वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
द्वितीय अध्याय 175 इस सूक्त में पृथ्वी का चारुतम चित्रण किया गया है। पृथ्वी के आधिदैविक तथा आधभौतिक, इन दोनों ही रूपों की स्तुति करते हुए यह स्पष्ट रूप में प्रतिपादित किया गया है कि यह सम्पूर्ण पृथ्वी मातृस्वरूप है। इस सूक्त के सम्बन्ध में प० बलदेव उपाध्याय जी ने अपने शब्दों में इस प्रकार लिखा है— 'भाषा तथा भाव की दृष्टि से नितान्त उदात्त, भाव-प्रवण तथा सरस है। पृथ्वी की महिमा का यह वर्णन स्वातन्त्र्य के प्रेमी तथा स्वच्छन्दता के रसिक आथर्वण ऋषि का हृदयोद्गार है। इस शैली का प्रौढ़ काव्य, उच्च कल्पना तथा भव्य भावुकता वैदिक साहित्य में भी अन्यत्र दुर्लभ है। इस सूक्त में आथर्वण ऋषि ने ६३ मन्त्रों में मातृस्वरूपिणी भूमि की समग्र पार्थिव पदार्थों की जननी तथा पोषिका के रूप में महिमा उद्घोषित की है तथा प्रजा को समस्त बुराइयों, क्लेशों तथा अनर्थों से बचाने तथा सुख समृद्धि की वृद्धि के लिए प्रार्थना की है। इस सूक्त में मातृभूमि की बड़ी ही मनोरम कल्पना की गई है। मातृभूमि का रुचिर वर्णन देशभक्ति की प्रेरणा का मधुर विलास है।' इस सूक्त में अनेक प्रकार से पृथ्वी की भव्य स्तुति की गई है। अपने कल्याण के लिए की गई प्रार्थनाओं में निम्नलिखित मन्त्र का आशय कितना श्रेष्ठ है— यस्ते॑ स॒र्पो वृश्चि॑कस्तृ॒ष्टदं॑शमा हेमन्त॒र्जव्यो॑ भृम॒लो गुहा॒ शये॑। क्रिमि॒र्जन्व॑त् पृथि॒वि॒ यद्यदेज॑ति प्रा॒वृषि॒ तन्नः॑ सर्प॒न्मोप॑ सृ॒पद् यच्छि॒वं तेन॑ नो॒ मृड॥४६॥ (अथर्व० १२/१/४६) अर्थात् हे मातृभूमि ! तुम्हारे गह्वरों में सर्प, बिच्छू आदि अनेक ऐसे जीव जन्तु निवास करते हैं जो कि काटने से संपात उत्पन्न करते हैं। हे मातृभूमि ! वे विषैले जीव हमें कदापि हानि न पहुँचायें और जो पदार्थ हमारे लिए कल्याणकारी तथा सुखदायी हो, वे हमें प्राप्त होवें। अतः भूमि-सूक्त अत्यन्त मनोरम तथा आदर्शमण्डित है। याज्ञिक सूक्त- अथर्ववेद में अनेक मन्त्र यज्ञ से भी सम्बन्धित हैं। इसमें तरह- तरह के यज्ञों के विधान बतलाए गए हैं। यज्ञ सम्बन्धी मन्त्रों का संग्रह अथर्ववेद में उत्तरांश में हुआ है। अथर्ववेद में भी अन्य वेदों के विषयवस्तु में यज्ञों की प्रधानता के सदृश यज्ञीय नियमों तथा अनुष्ठानों का समावेश किया गया है। इस प्रकार के मन्त्रों का संग्रह मुख्यरूप से १६वें तथा १८वें काण्ड में हुआ है। काण्ड १८ के चारों सूक्त पितृमेध से सम्बन्ध रखते हैं। इन मन्त्रों का सम्बन्ध अन्त्येष्टि-क्रिया से है। इसी प्रकार
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar