वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 205, कुल 353 में से
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द्वितीय अध्याय 177 अर्थात् काल में तप, काल श्रेष्ठ कर्म, काल में वेदज्ञान संगृहीत किया गया है। काल ही सबका स्वामी है, जो (काल) प्रजापति का पिता (सदृश) हुआ है। सम्भवतः इन्हीं सूक्तों के कारण ही अथर्ववेद का 'ब्रह्मवेद' नाम भी पड़ा। अथर्ववेद में परब्रह्मपरमात्मा को जिन अनेक नामों से पुकारा गया है, उनमें 'स्कम्भ' तथा 'उच्छिष्ट' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 'ब्रह्म' का भी हेतु होने के कारण 'स्कम्भ' ही 'ज्येष्ठ ब्रह्म' के नाम से पुकारा जाता है। इसमें सम्पूर्ण जगत् समाविष्ट है— यस्मि॒न् भूमि॑र॒न्तरि॑क्षं॒ द्यौर्यस्मि॒न्नध्याहि॑ता। यत्रा॒ग्निश्चन्द्रमा॒ः सूर्यो॑ वा॒तस्तिष्ठ॒न्त्यार्पि॑ताः स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः स्विदेव सः॥१२॥ (अथर्व० १०/७/१२) अर्थात् जिसमें भूमि, अन्तरिक्ष तथा आकाश दृढ़ स्थापित है। जिसमें अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य और वायु भलीभाँति स्थिर होकर रहते हैं, वह कौन सा निश्चय करते हैं, उसको तू 'स्कम्भ' कहा। परमेश्वर का एक अन्य नाम 'उच्छिष्ट' भी है। यह अभिधान अथर्ववेद के सातवें सूक्त में उल्लिखित है। उच्छिष्ट का शाब्दिक अर्थ है- शेष, जूठन आदि। माया जगत् के अतिरिक्त शेष पदार्थ 'उच्छिष्ट' है। 'काल' तथा 'स्कम्भ' की भाँति उच्छिष्ट से भी समस्त प्रपञ्च की उत्पत्ति बताई गई है— यच्च॑ प्रा॒णति॑ प्रा॒णेन॒ यच्च॒ पश्य॑ति॒ चक्षु॑षा। उ॒च्छिष्टा॑ज्जज्ञिरे॒ सर्वे॑ दि॒वि दे॒वा दि॒विश्रित॑ः॥२३॥ (अथर्व० ११/९/२३) अर्थात् और जो कुछ प्राण के साथ जीता है, और जो कुछ आँख से देखता है, आकाश में, सूर्य में स्थित समस्त गतिशील लोक 'शेष' (उच्छिष्ट) से उत्पन्न हुए। अथर्ववेद का १५वाँ काण्ड 'व्रात्य काण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है। इस 'व्रात्य काण्ड' में भी 'ब्रह्मण्यानि' तथा 'उच्छिष्ट सूक्त' की भाँति आध्यात्मिक विषयों का विवेचन हुआ है। पैप्पलाद शाखा के अनुसार— 'व्रात्यो वा इदम् अग्रआसीत्' अर्थात् यह व्रात्य ही आदि में वर्तमान था। अतः इससे यह ध्वनित होता है कि 'व्रात्य' भी 'ब्रह्म' का दूसरा अभिधान कहा गया है। व्रात्य से ही भूमि, अग्नि तथा औषधियों का आगमन हुआ—
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