वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 353 में से
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172 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
मूर्ति के हृदय को बेधता है। साथ ही साथ कामदेव के तीर द्वारा प्रेमिका का हृदय बिद्ध हो जाय, यह याचना करता हुआ अथर्ववेद के तीसरे काण्ड के २५वें सूक्त के चौथे मन्त्र का पाठ भी करता है। यथा- शुचा॑ वि॒द्धा व्योष॒या शुष्का॑स्या॒भि सर्प मा। मृ॒दुर्मन्युः केव॑ली प्रि॒यवा॒दिन्यनु॑व्रता।। (अथर्व० ३/२५/४) अर्थात् विशेष दाह करने वाली, पीड़ा से बिधी हुई, सूखे मुख वाली, मृदु स्वभाव वाली, निरभिमान (होकर), सेवनीया, प्रियम्बदा तथा अनुकूल आचरण वाली (पतिव्रता के समान) मेरी ओर चली आ। इसके साथ ही कुछ ऐसे भी मन्त्र प्राप्त होते हैं, जो नायिकाओं द्वारा सपत्नी को हटाकर अपने पति के वशीकरण हेतु प्रयुक्त किए जाते हैं। इनके द्वारा स्त्री, किसी भी मनचाहे पुरुष को अपनी ओर आकृष्ट कर सकती है। पूर्वोक्त क्रिया के समान ही इस क्रिया में भी नायिका अपने इच्छित प्रेमी की एक मिट्टी की मूर्ति बनाती है, तत्पश्चात् अग्नि से दग्ध बाण के अग्रभाग से उसके मस्तक पर प्रहार भी करती है। इस क्रिया में इस गीत का उच्चारण भी किया जाता है- उन्मा॑दयत मरुत॒ उद॑न्तरिक्ष मादय। अग्न॒ उन्मा॑दया त्वम॒सौ मामनु॑ शोचतु।। (अथर्व० ६/१३०/४) अर्थात् हे मरुत! उसको (पति को) तुम उन्मादित करो। हे अन्तरिक्ष! तथा हे अग्नि! उसे उन्मादित करो, जिससे वह मेरा ही विचार किया करे। इन सभी प्रकार की वशीकरण अभिक्रियाओं में बाण की रचना विशिष्ट होती है। बाण के पंखों के लिए उल्लू के पंख प्रयोग में लाए जाते हैं तथा काण्ड एक काली लकड़ी से बनाया जाता है। इस बाण के अग्र भाग पर एक नुकीला काँटा लगा होता है। इसी प्रकार रूठकर दूर गए पति को मन्त्रों की शक्ति से वापस बुलाने का भी उपक्रम किया जाता था। इसमें निम्नलिखित मन्त्र का पाठ किया जाना चाहिए- यद् धाव॑सि त्रियोज॒नं प॑ञ्चयोजनमाश्वि॒नम्। तत॒स्त्वं पुन॒राया॑सि पु॒त्राणां॑ नो असः पि॒ता।। (अथर्व० ६/१३१/३) अर्थात् (मेरे प्रियतम) जो तू तीन योजन, पाँच योजन या अश्ववार से चलने योग्य देश को भागकर जाता है, उससे तू पुनः (लौटकर) आ तथा हमारे पुत्रों का पिता हो जा।
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar