वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 176 | वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन्त्रों का समूह हमें ऋग्वेद के दशम काण्ड में भी दृष्टिगोचर होता है। दर्शनीय विषय तो यह है कि अन्त्येष्टि-क्रिया सम्बन्धी अथर्ववेद मन्त्र अक्षरशः ऋग्वेद से उद्धृत किए गए हैं। उनमें पूर्णतः समानता है। १६वें तथा १७वें काण्ड के अतिरिक्त २०वें काण्ड में भी यज्ञ सम्बन्धी मन्त्र उपलब्ध होते हैं। ये मन्त्र सोम-यज्ञ विषयक हैं। कुन्ताप सूक्त- अथर्ववेद के २०वें काण्ड में कतिपय विचित्र सूक्त उपलब्ध होते हैं। इन विचित्र सूक्तों के मन्त्र अथवा गीत एक विशेष चमत्कारिक प्रणाली में ग्रथित हैं। इन मन्त्रों का संयोजन करने वाले सूक्त कुन्ताप-सूक्त के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका विस्तार अथर्ववेद के २०वें काण्ड के १२७वें सूक्त से लेकर १३६वें सूक्त तक हैं। इन सूक्तों की विषयवस्तु का जहाँ तक प्रश्न है, इनमें यज्ञ से सम्बन्धित दान-स्तुति, कतिपय परिगणित राजकुमारों की औदार्य-प्रशस्ति तथा कतिपय प्रहेलिकाएँ तथा उनके समाधान भी वर्णित हैं। इन गीतों में कहीं तो अश्लीलता की दुर्गन्ध है और कहीं शिष्ट हास-परिहास की सुवास। इनमें अल्पदिवसीय तथा बहुदिवसीय दोनों प्रकार के यज्ञों का विवेचन किया गया है। ये सूक्त पुरोहितों के वार्तालाप के आधार पर प्रणीत हुए। कुन्ताप का अर्थ इस प्रकार किया गया है- 'कुँ नाम कुत्सितं भवति यत् तत् तपति तस्मात् कुंतापः' अर्थात् जो पाप या दोष को जलाने वाला है, वह कुन्ताप है। दार्शनिक सूक्त- अथर्ववेद में अनेक मन्त्रों में दर्शन से सम्बन्धित विषयों का प्रतिपादन है। इनमें ईश्वर प्रजापति, ब्रह्म, मन, प्राण आदि का वर्णन हुआ है। इन मन्त्रों में हमें गम्भीर दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन दृष्टिगोचर होता है। दार्शनिक सूक्तों में तीन प्रकार के सूक्त उपलब्ध होते हैं- (अ) ब्रह्मणयानि सूक्त (ब) उच्छिष्ट सूक्त (स) व्रात्य काण्ड ब्रह्मणयानि सूक्तों में परमेश्वर तथा परब्रह्म के स्वरूप तथा कार्यों के विषय पर प्रकाश डाला गया है। परब्रह्मपरमात्मा को अनेक नामों द्वारा विभूषित किया गया है। इन नामों में एक नाम काल भी है। अथर्ववेदानुसार काल ही विश्व का उत्पादक, पोषक तथा संहारक है। वह प्रजापति का भी अभिभावक है। अतः काल को ही परमतत्त्व कहा गया है- काले॒ तप॑ः काले॒ ज्येष्ठं॑ काले॒ ब्रह्म॑ समाहि॑तम्। का॒लो ह॒ सर्व॑स्येश्वरो॒ यः पि॒तासी॑त् प्र॒जाप॑तेः॥८॥ (अथर्व० १९/५३/८) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar