भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 178 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता तं भूमि॑श्चा॒ग्निश्चौष॑धयश्च॒ वन॒स्पत॑यश्च वा॒न॒स्प॒त्याश्च॑ वी॒रुध॑श्चानु॒व्य॑ चलन्॥ २॥ (अथर्व० १५/६/२) अर्थात् भूमि तथा अग्नि तथा औषधियों तथा वनस्पतियों से उत्पन्न पदार्थ और लताएँ उसके पीछे-पीछे चलने लगे। 'उसके' से यहाँ तात्पर्य 'व्रात्य के' से है। अतः अथर्ववेद में दार्शनिक विषयों का सुन्दर निरूपण हुआ है। इसके विपरीत पाश्चात्य वेदज्ञों ने अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि अथर्ववेद में हमें विशिष्ट दार्शनिकता के दर्शन नहीं होते हैं। उनके अनुसार ऋग्वेदकालीन दार्शनिक परम्परा का पूर्ण विकास हमें उपनिषदों में ही मिलता है। इस सम्बन्ध में विन्टरनिट्ज ने इस प्रकार कहा है— It is not the yearning and searching for truth, for the solution of dark riddles of the universe, which inspire the authors of these hymns, but they, too, are only conjurers who pose as philosophers by misusing the well-known philosophical expressions in an ingenious, or rather artificial well of foolish and non-sensible plays of fancy, in order to create an impression of the mystical, the mysterious, what at the first glance appears to be as profundity, is often in reality nothing but empty monger behind which there is more nonsense that profound sense. विन्टरनिट्ज के इस विचार से हम सहमत नहीं हैं। कुछ भी हो किसी न किसी रूप में अथर्ववेद में हमें आध्यात्मिक विचारों के दर्शन होते ही हैं। रोहित सूक्त- अथर्ववेद में कतिपय ऐसे सूक्त हैं, जिनमें स्फुटविषयों का प्रतिपादन हुआ है। इन सूक्तों को 'रोहित सूक्त' कहा जाता है। अनेक विद्वानों ने इन सूक्तों में भी दार्शनिक तत्त्वों का समावेश स्वीकार किया है। ये सूक्त अथर्ववेद के १३वें काण्ड में संगृहीत हैं। इसमें जिस 'रोहित' का वर्णन हुआ है, वह संसार के समस्त कार्यों का नियन्ता है, सबका उत्पादक है— उदे॑हि॒ वाजि॒न् यो अ॒प्स्व॑१न्तरि॒दं राष्ट्रं प्र वि॑श सूनृ॒ता॑वत्। यो रोहि॑तो॒ विश्व॑मि॒दं ज॒जान॒ स त्वा॑ रा॒ष्ट्राय सुभृ॑तं बिभर्तु॥ १॥ (अथर्व० १३/१/१) अर्थात् हे बलवान्! उन्नत हो, सुनीति से युक्त हो व इस राज्य में प्रवेश करा जो रोहित सबका उत्पादक है, प्रजाओं के भीतर है तथा जिस (परमात्मा) ने यह विश्व उत्पन्न किया है, वह बड़े-बड़े पोषणकर्त्ता तुझको राज्य करने के लिए धारण करें। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar