वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 353 में से
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180 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता तीन वेद थे- ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद। अथर्ववेद तो अवान्तरकालीन रचना है। उन लोगों ने अपने विचार की पुष्टि में यह तर्क दिया है कि ऋग्वेद में अथर्ववेद का उल्लेख तक नहीं है। अतः अथर्ववेद परवर्ती है। किन्तु अधिक सूक्ष्मता से मनन करने पर विदित होता है कि पाश्चात्य वेदज्ञों के तर्कों में बल नहीं है। वस्तुतः अथर्ववेद की रचना भी अन्य तीनों वेदों की रचना के समय ही हुई है। इस विषय में भारतीय वेदज्ञ जो तर्क प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, वे निम्नलिखित हैं- (१) वस्तुतः पाश्चात्य वेदज्ञों में 'वेदत्रयी' शब्द के अर्थ के विषय में भ्रम व्याप्त है। 'वेदत्रयी' से तात्पर्य— ऋक् संहिता, यजुः संहिता तथा साम संहिता नहीं है बल्कि इसका वाच्य विद्यापरक है। जैमिनी के अनुसार इनके अर्थ इस प्रकार हैं- (क) तेषामृग् यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था (ख) गीतिषु सामाख्या (ग) शेषे यजुः शब्दः। अर्थात् पादव्यवस्थायुक्त छन्दों में उपनिबद्ध मन्त्र 'ऋक्' पदवाच्य है, स्थूल दृष्टि से इन्हें 'पद्य' भी कह सकते हैं। साम का तात्पर्य गीति तथा गान होता है। ऋक् तथा साम के अतिरिक्त शेष मन्त्र 'यजुष्' कहलाते हैं। 'यजुष् मन्त्र' गद्यात्मक स्वीकार किए गए हैं। ऋचाओं की अधिकता होने के कारण उनका संग्रह 'ऋग्वेद' कहलाया। 'सामवेद' को यह अभिधान सामों की मुख्यता होने के कारण मिला। 'यजुर्वेद' के नामकरण का आधार यजुषों का प्राधान्य होना है किन्तु अथर्ववेद में किसी एक विषय का एक प्रकार की प्रधानता नहीं है। उसमें तीनों ही वस्तुएँ समान रूप से समाविष्ट है। अतः उसका नामकरण किसी एक इकाई के आधार पर नहीं किया गया। अतः उसका नाम उसके मन्त्रद्रष्टा ऋषि 'अथर्वा' के नाम पर रख दिया गया। (२) ऋग्वेद में ऋषि अथर्वा का कई बार नामोल्लेख हुआ है- 'यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते' तथा 'अग्निर्जातो अथर्वणां।' केवल इतना ही नहीं, ऋग्वेद में अथर्ववेदीय ऋषि भृगु तथा अङ्गिरा के परिवार में क्रमशः १२ तथा ४५ अर्थात् कुल ५७ ऋषि हैं जो ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों के साक्षात्कर्त्ता हैं। इससे ज्ञात होता है कि ऋग्वेद ही अथर्ववेद का ऋणी हैं। ऋग्वेद में 'छन्दासि' के नाम से आथर्वण ऋषि का उल्लेख है। अतः अथर्ववेद को परवर्तीकालीन कहना सत्यता को न मानना है। उपसंहार- अथर्ववेद का महत्त्व - अथर्ववेद में चित्रित संस्कृति मानव समाज के प्रारम्भिक युग से अपना सम्बन्ध रखती है। अथर्ववेद में तत्कालीन समाज में प्रचलित रीति-
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar