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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

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द्वितीय अध्याय 179 अथर्ववेद में विज्ञान जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि अथर्ववेद में आयुर्विज्ञान से सम्बन्धित अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध होती है। विभिन्न रोगों तथा उनके निदानों का तो वर्णन हुआ ही है, साथ ही शल्य-चिकित्सा का भी आश्चर्यजनक संकेत मिलता है। इनमें मूत्राघात हेतु शरशालका द्वारा मूत्र का निष्कासन तथा सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि-भेदन का निर्देश प्राप्त होता है। 'विषस्य विषमौषधम्' का मेडिकल साइंस का अचूक सिद्धान्त वस्तुतः अथर्ववेद का ही उद्घोष है। अतः आयुर्विज्ञान की दृष्टि से अथर्ववेद संग्रहणीय, पठनीय तथा मननीय शास्त्र है। भौतिकशास्त्र के महत्त्वपूर्ण विषयों का भी अथर्ववेद में आधुनिक विज्ञान से समानता रखने वाला विवेचन उपलब्ध होता है। अथर्ववेद के पाँचवें काण्ड के पाँचवें सूक्त में लाक्षा (लाख) का प्रामाणिक वर्णन वैज्ञानिकों के मत में उपादेय है- यद् दण्डेन॒ यदिष्वा॒ यद् वारु॑ह॒र॑सा कृतम्। तस्य॒ त्वम॑सि निष्कृ॑तिः सेमं निष्कृ॑धि पूरु॑षम्॥४॥ (अथर्व० ५/५/४) अर्थात् जो कुछ दण्ड से, जो कुछ तीर से, अथवा जो कुछ घाव बल द्वारा किया गया है, उसको तू (लाख) ठीक करने वाली है, वह तू इस पुरुष को ठीक कर दे। आधुनिक विज्ञान के अनुसार लाख की उत्पत्ति विशेषतः वर्षाकाल की अन्धकारपूर्ण रातों में होती है। इस वैज्ञानिक तथ्य की सूचना हमें निम्नलिखित अथर्ववेदीय मन्त्र में होती है- रात्री॑ मा॒ता नभ॑ः पि॒तार्य॒मा ते॑ पिताम॒हः। सि॒लाची॒ नाम॒ वा असि॒ सा दे॒वाना॑मसि॒ स्वसा॑।। १।। (अथर्व० ५/५/१) अर्थात् (हे परमात्मा!) तेरी निर्माणशक्ति विश्रामदायक रात के समान, पालने वाला गुण आकाश या मेघ के समान और पितामह हमारे पालने वाले का पालक तेरा गुण विघ्नों को रोकने वाले सूर्य के समान है। सिलाची नामक अवश्य ही तू है, सो तू दिव्य गुणों को अच्छे प्रकार से प्रकाश करने वाली शक्ति है। इस प्रकार अथर्ववेद वैज्ञानिक दृष्टि से भी मानव समाज के लिए कल्याणकारी है। अथर्ववेद परवर्ती है या नहीं- पाश्चात्य वैदिक विद्वानों ने अथर्ववेद को अन्य तीनों वेदों का समकालिक नहीं माना है। इसका कारण केवल वेदत्रयी शब्द की अत्यधिक प्रसिद्धि है। उन लोगों के अनुसार पहले तीन वेदों का ही अस्तित्व था। वह

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar