भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 353 में से

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पृष्ठ 201

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 173 आजकल वैज्ञानिक युग में भी इस प्रकार के टोनों-टुटकों के सम्बन्ध में भारतवासियों का गहरा विश्वास है। अनेक तान्त्रिक इस प्रकार के प्रयोगों को सत्य बताते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर, प्रयोग किए जाने पर ये सफल होते हुए देखे गए हैं। इन क्रियाओं में कोई त्रुटि हो जाने पर या मन्त्रोच्चारण में त्रुटि मात्र से अनुष्ठान विपरीत परिणामदायक भी होते देखे गए हैं। (स) घृणास्पदमन्त्र- जब मनुष्य या स्त्री किसी विपरीत लिंगी के प्रति पागलपन की सीमा तक कामासक्त हो जाता है, तो वह उसको येन केन प्रकारेण प्राप्त करना चाहता है। इस सिद्धि के लिए बहुत लोग नीचता के निम्नतम स्तर तक उतर जाते हैं। जब घृणित विधियों द्वारा उन्हें इच्छित फल की प्राप्ति नहीं होती है तो कभी अपने फल प्राप्ति के मार्ग में बाधक के प्रति तथा कभी उस इच्छित व्यक्ति या स्त्री के प्रति अहित का चिन्तन कर कर्मों में संलग्न हो जाते हैं, जिससे प्रतिस्पर्द्धा अथवा इच्छित व्यक्ति या स्त्री को पीड़ा पहुँचे। इन समस्त क्रियाओं की सिद्धी के लिए भी अथर्ववेद में अनेक मन्त्र मिलते हैं। इन गीतों की भाषा अनियन्त्रित तथ वन्यता से परिपूर्ण है। ऐसा ही एक मन्त्र उदाहरणार्थ प्रस्तुत है जिसका प्रयोग एक स्त्री द्वारा सपत्नी को परास्त तथा बहिष्कृत करने के लिए किया जाता है— भर्ग॑मस्या॒ वर्च॒ आद॒िष्यधि॑ वृ॒क्षादि॑व॒ स्रज॑म्। म॒हाबु॒ध्न इव॒ पर्व॑तो॒ ज्योक् पि॒तृष्व॑स्ताम्॥ (अथर्व० १/१४/१) इसी प्रकार कतिपय मन्त्र प्रतिपस्पर्द्धिनी स्त्री को वन्ध्या करने के उद्देश्य से ही प्रयोग किए जाते हैं। सर्वाधिक भयानक तो वह मन्त्र हैं जिनमें किसी पुरुष को पुरुषत्व से हीन करके, उसे संतानोत्पत्ति की शक्ति से च्युत करने के लिए प्रार्थना निहित है। यथा— अपि॑ वृश्च पुरा॒णवद् व्र॒ततै॑रिव गु॒ष्पितम्। ओजो॑ दास॒स्य॑ दम्भय॥ (अथर्व० ७/९०/१) अर्थात् पुराण (प्राचीन) नियमानुसार दुःख देने वाले पुरुष के बल को बेल के गाँठ के सदृश निश्चय करके काट दें तथा हटा दें। इन उपर्युक्त तीनों प्रकार के मन्त्रों का अभिधान आभिचारिक है क्योंकि इनका प्रयोग बहुधा किसी के मरण, मोहन अथवा उच्चाटन के लिए किया जाता है। राजकर्माणि सूक्त- ये सूक्त राजाओं के व्यवहार से सम्बन्धित है। कुछ मन्त्र ऐसे हैं जिनमें शत्रु विजय के लिए प्रार्थना की गयी है। क्वचित् अस्त्रशस्त्रों के वर्णन के भी दर्शन होते हैं। सम्भवतः इसी कारण इस वेद को क्षत्रवेद के नाम से भी पुकारते CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar