की गति क्या है ? साम की गति स्वर अथवा तान में है। अतः संगीत का सौन्दर्य ही सामवेद को साम संज्ञा से विभूषित करता है। सामवेद का विभाजन :- सामवेद मुख्यतः दो भागों में संविभक्त है- आर्चिक तथा गान। आर्चिक का तात्पर्य है- ऋक् समूह। आर्चिक के भी पूर्वार्चिक तथा
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 154 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उत्तरार्चिक दो भाग हैं। पूर्वार्चिक में ५ अध्याय तथा उत्तरार्चिक में ९ अध्याय हैं। ये अध्याय 'प्रपाठक' की संज्ञा से विभूषित है। पूर्वार्चिक के प्रत्येक प्रपाठक में दो खण्ड उपलब्ध होते हैं। प्रत्येक खण्ड में एक 'दशति' प्राप्त होती है तथा दस ऋचाएँ मिलकर एक दशति का निर्माण करती है। किन्तु ऋचाओं की संख्या के विषय में १० ऋचाओं के नियम का पूर्णतः पालन नहीं किया गया है। किसी खण्ड में दस से कम ऋचाएँ प्राप्त होती हैं, किसी में दस से अधिक प्राप्त होती हैं। इन दशितयों में मन्त्रों के संग्रह का मुख्य आधार छन्द तथा देवताओं की एकता है। इसी आधार को लेकर भिन्न-भिन्न मण्डलों वाली तथा भिन्न-भिन्न ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत ऋग्वेदीय ऋचाएँ एक देवता से सम्बन्धित होने के कारण एक स्थान पर एकत्रित कर दी गई हैं। पूर्वार्चिक के ५ प्रपाठकों के नाम निम्नलिखित हैं- १. आग्नेय काण्ड २. ऐन्द्र काण्ड ३. पवमान काण्ड ४. आरण्यक काण्ड ५. महानाम्नी ऋचाएँ आग्नेय में अग्निविषयक मन्त्रों का समूह है। द्वितीय से लेकर चतुर्थ अध्याय तक एक ऐन्द्र पर्व या काण्ड है, इसमें इन्द्र पूर्ण ऐश्वर्य के साथ सबके नियन्त्रण की शक्ति से सम्पन्न वर्णित है। पवमान काण्ड में सोम सम्बन्धी ऋचाओं का संग्रह है। ये ऋग्वेद के नवममण्डल से उद्धृत की गई हैं। इसमें पवमान सोम उद्गीथ अर्थात् ऊपर उठाने वाला है। आरण्डयक काण्ड में उस एक ब्रह्म के अतिरिक्त समस्त सांसारिक प्रपञ्च को अमरणीय सिद्ध किया गया है। प्रभु के सम्पर्क में रहने वालों को आनन्द ही आनन्द है, दुःख नहीं। इसमें अनेक देवता तथा छन्द हैं किन्तु गान विषयक एकता है। अन्त में परिशिष्ट रूप में १० ऋचाएँ दी गई हैं। ये महानाम्नी ऋचाएँ कहलाती हैं। ये अपने अभिधान से ही महानाम वाली है। पूर्वार्चिक में संगृहीत मन्त्रों की कुल संख्या २५० है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है उत्तरार्चिक में ९ प्रपाठक हैं। आदि के पाँच प्रपाठकों में दो-दो भाग हैं अथवा अध्याय हैं, किन्तु अन्तिम चार प्रपाठकों में तीन- तीन भाग या अध्याय हैं। उत्तरार्चिक में कुल १२२५ मन्त्र हैं। यह संख्या पूर्णतः शुद्ध नहीं है क्योंकि उत्तरार्चिक में से २६७ मन्त्र पूर्वार्चिक से ही उद्धृत हैं। अतः दोनों आर्चिकों की संख्या १८७५ में २६७ पुनरुक्त मन्त्र तथा ९९ नवीन तथा ५ नवीन पुनरुक्त मन्त्रों को निकाल देने पर ऋग्वेद के उद्धृत मन्त्रों की संख्या १५०४ शेष रहती है। इस विषय को निम्नलिखित तालिका द्वारा समझा जा सकता है- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 155 ऋग्वेद की ऋचाएँ १५०४ + पुनरुक्त २६७ = कुल १७७१ नवीन ऋचाएँ ९९ + पुनरुक्त ५ = कुल १०४ सामवेद की कुल ऋचाएँ = १८७५ पूर्वार्चिक में ऋचाओं की रचना कतिपय छन्दों के आधार पर कतिपय देवताओं के आधार पर होती है, जबकि उत्तरार्चिक में गीतों की रचना प्रमुख यज्ञों के आधार पर की गई है। वस्तुतः उत्तरार्चिक पूर्वार्चिक की एक महत्त्वपूर्ण पूर्ति है। उत्तरार्चिक में जो तीन-चार ऋचाओं के सूक्त हैं, उनमें से अधिकांश की प्रारम्भिक ऋचाएँ पूर्वार्चिक में उपलब्ध होती हैं। शाखाएँ- पतञ्जलि ने सामवेद की एक हजार शाखाएँ बतलाई हैं। शौनक के भी 'चरण व्यूह' में सामवेद की एक हजार शाखाएँ हैं, किन्तु चरणव्यूह के टीकाकार 'महीदास' सामवेद की कुल तीन शाखाओं की उपलब्धि की सूचना देते हैं— १. कोथुमीय शाखा। २. राणायनीय शाखा। ३. जैमिनीय शाखा। कौथुमीय शाखा गुर्जर देश में, राणायनीय शाखा महाराष्ट्र में तथा जैमिनीय शाखा कर्नाटक प्रदेश में अधिक प्रसिद्ध है। विषय विवेचन :- पूर्वार्चिक के पाँच भागों में प्रथम भाग 'आग्नेय काण्ड' में अग्नि आगे ले जाने वाला है। इसमें अग्नि विषयक मन्त्रों का समवाय उपस्थित किया गया है। दूसरा काण्ड 'ऐन्द्र काण्ड' है। यह द्वितीय से लेकर चतुर्थ अध्याय तक फैला है। इसमें इन्द्र की स्तुति सम्बन्धी मन्त्रों का संग्रह है। इन्द्र सर्वाधिक शक्तिशाली देव के रूप में वर्णित है। उससे अधिक शक्ति सम्पन्न हो जाने का तो प्रश्न ही नहीं है। वह अभिञ्जु है, वजबाहु है, सब उसके नियन्त्रण में रहते हैं। वह अपने बल द्वारा पर्वतों को कँपा देता है, जिससे पृथ्वी में भूकम्प आ जाता है। सामवेद के अनुसार 'शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते' अर्थात् शास्त्र से रक्षित राष्ट्र में शास्त्रचिन्ता प्रवृत्त होती है। सम्राट को ऐसा होना चाहिए जिसका शासन प्रजा की रक्षा कर सके। सामवेदानुसार पीड़ित व्यक्ति की रक्षा आवश्यक है, अगर शासन इसमें समर्थ नहीं है तो यह पाप है। ऐन्द्र-काण्ड- अग्नि के अग्रनयन का मार्ग प्रशस्त करता है। समस्त साधक अग्नि से प्रार्थना करते हैं- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 156 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता 'अग्नि आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि।' अर्थात् हे अग्नि देवता! आ जाओ। हमको आगे ले चलो, आलोक में, ज्ञान में, कर्म में भी। हम आपसे हव्य दाति के लिए प्रार्थना करते हैं। तीसरा काण्ड 'पावमान काण्ड' की संज्ञा से विभूषित है। इसमें पवमान-सोम से सम्बद्ध ऋचाएँ संगृहीत हैं। यह सोम भी कवि है। पवमान-सोम का स्वरूप उर्ध्वारोहणकारी है। यह निम्नलिखित पदों से प्रकट होता है— १. 'वायुमारोह धर्मणा' (४८३) २. 'अजीजनद् दिवः ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत्' (४८४) ३. 'सिन्धोरूर्मावधिश्रितः' (४८६) १. अर्थात् प्राणायाम रूप धर्म से हवा में चढ़कर चल। २. अर्थात् पतितपावन परमात्मा ने द्युलोक की विचित्र वस्तु के सदृश महान् सूर्य के प्रकाश को उत्पन्न किया। ३. अर्थात् (मेधावी पुरुष) नदी की तरंग पर बैठकर, उसके साथ अति सरलता से बहता है। इसी काण्ड में भक्त सोम का आह्वान करता हुआ कहता है— आ सोम स्वानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया। जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दधिषे॥ (साम० ५१३) अर्थात् हे सोम देवता! आओ, अचल शक्तियों के साथ, शोभन प्राण के साथ मेघ सदृशमन्द ध्वनि करते हुए आओ। अवि से सम्बद्ध ऋत से परिवृत, चारों ओर आक्षादायक हरीतिमा छिटकाते हुए, आवरणों को पार करते हुए आओ। मेरे परमेश्वर! द्यावा पृथ्वी के मध्यस्थित हृदयपुरी में प्रवेश करें। इन्हीं के मध्य में स्थित वेदी पर अपना आसन ग्रहण करो। चतुर्थ काण्ड 'अरण्य काण्ड' के नाम से जाना जाता है। इसमें ईश्वर की व्यवस्था में सभी ऋतुओं को मनोहर बतलाया गया है— वसन्त इन्तु रन्यो ग्रीष्म इन्तु रन्यः। वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिरः इन्तु रन्यः॥ (साम० ६१६) अर्थात् (चैत्र तथा वैशाख मास) वसन्त ऋतु निश्चय ही रमणीय है, (ज्येष्ठ और आषाढ़ मास) ग्रीष्म ऋतु निश्चय ही मनोहर है, (श्रावण तथा भाद्रपद मास) वर्षा ऋतु, उसके पश्चात् होने वाली (आश्विन तथा कार्तिक मास) शरद ऋतु, (अग्रहायण CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 157 तथा पौष) हेमन्त ऋतु, (माघ तथा फाल्गुन मास) शिशिर ऋतु निश्चित ही रमणीय होता है। यहाँ पर अरण्य होते हुए भी रण्य दशा है। यहाँ पर शुभ-अशुभ का भेद समाप्त हो जाता है। पूर्वार्चिक के अन्त में दस महानाम्नी ऋचाएँ हैं। उदाहरणार्थ इन ऋचाओं का प्रथम मन्त्र यहाँ उद्धृत किया जाता है- विदा मघवन् विदा गातुमनुश१सिषो दिशः। शिक्षा शचीनां पते पूर्वींणां पुरूवसो॥ (साम० ६४१) अर्थात् हे पर्याप्त धन वाले प्रभो ! तू सर्वज्ञ है, समस्त अपूर्व श्रेष्ठ शक्तियों का स्वामी है। आप ही गन्तव्य स्थान पर ज्ञान कराइए, मार्गों की शिक्षा दीजिए। तू अनेक ज्ञानों का स्वामी है, सनातन है। पूर्वार्चिक के सदृश उत्तरार्चिक भी पाँच एवं चार अर्थात् कुल ९ प्रपाठकों में संविभक्त है, किन्तु उनमें मन्त्र क्रमबद्ध नहीं हैं। जबकि पूर्वार्चिक के मन्त्र क्रमबद्ध हैं। पूर्वार्चिक के समान ही उत्तरार्चिक में भी अनेक विषयों का प्रतिपादन हुआ है। इसकी अन्तिम ऋचाओं में युद्धकला का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। उत्तरार्चिक के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वान् विन्टरनिट्ज़ का कथन है- “We may compare the uttarārcika to a song in which the complete text of the song is given while it is presumed that the melodies are already known.” सामगान पद्धति :- वेदज्ञ ऋषियों ने सामयोनि मन्त्रों के माध्यम से गान मन्त्रों का निर्माण किया। ये गान चार प्रकार के होते हैं। उनके नाम निम्नांकित हैं- १. गेयगान २. आरण्यगान ३. ऊहगान ४. ऊह्यगान (रहस्य गान) इन गानों में प्रथम है- 'गेय गान' अथवा 'ग्रामे गेय गान।' जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ये गान गाँवों में, साधारण जनता के मध्य पाया जाता था। यह गान पूर्वार्चिक के प्रारम्भिक पाँच अध्यायों के ऊपर होता है। द्वितीय है- आरण्यगान। ये गान आरण्यक काण्ड में प्राप्त मन्त्रों का होता है। गेय-गान के विपरीत ये गान अरण्य में गाने योग्य होते हैं। सामवेद के मर्मज्ञों के अनुसार आरण्य गान के स्तोत्र विचित्र विलक्षणता से पूर्ण है। वे अत्यन्त पावन हैं। अरण्य का पावन वातावरण ही आरण्य
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३. अध्याय ५-६: १४ विद्याएं, ६४ कलाएं, वेदांग एवं व्यावहारिक विज्ञान का समन्वय
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 158 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गान के लिए उपयुक्त है। सामान्य जनता के मध्य इनका अनर्थ हो सकता है। तृतीय है- ऊहगान। यह विशेष रूप से उत्तरार्चिक में उपलब्ध मन्त्रों का होता है। 'ऊह' का अभिप्राय है ऊहन्, किसी उपयुक्त अवसर पर मन्त्रों का सामयिक परिवर्तन। इस विवेचनानुसार ऊहगान सोमयागों के अवसर पर प्रयोग किया जाना चाहिए। चतुर्थ है- ऊह्यगान। ये भी उत्तरार्चिक में प्राप्त मन्त्रों का होता है। ऊह्यगान को 'ऊह्य- रहस्यगान' के नाम से पुकारा जाता है क्योंकि ये रहस्यात्मक हैं। ये गान भी अरण्य गान के सदृश रहस्यात्मक होने के कारण सामान्य जनता के मध्य गायन के लिए वर्जित है। ऊह-गान तथा ऊह्य-गान, गेयगान एवं अरण्य गान की विकृति माने जाते हैं अर्थात् गेयगान में प्रयोग किए जाने वाले स्वर एवं रागादि के आधार पर ऊह-गान तथा अरण्य गान में प्रयोग किए जाने वाले स्वर एवं रागादि के आधार पर ऊह्य-गान का निर्माण हुआ है। पृथक्-पृथक् शाखाओं में ये गान पृथक्-पृथक् संख्या में उपलब्ध होते हैं। सर्वाधिक संख्या में गान जैमिनीय शाखा में निहित हैं-
| कौथुमीय गान | जैमिनीय गान | |
|---|---|---|
| गेय-गान | ११९७ | १२३२ |
| अरण्य-गान | २९४ | २९१ |
| ऊह-गान | १०२६ | १८०२ |
| ऊह्य-गान | २०५ | ३५६ |
| कुल योग | २७२२ | ३६८१ |
| साम के समस्त स्वरमण्डलों की संख्या 'नारद शिक्षा' में उपलब्ध होती है। कुल | ||
| स्वरमण्डल इस प्रकार है- ७ स्वर, ३ ग्राम, २१ मूर्छना और ४९ तान। | ||
| इन सात स्वरों की तुलना वेणु स्वरों में निम्नलिखित ढंग से की जा सकती है- | ||
| साम | वेणु | |
| :--- | :--- | |
| १. प्रथम | मध्यम/म | |
| २. द्वितीय | गान्धार/ग | |
| ३. तृतीय | ऋषभ्/रे | |
| ४. चतुर्थ | षडज/सा | |
| ५. पञ्चम | निषाद/नि | |
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 159 | ६. षष्ठ | धैवत/ध | | ७. सप्तम | पञ्चम/प | सामगानों में ये ही ७ तक के अंक विभिन्न स्वरों के स्वरूप को प्रकट करते हैं। सामविकार :- साम संहिता के दोनों भागों में मात्र संहिता पाठ उपलब्ध होता है। इन्हें 'गान' की संज्ञा अवान्तर काल में दी गई है। गान शब्द 'गै' (गान) धातु से निष्पन्न होता है। इन गानों द्वारा संगीत के तत्त्वों के माध्यम से ताल तथा लय का ज्ञान होता है। साम मन्त्रों का सामगानों के रूप में परिवर्तन करने के लिए अनेक शाब्दिक परिवर्तन किए जाते हैं। ये 'सामविकार' कहलाते हैं। सामविकारों की कुल संख्या ६ है, जो निम्नलिखित हैं- १. विकार- यह शाब्दिक परिवर्तन है। यथा 'अग्ने' के स्थान पर 'ओग्नायि' करना। २. विश्लेषण- इसमें एक पद पृथक् कर दिया जाता है। जैसे 'वीतये' के स्थान पर 'वोयि तोया तोया यि' कर दिया जाता है। ३. विकर्षण- इसमें एक ही स्वर का दीर्घकाल तक विभिन्न प्रकार से उच्चारण किया जाता है। जैसे- ये को या २३ यि करके उच्चारित करना। ४. अभ्यास- इसमें किसी भी पद का एक से अधिक बार उच्चारण किया जाता है। जैसे 'तोयायि' का दो बार उच्चारण किया जाता है। ५. विश्रामार्थ- किसी भी पद के मध्य में रुक जाने पर 'विराम' नामक 'सामविकार' होता है। जैसे- 'गृणानों हव्यदातये' में 'ह' पर विराम लिया जाता है। ६. स्तोभ- गायन के अनुकल पदों की 'स्तोभ' संज्ञा है, जैसे औ, होवा, हाउआ आदि। भाषाशास्त्र में इन विकारों का बड़ा महत्त्व है। स्तोभ एवं विष्टुति- स्तुति का एक दूसरा रूप 'स्तोभ' कहलाता है। ये स्तोभ यज्ञ यागों के अवसर पर प्रयुक्त किए जाते हैं। ताण्ड्य ब्राह्मण में इनका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इन स्तोभों की कुल संख्या नौ हैं, जो इस प्रकार है। १. त्रिवृत २. पञ्चदश ३. सप्तदश ४. एकविंश ५. त्रिणव ६. त्रयस्त्रिंश ७. चतुर्विंश ८. चतुश्चत्वारिंश ९. अष्टचत्वारिंश 'विष्टुति' एक विशेष प्रकार की स्तुति की संज्ञा है। इस स्तुति में स्तोभ को तृचों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 160 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर साम के गानों की आवृत्ति की जाती है। प्रत्येक तृच तीन पर्यायों में गाया जाता है। अतः नौ स्तोभों की कुल विष्टुतियाँ २८ हुई। सामगान के पञ्चभाग :- सामगान की प्रणाली अत्यन्त जटिल है। सामगान के पञ्चविभाग होते हैं- १. प्रस्ताव- वह मन्त्र पूर्वांश है। प्रस्तोता को 'प्रस्तोत' संज्ञक ऋत्विज् गाता है। २. उद्गीथ- इसका प्रारम्भ ओ३म् से किया जाता है। इसे 'उद्गाता' गाता है। ३. प्रतिहार- इसे प्रतिहर्त्ता गाता है। यह कभी-कभी दो भागों में विभाजित कर दिया जाता है। ४. उपद्रव- यह पुनः उद्गाता द्वारा ही गया जाता है। ५. निधन- इसमें ओ३म् रहता है। इसे प्रस्तोता, उद्गाता एवं प्रतिहर्त्ता- तीनों ऋत्विजों द्वारा गया जाता है। उदाहरणार्थ सामवेद का प्रथम मन्त्र प्रस्तुत है- अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि॥ १॥ इसका गायन निम्नलिखित रूप में होगा। १. हुँ ओग्नाई (प्रस्ताव) २. ओ३म् आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये (उद्गीथ) ३. नि होता सत्सि बर्हिषि ओ३म् (प्रतिहार) ४. नि होता सत्सिब (उपद्रव) ५. र्हिषि ओ३म् (निधन)। यह साम जब तीन बार गाया जाता है, तो 'स्तोभ' कहलाता है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार साम के सात प्रकार हैं- १. हिंकार, २. प्रस्ताव, ३. आदि, ४. उद्गीथ, ५. प्रतिहार, ६. उपद्रव, ७. निधन। सामवेद का महत्त्व :- इस प्रकार सामसंहिता का भारतीय यज्ञों एवं आभिचारिक इतिहास के लिए अति महत्त्व है। यज्ञीय आवश्यकता के अतिरिक्त भारतीय संगीत-शास्त्र का मूल आधार इसके साम-गायन में ही है। इसका अर्थ यह है कि विनियोगात्मक, कलात्मक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से भी साम-संहिता वैदिक वाङ्गमय में अत्यन्त उपयोगी संहिता के रूप में मान्य है। एक ओर तो साम-संगीत · CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 161 हमारे हृदय की वीणा के तारों को झंकृत करते हैं, तो दूसरी ओर साम-संहिता के प्रार्थना मन्त्रों का संग्रह भक्ति रूपी गंगा में स्नान का आनन्द प्रदान करता है। सामवेद में सोम विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, तथा दार्शनिक दृष्टि से यह सोम शिवतत्त्व के रूप में स्वीकृत है। अतः सामसंहिता संगीत एवं भक्ति के माध्यम से शिव तत्त्व की प्राप्ति का साधन है। शतपथ-ब्राह्मण में तो सामवेद तथा सामगान के महत्त्व के विषय में यहाँ तक लिखा है कि "न असाम यज्ञो भवति। नवा अहिंकृत्य सामगीयते।" अर्थात् कोई भी यज्ञ सामगान के बिना पूर्ण नहीं होता है तथा सामगान भी हिंकार के बिना सम्भव नहीं। इससे सामवेद तथा उसके सामगान का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है।
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