वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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180 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता तीन वेद थे- ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद। अथर्ववेद तो अवान्तरकालीन रचना है। उन लोगों ने अपने विचार की पुष्टि में यह तर्क दिया है कि ऋग्वेद में अथर्ववेद का उल्लेख तक नहीं है। अतः अथर्ववेद परवर्ती है। किन्तु अधिक सूक्ष्मता से मनन करने पर विदित होता है कि पाश्चात्य वेदज्ञों के तर्कों में बल नहीं है। वस्तुतः अथर्ववेद की रचना भी अन्य तीनों वेदों की रचना के समय ही हुई है। इस विषय में भारतीय वेदज्ञ जो तर्क प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, वे निम्नलिखित हैं- (१) वस्तुतः पाश्चात्य वेदज्ञों में 'वेदत्रयी' शब्द के अर्थ के विषय में भ्रम व्याप्त है। 'वेदत्रयी' से तात्पर्य— ऋक् संहिता, यजुः संहिता तथा साम संहिता नहीं है बल्कि इसका वाच्य विद्यापरक है। जैमिनी के अनुसार इनके अर्थ इस प्रकार हैं- (क) तेषामृग् यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था (ख) गीतिषु सामाख्या (ग) शेषे यजुः शब्दः। अर्थात् पादव्यवस्थायुक्त छन्दों में उपनिबद्ध मन्त्र 'ऋक्' पदवाच्य है, स्थूल दृष्टि से इन्हें 'पद्य' भी कह सकते हैं। साम का तात्पर्य गीति तथा गान होता है। ऋक् तथा साम के अतिरिक्त शेष मन्त्र 'यजुष्' कहलाते हैं। 'यजुष् मन्त्र' गद्यात्मक स्वीकार किए गए हैं। ऋचाओं की अधिकता होने के कारण उनका संग्रह 'ऋग्वेद' कहलाया। 'सामवेद' को यह अभिधान सामों की मुख्यता होने के कारण मिला। 'यजुर्वेद' के नामकरण का आधार यजुषों का प्राधान्य होना है किन्तु अथर्ववेद में किसी एक विषय का एक प्रकार की प्रधानता नहीं है। उसमें तीनों ही वस्तुएँ समान रूप से समाविष्ट है। अतः उसका नामकरण किसी एक इकाई के आधार पर नहीं किया गया। अतः उसका नाम उसके मन्त्रद्रष्टा ऋषि 'अथर्वा' के नाम पर रख दिया गया। (२) ऋग्वेद में ऋषि अथर्वा का कई बार नामोल्लेख हुआ है- 'यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते' तथा 'अग्निर्जातो अथर्वणां।' केवल इतना ही नहीं, ऋग्वेद में अथर्ववेदीय ऋषि भृगु तथा अङ्गिरा के परिवार में क्रमशः १२ तथा ४५ अर्थात् कुल ५७ ऋषि हैं जो ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों के साक्षात्कर्त्ता हैं। इससे ज्ञात होता है कि ऋग्वेद ही अथर्ववेद का ऋणी हैं। ऋग्वेद में 'छन्दासि' के नाम से आथर्वण ऋषि का उल्लेख है। अतः अथर्ववेद को परवर्तीकालीन कहना सत्यता को न मानना है। उपसंहार- अथर्ववेद का महत्त्व - अथर्ववेद में चित्रित संस्कृति मानव समाज के प्रारम्भिक युग से अपना सम्बन्ध रखती है। अथर्ववेद में तत्कालीन समाज में प्रचलित रीति-
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 181 रिवाज, प्रथाएँ, मान्यताएँ, अन्धविश्वास, रूढ़ियों, जादू-टोने, कृत्या प्रयोग, अभिसार कर्म, सम्मोहन, वशीकरण, जड़ी-बूटियों आदि का व्यापक निरूपण है। यह अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा लोक सांस्कृतिक सामग्री का विश्वकोश है। इसीलिए मैकडॉनल का कथन है कि 'सभ्यता के इतिवृत्त' के अध्ययन के लिए ऋग्वेद की अपेक्षा अथर्ववेद में उपलभ्यमान सामग्री कहीं अधिक रोचक एवं महत्त्वपूर्ण हैं। अन्य विषय :- अब तक किये गये विषयों के विवेचन के अतिरिक्त अन्य विषयों पर भी अथर्ववेद में न्यूनाधिक्य जानकारी दी गयी है। इसमें ऋग्वेद के सदृश सामाजिक विषयों तथा व्यवस्थाओं पर भी कुछ मन्त्र प्राप्त होते हैं। इसमें समाज के समस्त वर्गों में परस्पर मृदु सम्बन्धों की आवश्यकता पर बल दिया गया है— प्रि॒यं मा॑ कृणु दे॒वेषु॑ प्रि॒यं राज॑सु मा कृणु। प्रि॒यं सर्व॑स्य॒ पश्य॑त उ॒त शूद्र उ॒तार्ये॑॥१॥ (अथर्व० ११) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय खण्ड – परिशीलन तृतीय अध्याय ऋग्वेद में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. ऋग्वेद में निरूपित राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के आधारतत्त्व : वेद, सत्य ज्ञान की अप्रतिम-राशि एवं विश्व के पुस्तकालय में प्राचीनतम ग्रंथ है। इसमें वर्णित सब कुछ जो भूत में वर्णित माना जाय तो वही आज के सन्दर्भ में भी नवीनतम ही दिखलाई देता है। उसमें समस्त त्रिकाल-सत्य सिद्धान्तों का समावेश है। अर्थात् उनमें जो कुछ लिखा है– वह भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल में शाश्वत सत्य समझा जा सकता है। मानव जीवन का आदर्श रूप में निर्वाह करने के लिये उनमें समस्त सिद्धान्तों का बीज रूप में समावेश है। सृष्टि के आरम्भिक युग में ही मानव समाज ने एक सुसंगठित समाज की आवश्यकता अनुभव की थी और जनसंख्या की वृद्धि के साथ ही समाजों में भी वृद्धि हुई और कालान्तर में मानव स्वभाव में विद्यमान स्वभावविभिन्नता ने उन्हें पृथक्- पृथक् समूहों में रहने पर विवश कर दिया और यहीं से आरम्भ हुई पृथक्-पृथक् राष्ट्रों के निर्माण की प्रक्रिया। इन राष्ट्रों की अपनी अलग-अलग सभ्यता और संस्कृति होती है। ऋग्वेद में राजनीति से सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्यों को सम्यक् रूप से उद्घाटित किया गया है। इस वेद में राजनीति के मानवीय मूल्यों एवं राष्ट्रीयचेतना के सार्वभौम स्वरूप का सम्यक् विश्लेषण किया गया है। सम्पूर्ण मानवजाति को एक ही ईश्वर की सन्तान के रूप में परिभाषित किया गया है और उससे अपने सन्तानों की अच्छी प्रकार से पालन-पोषण की याचना की गई है– स न॑ः पि॒तेव॑ सून॒वेऽग्ने॑ सू॒पाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑।।१ अर्थात् मनुष्यों को ईश्वर से याचना करते हुए अपने अर्थात् मानवजाति के लिए इस प्रकार कहना चाहिए– हे ईश्वर! जैसे पिता अपने पुत्रों को श्रेष्ठ मानव का स्वरूप देने के लिए उत्तम शिक्षा देकर और समुचित प्रकार के संस्कार देकर उनको सद्गुणों से युक्त बनाकर श्रेष्ठ कार्यों को सम्पन्न करने योग्य बना देता है, वैसे ही आप हम लोगों को शुभ गुणों से युक्त, शुभ कर्मों को करने की प्रेरणा दीजिये। १. ऋग्वेद १/१/९ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 183 इस मंत्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि परमेश्वर को पिता और सम्पूर्ण मानव जाति को सन्तान मानकर विश्व को एक परिवार का स्वरूप प्रदान किया गया है। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण है क्योंकि एक पिता की सन्तान मानकर सम्पूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने की बात कही गई है। और इस तरह की भावना से पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। द्वेषहीन मानवसमाज से ही एकता और अखण्डता की बात सोची जा सकती है। ऋग्वेद की राजनीति में मानवतावाद और जनकल्याण की भावना सर्वत्र परिलक्षित हो रही है। मानवजाति की सुख, शान्ति और उसे वैभवपूर्ण बनाये रखने की भावना निहित है। यु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑। शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा॥१ अर्थात् ईश्वर ने मनुष्य को उसकी शक्तियों एवं सुख सुविधा की ओर इंगित किया है कि एक उत्तम राज्य और उसको धन, आवागमन के आधुनिक साधनों से सम्पन्न करने के लिये उसे पृथ्वी, जल और वायु आदि के गुण व ज्ञान से अवगत होकर उनसे लाभ उठाना होगा। राष्ट्र की एकता एवम् अखण्डता को सुरक्षित बनाने के लिये उसका विकास एवं समृद्धि आवश्यक है ताकि बाह्य व आन्तरिक सुरक्षा को खतरा न रहे। हम किसी भी क्षेत्र में पराश्रित न हों। शत्रुओं से टक्कर लेने में हम अपने आप में पूर्णतया सक्षम हों, तभी हमारा राष्ट्र सुरक्षित रहेगा। म॒हाँ इ॑न्द्रः पर॑श्च॒ नु म॑हि॒त्वम॑स्तु वज्रिणे॑। द्यौर्न प्र॑थि॒ना शव॑ः॥२ अर्थात् 'धार्मिक युद्ध करने वाले मनुष्यों को उचित है कि जो शूरवीर युद्ध में अति धीर मनुष्यों के साथ होकर दुष्ट शत्रुओं पर अपनी विजय प्राप्त की है, इस विजय के लिए हमें परमेश्वर को धन्यवाद करना चाहिये ताकि निरभिमान होकर राष्ट्र की सदैव उन्नति होती रहे।' राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद में स्वराज्य की अवधारणा को स्पष्ट किया गया है। 'स्वराज्य से यहाँ अभिप्राय स्वयं पर शासन करने से है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने पर नियंत्रण रखेगा। अपनी समस्त बुराइयों और दुर्गुणों पर नियंत्रण रखकर अपने साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की उन्नति में प्रयत्नशील रहता है, यही स्वराज्य का प्रतीक है। उत्तम स्वराज्य-शासन सूर्य के समान है एवं प्रलय १. ऋग्वेद १/६/२ २. ऋग्वेद १/८/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 184 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर्यन्त अविचल रहने वाला बतलाया गया है। यस्य॑ ते॒ नू चि॑दा॒दिशं॒ न मि॒नन्ति॑ स्व॒राज्य॑म्। न दे॒वो नाध्रि॑गुर्जनः॥१ इस मंत्र में स्वराज्य को सर्वोत्तम राज्य व्यवस्था स्वीकार किया गया है और इसकी दृढ़ता को स्वीकार किया गया है। इसका संचालन यदि आदर्श रूप में किया जाये तो इसके अस्तित्व को कभी कोई खतरा नहीं हो सकता। ऐसे राष्ट्र युगों-युगों तक सूर्य के समान अटल बनकर अपने अस्तित्व को बनाये रखते हैं। अस्य॒ हि स्वय॑शस्तरं सवि॒तुः कच्छन॒ प्रियम्। न मि॒नन्ति॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् उत्तम-आदर्श-स्वराज्य-शासन के तेज की अनन्य-राशि सूर्य के प्रकाश अथवा जगदुत्पादक परमेश्वर से तुलना की गई है। जिस प्रकार पूर्ण रूप से व्यवस्थित होने के कारण सूर्य या ईश्वर की सत्ता का कभी विनाश सम्भव नहीं है, उसी प्रकार उत्तम गुण से युक्त एवं आदर्श राज्य शासन एवं अधिकारियों की छत्रछाया में स्वराज्य-शासन का भी कभी विनाश नहीं हो सकता। प्रत्येक राष्ट्र के लिये यह आवश्यक है कि वहाँ के नागरिकों में राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार होना चाहिये। मातृभूमि को अपनी जन्मदात्री माँ के सदृश मानने वाले राष्ट्रभक्त ही राष्ट्र के वास्तविक भक्त होते हैं। उनमें आपस में बन्धुत्व की भावना सदा जागृत रहनी चाहिये। जो राष्ट्र का संचालन करते हैं उन्हें भी विद्वान् होना आवश्यक है। सारे राष्ट्र की निष्ठा एवं विश्वास उनमें निहित होना चाहिये और उन्हें भी पितासदृश संरक्षण देकर सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये। नागरिकों में इस प्रकार की उदात्त भावना उस दशा में ही संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति में परस्पर समभाव हो और कोई किसी को ज्येष्ठ या कनिष्ठ न समझे। यह भाव जाति या धर्म या किसी वर्ग आदि के आधार पर भी नहीं होना चाहिये। ते अ॑ज्ये॒ष्ठा अ॑कनि॒ष्ठास॒ उद्भिदोऽम॑ध्यमासो॒ मह॑सा वि वा॑वृधुः। सु॒जा॒तासो॑ जु॒नुषा॒ पृश्नि॑मातरो दि॒वो मर्या आ नो॒ अच्छा॑ जिगातन॥३ अर्थात् राष्ट्र भक्तों में किसी प्रकार की ज्येष्ठता एवं कनिष्ठता की भावना नहीं होनी चाहिये। सभी को अपने सद्प्रयत्नों से राष्ट्र की उन्नति के लिये प्रयत्नशील होना १. ऋग्वेद ८/९३/११ २. वही ५/८२/२ ३. ऋग्वेद ५/५९/६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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तृतीय अध्याय 185 चाहिये। विचारशील एवं उच्च महत्त्वाकांक्षा वाले राष्ट्रवासियों से ही राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को बल प्राप्त होता है। सामूहिक हित की भावना से ही सबकी उन्नति सम्भव है और सभी की उन्नति से ही राष्ट्र की दृढ़ता बढ़ती है। उसकी एकता और अखण्डता और मजबूत होती है। इ॒ळा सर॑स्वती म॒ही ति॒स्रो दे॒वीर्म॑यो॒भुवः॑। ब॒र्हिः सी॑दन्त्व॒स्रिधः॑॥१ अर्थात् राष्ट्रभक्तों में समानता की भावना आवश्यक बताते हुए इस तथ्य को निरूपित किया गया है कि प्रत्येक राष्ट्र की भाषा, संस्कृति एवं भूमि ही सुखप्रदाता एवं श्रेयस्कर देवता है। इनकी ही उन्नति करने से वास्तविक राष्ट्रीयउन्नति सम्भव हो सकती है और राष्ट्रीयउन्नति से ही सामूहिक सुख प्राप्त हो सकता है। भाषा एवं संस्कृति सुरक्षित रहे तो मातृभूमि या राष्ट्र पर कोई भी बाह्यशक्ति या शत्रु प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता है। यही कारण है कि ये पदार्थ राष्ट्र के सर्वाधिक उपयोगी होने के साथ-साथ महान् सुखप्रदाता देवता माने गये हैं। शत्रु से राष्ट्र की रक्षा सबसे अहम् बात है क्योंकि शत्रु ही सदैव एक संगठित राष्ट्र के टुकड़े करने के लिये, उसकी अखण्डता पर प्रहार करने के लिये अवसर खोजा करते हैं। इन राष्ट्र के शत्रुओं से प्रहरियों को सदैव सावधान रहना चाहिये क्योंकि ये राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद में उल्लिखित है— प्रेह्य॒र्भीहि॑ धृष्णु॒हि न ते॒ वज्रो॒ नि यं॑सते। इन्द्र॒ नृम्णं हि ते॒ शवो॒ हनो॑ वृ॒त्रं जया॑ अ॒पोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् स्वराज्य शासन की प्रतिष्ठा अविचल रखने के लिये आवश्यक है कि शत्रु का विनाश किया जावे। जिस प्रकार सूर्य को मेघ के हनन में कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, अपितु सहज रूप से ही उसका हनन हो जाता है। इसी प्रकार राष्ट्रप्रेमी भक्तों की इस प्रकार सुव्यवस्था हो कि शत्रुओं का बिना किसी चेष्टा के ही नाश हो जावे। यदा कदा परिस्थितिवश शत्रु पर पुनः पुनः आक्रमण करना पड़ता है और अत्यन्त धैर्य के साथ विपत्ति का सामना करना पड़ता है। उसमें जो वीर सफल होते हैं, उनसे ही यह आशा की जा सकती है कि वे स्वराज्य शासन की गरिमा एवं महिमा का विस्तार कर सकेंगे। सं गोम॑दिन्द्र॒ वाज॑वद॒स्मे पृथु श्रवो॑ बृ॒हत्। वि॒श्वायु॑र्धेह्यक्षि॑तम्॥३ १. ऋग्वेद १/१३/९ २. ऋग्वेद १/८०/३ ३. ऋग्वेद १/९/७
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 186 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् पुरुषार्थ ही व्यक्ति के मनोरथों को सफल कर सकता है, सिर्फ कामना से कुछ भी नहीं हो सकता है। जीवन में ब्रह्मचर्य का धारण, विषयों के अतिक्रमण का त्याग, भोजनादि में श्रेष्ठ नियमों का पालन कर चक्रवर्ती राज्य की लक्ष्मी की सिद्धि मात्र पुरुषार्थ के द्वारा ही सम्भव है। ईश्वर की प्रार्थना मात्र से मनोरथ सिद्ध नहीं होते। इन सबकी प्राप्ति के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना ही उचित है। प्रत्येक कार्य की सफलता तभी सम्भव है जबकि मनुष्य स्वयं ही उसमें प्राण पण से संलग्न रहे। सिर्फ मनोरथ से कार्य सिद्ध होना संभव नहीं है। सु॒विवृतं॑ सु॒निर॒जमिन्द्र॑ त्वादा॑त॒मिद्गश॑ः। गवा॒मर्प॑ व्र॒जं वृ॑धि कृ॒णुष्व॑ राधो॑ अद्रिवः॥१ अर्थात् हे ईश्वर जैसे विश्व की सृष्टि में सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि की उत्पत्ति करके, उसे अपना यश व आशीष प्रदान करके प्रसिद्धि दिलाई है वैसे ही आप मुझ मानवजाति पर कृपा करके अपनी इन्द्रियों आदि की शुद्धि के साथ विद्या, ज्ञान और धर्म के प्रकाश से युक्त कीर्ति, विद्या, धन और वैभवशाली राज्य प्रदान करके सब मनुष्यों को निरन्तर आनन्दित एवं कीर्तिमान बनायें। राष्ट्र में किसी के प्रति भेदभाव और ईर्ष्या द्वेष उचित नहीं है। जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा सदैव लोकोपकार में निरत हैं, उसी प्रकार सम्राट को भी सदैव प्रजाजनों के हित के बारे में ही विचार करना चाहिए- इन्द्रा॑वरुणयोर॒हं सम्राजो॒रव॒ आ वृ॑णे। ता नौ॑ मृळात ई॒दृशे॑॥२ अर्थात् जैसे प्रकाशमान, संसार के उपकार करने, सब सुखों के देने, व्यवहारों के हेतु और चक्रवर्ती राजा के समान सब की रक्षा करने वाले सूर्य तथा चन्द्रमा हैं, वैसे ही हम लोगों को होना चाहिये। जब राष्ट्र में सभी लोग सुख समृद्धि से पूर्ण होते हैं और अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं तब उन्हें अपने राष्ट्र की सुरक्षा का पूर्ण ध्यान रहता है। सारी चिन्ताओं से मुक्त नागरिक राष्ट्र के प्रति समर्पित होते हैं। उन्हें एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या नहीं होती, राष्ट्र व राष्ट्र के शासन के प्रति संतुष्टि उन्हें राष्ट्र के प्रति समर्पित बनाती है। ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर अखण्डसाम्राज्य की भावना अभिव्यक्त की गई है। यह अखण्ड साम्राज्य आज की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का ही प्रतीक है। १. ऋग्वेद १/१०/७ २. ऋग्वेद १/१७/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 187 सार्वभौमअखण्डराष्ट्र की संस्थिति तभी संभव है जबकि राष्ट्रवासियों में पारस्परिक प्रेम, सद्भाव एवं बंधुत्व की भावना का विकास हो। राष्ट्र के लोगों को उद्यमी कर्मण्य, परिश्रम से न घबराने वालें और सत्य व धर्म का अनुकरण करने वाले होने चाहियें। वैज्ञानिक गतिविधियों को उस काल में ही बहुत महत्त्व दिया गया था, वायुयान, जलयान और रथों आदि का निर्माण उनके लिये बहुत ही सरल कार्य था। राष्ट्र की सुरक्षा के लिये आवश्यक था कि राष्ट्र में इन सब चीजों की प्रचुरता हो ताकि शत्रु का सामना पूर्ण शान्ति के साथ करके विजयश्री प्राप्त की जा सके। सं वो॒ मदा॑सो अ॒ग्मतेन्द्रे॑ण च म॒रुत्व॑ता। आ॒दि॒त्यैर्भि॒श्च राज॑भिः॥१ अर्थात् राष्ट्र के विद्वान्पुरुष वायु और विद्युत की शक्ति का उपयोग करके सूर्य की किरणों के समान आग्नेयादि अस्त्र, असि आदि शस्त्र और विमान आदि यानों को सिद्ध करते हैं तभी वे शत्रुओं का वीरतापूर्वक सामना करके अपने राष्ट्र को सुख एवं शान्ति से पूर्ण बनाने में सफल होते हैं। राष्ट्र में शिक्षा का पूर्ण प्रसार होना चाहिये, शिक्षा व्यक्ति को वैचारिक संकीर्णता से मुक्त कराती है। वह छोटी-छोटी बातों को लेकर मन में न वैमनस्य पालते हैं और न ही आपस में शत्रुता का भाव रखते है। शिक्षा से उनका ज्ञान विस्तृत होता है। राष्ट्र के आपातकाल में भी वे सदैव राष्ट्र के प्रति जागरूक रहते हैं। सभी उनके कार्यों के अनुरूप शिक्षा देने से वे अपने कार्य में विशेषज्ञ बन जाते हैं। अपने-अपने कार्यों की विशिष्टता से परिचित होते हैं। उन कार्यों का सुचारूपूर्वक सम्पादन करते हैं। राष्ट्र का शासन कार्य भी सुशिक्षित एवं प्रशिक्षित लोगों से अच्छी तरह सम्पन्न होता है। जरा॑बोध॒ तद्वि॑विद्धि॒ विशे॑विशे य॒ज्ञिया॑य। स्तोमं॑ रु॒द्राय॑ दृ॒शीक॑म्॥२ अर्थात् युद्ध विद्या के ज्ञाता लोगों के गुणों का श्रवण किये बिना इस बात का ज्ञान नहीं होता कि कहाँ किस प्रकार युद्ध में अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करना चाहिये। जो प्रजा के सुख के लिए शत्रुओं का सामना करने के उद्देश्य से सैनिकों को प्रशिक्षित करते हैं, वही प्रजापालन के कर्तव्यों को पूर्ण कर पाते हैं। समग्र रूप से यदि ऋग्वेद में वर्णित प्रसंगों को देखा जाय तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के आधारतत्त्व पूर्ण रूप से विद्यमान है और आज की विपरीत परिस्थितियों के अनुरूप उसमें समाधान भी प्रस्तुत किये गये हैं और यही कारण है कि वेद सदैव वर्तमान रहते हैं। उनके प्रसंग १. ऋग्वेद १/२०/५ २. ऋग्वेद १/२७/१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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188 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कभी भूतकालिक हो ही नहीं सकते हैं। २. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के समाज दर्शन का अनुशीलन वैदिकवाङ्ग्मय में तत्कालीन भारतीयसमाज का जो चित्र अंकित है, उसके विश्लेषण से ज्ञात होता है कि वह अत्यन्त सुख सौमनस्यपूर्ण, समता एवं समरसता मूलक और स्वस्थ मानसिक विकास की आधारशिला पर प्रतिष्ठित अवधारणा थी। समाज का वर्गीकरण विभिन्न व्यावसायिक पृष्ठभूमि के आधार पर किया गया था। परिवार संयुक्त होते हुए भी उनमें प्रत्येक व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास के अवसर प्रदान किये जाते थे। हर क्षेत्र में कार्य करने का उन्हें अधिकार था। स्त्री और पुरुष के मध्य कोई भी भेद नहीं किया जाता था। पारिवारिक पृष्ठभूमि यदि संयुक्त थी तब भी उनके मध्य खींचतान की प्रवृत्ति न होकर पारस्परिक दायित्व की ग्रहणशीलता और सहयोग की दृष्टि निहित थी। समाज के सभी वर्गों में परस्पर प्रेम की भावना थी। (क) वर्ण व्यवस्था :- ऋग्वैदिक समाज, श्रम विभाजन के सिद्धान्त के अनुरूप चार वर्गों में विभक्त दिखलाई देता है। सुप्रसिद्ध 'पुरुष-सूक्त' में समाज की परिकल्पना पुरुष के रूप में विभिन्न वर्णों की योजना उसके विविध अवयवों के रूप में की गई है- ब्राह्मणो॑ऽस्य॒ मुख॑मासीद् बा॒हू रा॑ज॒न्य॑: कृ॒तः। ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्य॑: प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत।१ अर्थात् समाज में बने चार वर्णों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा जी के मुख से, बाहुओं से क्षत्रिय जाति की, जंघाओं से वैश्य की और पैरों से शूद्र का जन्म माना गया है। इसी के अनुरूप ही समाजशास्त्रियों ने भी समाज को जीवित शरीर माना है।२ इससे मिलकर ही समाज का निर्माण हुआ है। समाजशास्त्रियों ने सामाजिक वर्गीकरण का आधार इसी को स्वीकार किया है। वैदिक युग में यह वर्ण विभाजन जन्मानुसार न होकर कर्मानुसार ही होता था और जैसे मानव शरीर के सभी अंग एक दूसरे से सम्बद्ध है, शरीर के किसी एक अंग के रोग से पीड़ित होने पर पूरे शरीर को कष्ट होता है, ठीक उसी प्रकार एक वर्ण के कष्ट की अनुभूति दूसरे वर्ण को होना भी स्वाभाविक था। १. ऋग्वेद १०/९०/१२ २. हर्बर्ट स्पेन्सर आदि।
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तृतीय अध्याय 189 ब्राह्मणों के लिए वेदों का अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन प्रमुख कार्य थे, किन्तु कृषि प्रभृति कार्यों से भी वे उस समय विरत न थे। राज्यसंचालन और युद्धों में भाग लेना भी उनको अस्वाभाविक न था। क्षत्रिय-वर्ण के लिये तो शासन, सुव्यवस्था आदि कार्य निश्चित थे फिर भी अन्य कार्यों को करने के लिये उन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। यही बात वैश्यों पर भी लागू होती थी। उनके लिये प्रमुख कार्य पशु-पालन, कृषि और वाणिज्य आदि थे। शूद्रों का कर्म समाज की सेवा सुश्रुषा करना कहा गया है किन्तु उस समय इस वर्ग के प्रति कोई तिरस्कार या उपेक्षा का भाव नहीं दिखलाई देता था। (ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिकयुग में मानवजीवन को कर्म, धर्म, नियम आदि की दृष्टि से उसकी पूर्ण आयु को १०० वर्ष का अनुमान करके २५-२५ वर्ष की आयु के चार वर्ग बनाकर उन्हें अलग-अलग चार आश्रमों के नाम देकर उसके कार्य, धर्म आदि निश्चित कर दिये गये थे। इनका अनुकरण करता हुआ मनुष्य अपने जीवन के अन्तिम लक्ष्य, मोक्ष तक पहुँच ही जाता है। जीवन के आरम्भ से २५ वर्ष की आयु तक का काल 'ब्रह्मचर्य-आश्रम' का काल कहा जाता है। इसमें व्यक्ति विद्या ग्रहण करने का कार्य अपनी सम्पूर्ण निष्ठा से करता है। अध्ययनकाल पूर्ण करने के बाद ही वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। स प्र॒त्नथा॑ स॒हसा॑ जा॒यमा॑नः स॒द्यः काव्या॑नि बळ्धत्त वि॒श्वा॑। आ॒प॑श्च मि॒त्रं धिष॑णा च सा॒धन्दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम् ॥१ अर्थात् मनुष्य ब्रह्मचर्य और विद्या की प्राप्ति के बिना कवि नहीं हो सकता और न कविता के बिना परमेश्वर एवं बिजुली को जानकर कार्यों को कर सकता है। इससे उक्त ब्रह्मचर्य आदि नियम का अनुष्ठान नित्य करना चाहिये। ब्रह्मचर्य के जीवन के बाद व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है और आयु के ५० वर्ष तक का काल वह इसमें व्यतीत करता है। इसमें रहकर ही वह जीवन के तीनों ऋण- देवऋण, ऋषिऋण एवं पितृऋण से मुक्ति हेतु सत्कर्म करता है। जीवन के धर्म के कार्य वह सपत्नीक पूर्ण करता है। धार्मिक अनुष्ठानों को भी वह सपत्नीक ही पूर्ण करता है। सन्तान के जन्म से वह वंश की परम्परा को आगे बढ़ाता है। यद॒द्य भा॒गं विभ॒जासि॑ नृ॒भ्य॒ उ॒षो दे॑वि मर्त्य॒त्रा सु॑जाते। दे॒वो नो॒ अत्र॑ सवि॒ता दमो॑ना॒ अना॑गसो वोचतु॒ सूर्या॑य ॥२ १. ऋग्वेद १/९६/१ २. ऋग्वेद १/१२३/३
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 190 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् जब दो स्त्री-पुरुष विद्वावान्, धर्म का आचरण और विद्या का प्रचार करने वाले सदा परस्पर प्रसन्न हों तब गृहस्थाश्रम में अत्यन्त सुख का सेवन करने वाले व्यक्ति हों। गृहस्थाश्रम की आयु पूर्ण करने पर व्यक्ति को 'वानप्रस्थ आश्रम' में प्रवेश करने का आदेश है। ५० से ७५ वर्ष की आयु तक वह वानप्रस्थ आश्रम में रहता है। इस काल में वह घर में सपत्नीक रहते हुए अपना सम्पूर्ण समय पूजा-पाठ, जप-तप में व्यतीत करने लगता है। सांसारिक मायामोह से मुक्त होकर वह संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने की तैयारी करता है। ७५ वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति 'संन्यास आश्रम' में प्रवेश करता है। इसमें वह गृह त्याग कर वन में जाकर तपस्या करता है और जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिये ही तन और मन से समर्पित हो जाता है। पृक्षो वपु॑ः पितुमा॒न्नित्य॒ आ शये॑ द्वि॒तीय॒मा स॒प्तशि॑वासु मा॒तृषु॑। तृ॒तीय॑मस्य वृष॒भस्य॑ दोह॒से दश॑प्रमतिं जनयन्त्॒ योषण॑ः॥१ अर्थात् जो मनुष्य इस जगत् में सात प्रकार के लोकों में ब्रह्मचर्य से प्रथम, गृहस्थाश्रम से द्वितीय और वानप्रस्थ एवं संन्यास से तृतीय कर्म तथा उपासना के विज्ञान को प्राप्त होते हैं, वे दस इन्द्रियों, दस प्राणों के विषयक मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और जीव के ज्ञान को प्राप्त होते हैं। (ग) पुरुषार्थ :- मानव जीवन में पुरुषार्थ का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि जीवन के कार्यों, धर्मों और नियमों के निर्माण का आधार यह पुरुषार्थ ही है। इन पुरुषार्थों की पूर्ति में ही वह सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर देता है। नैतिक नियमों का भी उल्लेखनीय योगदान है। ए॒तायामोप॑ ग॒व्यन्त॒ इन्द्र॑म॒स्माकं॑ सु प्रम॑तिं वावृधाति। अ॒ना॑मृणः कु॒विदा॒दस्य॑ रा॒यो गवां॒ केतं॑ परमा॒वज॑ते नः॥२ अर्थात् "मनुष्यों को योग्य है कि संसार में अविद्या का नाश तथा विद्या का दान करने से उच्च कोटि के धन सम्पत्ति को बढ़ावें तथा उस परमेश्वर की आज्ञा का पालन और उपासना करके उसी से शरीर तथा आत्मा का बल नित्य बढ़ायें। उनकी सहायता के बिना कोई भी मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी फल को प्राप्त १. ऋग्वेद १/१४१/३ २. ऋग्वेद १/३३/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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तृतीय अध्याय 191 करने में कभी भी समर्थ एवं सफल नहीं हो सकता है।" जीवन में निश्चित इन चार पुरुषार्थों के सम्बन्ध व्यक्ति के इहलोक और परलोक दोनों से भी जुड़ा हुआ है। सर्वप्रथम धर्म का सम्बन्ध तो व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक जुड़ा रहता है। उसका हर कार्य धर्मानुरूप होना चाहिये तभी उसे सार्थक कहा जा सकता है। इस कार्य के लिये सम्पूर्ण जीवन काल ही निश्चित किया गया है। इसके पश्चात् दूसरे स्तर पर अर्थ आता है। इस अर्थ के द्वारा ही सारे कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। अतः इसकी महत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। इस धन (अर्थ) के द्वारा ही वह अपने धार्मिक, पारिवारिक एवं सामाजिक कार्यों को पूर्ण करता है। यह अर्थ धर्मपूर्ण तरीके से कमाया हुआ होना चाहिये तभी उसका उपयोग सफल होगा। चोरी, डकैती या बेइमानी से कमाया हुआ धन का स्रोत न्यायपूर्ण एवं धार्मिक न होने के कारण वह धर्मसंगत अर्थ नहीं कहा जा सकता है। पूजा, यज्ञ, अनुष्ठान, दान आदि में प्रयुक्त धन धर्मपूर्ण ढंग से अर्जित किया हुआ होना चाहिये। गृहस्थाश्रम का आधार 'काम' की इच्छा है। जीवन की अनिवार्यता होने के कारण ही उसे जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। इसके द्वारा ही मानव अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हुए प्रजा की उत्पत्ति में संलग्न होता है। पत्नी के साथ मिलकर ही धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण किये जाते हैं। 'काम' को शारीरिक सुख की दृष्टि से ही नहीं देखा जाता। इस भावना को गौण मानकर ही गृहस्थाश्रम के दायित्वों की पूर्ति का 'साधनमात्र' माना जा सकता है। इसी सन्दर्भ में निम्न मंत्र उल्लेखनीय है— ब्रह्म॑णस्पते॒ त्वम॒स्य य॒न्ता सू॒क्तस्य॑ बोधि॒ तन॑यं च जिन्व। विश्वं॒ तद्भ॒द्रं यदव॑न्ति दे॒वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीरा॑:॥१ अर्थात् मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह वेद के नियमों को सुन्दर अर्थ में ग्रहण करके, युवावस्था में स्वयंवर विवाह कर, धर्म से सन्तानों की उत्पत्ति और रक्षा कर अपने 'कामधर्म' का पालन करते हुए उन्हें भी यथावत् ब्रह्मचर्य की सुन्दर शिक्षा प्रदान करते हुए उन्हें विद्वान् बनाकर अपना और विश्व का सुख बढ़ाये। जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष का सम्बन्ध सम्पूर्ण क्रियाकलापों से जुड़ा हुआ है। जीवन में धर्म, अर्थ, काम- तीनों की यथोचित पूर्ति के पश्चात् उसका मन इन सबसे विरक्त होकर ईश्वरोन्मुख हो जाता है और वह ईश्वर की उपासना में अपने आपको समर्पित कर देता है और इसी जप, तप, पूजा, अर्चना से उसको मोक्ष प्राप्त होता है। ———————————————————— १. ऋग्वेद २/२४/१६
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 192 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता नारी की स्थिति :- वैदिक ऋषियों ने स्त्री और पुरुष को समकक्ष स्थान पर रखा था। जीवनरूपी वाहन के ये दोनों दो चक्र हैं। इनमें से एक के बिना भी इसके चलने की कोई संभावना नहीं रहती है और इसी कारण जन्म से ही बालक एवं बालिका दोनों के लालन-पालन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है। पारिवारिक जीवन में स्त्री को गृहिणी, जननी और सहचरी तीनों रूपों से परिचित कराया जाता है। ऋग्वेद के सूर्या सूक्त (१०/८५) में स्त्री के गृहिणी स्वरूप की सम्यक् रीति से समीक्षा की गई है। नवविवाहित वधू को अपने घर में प्रवेश करने और सब पर शासन करने के लिए आमंत्रित करने का उल्लेख निम्नांकित मंत्र में स्पष्ट परिलक्षित है- गृहा॒न्गच्छ॑ गृ॒हप॑त्नी यथासो॑ व॒शिनी॒ त्वं वि॒दथ॒मा व॑दासि।१ गृहस्थी के दायित्वों के प्रति गृहिणी को 'गार्हपत्याय जागृति' (ऋ०सं० १०/२५/२७) कहकर जागरूक रखा गया है। सास, ससुर, नन्दों एवं देवरों सहित वह सम्पूर्ण परिवार के 'साम्राज्ञी' के गौरवस्पद पद पर प्रतिष्ठित की गई है- स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव॒ स॒म्राज्ञी॒ श्व॒श्र्वां भव॑। नना॑न्दरि स॒म्राज्ञी॑ भव स॒म्राज्ञी॒ अधि॑ दे॒वृषु॑॥२ नारी को साम्राज्ञी के पद से विभूषित किया गया है और उससे सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य निर्वाह की आशा की जाती थी और उसे सम्मानीय स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। व्यु॒च्छन्ती॒ हि र॒श्मिभि॒र्विश्व॑मा॒भासि॑ रोच॒नम्। तां त्वामु॑षर्वसूय॒वो गी॒र्भिः कण्वा॑ अहूषत॥३ अर्थात् विद्वानों को समझना चाहिये कि स्त्री के गुण अवर्णनीय होते हैं। उसकी तुलना उषा के गुणों के तुल्य समझे जाने चाहिये और उन्हें इस बात को समझते हुए सबको उपदेश देना चाहिये। उस युग में अपने वैदुष्य के कारण कितनी ही स्त्रियों को विशिष्ट सम्मान प्राप्त हुआ। इनमें से अनेक को मंत्र साक्षात्कार करने में भी प्रतिष्ठा मिली है। सम्पूर्ण रूप से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि नारी को ऋग्वेद काल में सम्माननीय स्थान प्राप्त था। विवाह :- वैदिक युग में बालविवाह की प्रथा नहीं थी। विवाह वर और कन्या १. ऋग्वेद १०/८५/२६ २. ऋग्वेद १०/८५/४६ ३. ऋग्वेद १/४९/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 193 के द्वारा पूर्ण यौवन प्राप्ति के पश्चात् ही होता था। ऋग्वेद में सूर्या और सोम के विवाह का वर्णन (१०/८५) से सम्बद्ध मंत्रों से यह तथ्य सुप्रमाणित है। सगोत्रीय विवाह निषिद्ध थे। कन्या को पति चयन की स्वतंत्रता प्राप्त थी। विवाह में मध्यवर्ग कभी बाधा नहीं बना। वर्ण का कोई बन्धन नहीं था। प्रेम विवाहों का भी ऋग्वेद में उदाहरण दिया गया है। ऋग्वेद में चर्चित (ऋ०सं० ९/६७/१०-१२) राजा रथवीति की राजकुमारी के प्रति ऋषिश्यावाश्य के हृदय में प्रणय-भावना की उत्पत्ति और बाद में विवाह का उल्लेख किया गया है। उस समय 'एक पत्नी-विवाह' का ही उल्लेख मिलता है। बहुपत्नी का अपवाद के रूप में कहीं-कहीं उल्लेख प्राप्त होता है। विवाह को स्वयंवर स्वरूप ही मान्यता प्राप्त थी। दोनों को ही गुण व ज्ञान के आधार पर पति एवं पत्नी के चुनाव का अधिकार प्राप्त था। अ॒भि नो॑ दे॒वीरव॑सा म॒हः शर्म॑णा नृ॒पत्नीः॑। अच्छि॑न्नपत्राः सचन्ताम्॥१ अर्थात् जैसी विद्या, गुण, कर्म और स्वभाव वाले पुरुष हों, उनकी स्त्री भी वैसी ही होनी ठीक है, क्योंकि जैसा तुल्य रूप, विद्या, गुण, कर्म, स्वभाव वालों को सुख सम्भव होता है, वैसा अन्य को कभी नहीं हो सकता है। इससे स्त्री अपने समान पुरुष एवं पुरुष अपने तुल्य स्त्री के साथ आपस में प्रसन्न होकर स्वयंवर विधान से विवाह करके सब कर्मों को सिद्ध करें। त्वम॑ग्ने॒ वसू॑ँरि॒ह रु॒द्राँ आ॑दि॒त्याँ उ॒त। यजा॑ स्वध्व॒रं जनं॒ मनु॑जातं घृ॒तप्रु॑षम्॥२ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि अपने पुत्रों को कम से कम चौबीस और अधिक से अधिक अड़तालीस वर्ष तक और कन्याओं को कम से कम सोलह और अधिक से अधिक चौबीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करावें जिससे सम्पूर्ण विद्या और सुशिक्षा को पाकर परीक्षा और स्वयंवर विधि से विवाह करें, जिससे सब सुखी रहें। विवाह एक धार्मिक संस्कार माना जाता था और उसी के अन्तर्गत मनुष्य को सभी दायित्वों को पूरा करना पड़ता था। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में समाजदर्शन, जिन आदर्शों को प्रस्तुत कर रहा है, वह है— व्यक्ति का नियमबद्ध जीवन, जहाँ कोई मानसिक अस्वस्थता १. ऋग्वेद १/२२/११ २. ऋग्वेद १/४५/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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194 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता होने का भय ही नहीं रहता है। सभी वर्णों और वर्गों को समानता का अधिकार प्राप्त होना, स्त्री-पुरुषों को समान अधिकार एवं दायित्वों को पूरा करना, सवर्ण एवं सर्व वर्ण विवाह की पद्धति से वर्णों के मध्य भेद होने का प्रश्न वहीं समाप्त हो जाना, प्रजा को शिक्षा द्वारा गुणों को समुचित विकसित होने का अवसर प्राप्त होना आदि तथ्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका ऋग्वेद में दृष्टिगोचर होती है। (३) राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के राजदर्शन का अनुशीलन : राष्ट्र की शासनव्यवस्था का राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि राष्ट्र की शासन प्रणाली ही उसको सुख, शान्ति पूर्ण वातावरण प्रस्तुत कर सकती है और राष्ट्र के विकास एवं सुरक्षा को दृढ़ता प्रदान करने का कार्य भी करती है। ऋग्वेद काल में शासन का कार्य राजा या सभाध्यक्ष के द्वारा संभाला जाता था। राजा का चयन भी उसके गुणों के अनुसार ही किया जाना चाहिये। राजा के चयन का अधिकार प्रजा के पास था। ऋग्वेद में इसका स्पष्ट उल्लेख है। यं त्वा॑ दे॒वासो॒ मन॑वे॒ दधु॒रिह यजि॑ष्ठं हव्यवाहन। यं कण्वो॑ मेध्या॑ति॒थिर्धन॑स्पृतं॒ यं वृषा॒ यमु॑पस्तु॒तः॥१ अर्थात् इस सृष्टि में सब मनुष्यों को चाहिए कि विद्वान् और सर्वश्रेष्ठ, चतुर पुरुष मिलकर के जिस विचारशील ग्रहण योग्य वस्तुओं को प्राप्त कराने वाले, शुभ गुणों से भूषित, विद्या सुवर्णादिधनयुक्त, सभा के योग्य पुरुष को राज्य शासन के लिए नियुक्त करें वही पिता के तुल्य पालन करने वाला जन राजा होने योग्य होता है। जनसामान्य द्वारा गुणों पर आधारित चुना गया शासक सदैव राष्ट्र के लिये हितकारी ही होता है क्योंकि श्रेष्ठ गुणों से युक्त राजा अपनी प्रजा को सन्तान की तरह मानता है और उनके सुख सुविधा के लिए वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर व्यवस्था करता है। ऋग्वेद में राष्ट्राध्यक्ष के कार्यकलापों, व्यवहारों एवं नीति संविदाओं को अत्यन्त सावधानीपूर्वक वर्णित किया गया है। जिस प्रकार से सन्तानों के द्वारा पिता श्रद्धा एवं सम्मान योग्य होता है, उसी प्रकार राष्ट्राध्यक्ष का सम्मान और सत्कार राष्ट्रवासियों द्वारा किया जाना चाहिये। यदि पुत्र पिता को श्रद्धा और आदर की दृष्टि १. ऋग्वेद १/३६/१०
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 195 से सम्मान प्रदान करता है तो पिता भी अपने बच्चों को स्नेह की दृष्टि से अपार वात्सल्य प्रदान करता है। त्वाम॑ग्ने प्रथ॒ममा॒युमा॒यवे॑ दे॒वा अ॑कृण्व॒न्नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म्। इळा॑मकृण्व॒न्मनु॑षस्य॒ शास॑नीं पि॒तुर्यत्पु॒त्रो म॑म॒कस्य॒ जाय॑ते॥१ अर्थात् ईश्वरोक्त व्यवस्था करने वाले वेदशास्त्र और राजनीति के बिना प्रजापालक राजा कभी भी अपने राष्ट्र की प्रजा का पालन नहीं कर सकता है और प्रजा राजा के लिये सन्तान के तुल्य होती है। इसमें सभापति राजा पुत्र के समान प्रजा को शिक्षा अवश्य दे। राजा और प्रजा के बीच का सम्बन्ध तभी मधुर और त्याग की भावना से पूर्ण होता है। राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा के सुख के लिए वह सभी संसाधन जुटाने का प्रयास करें जो कि प्रजा के जीवन को सम्पूर्ण सुख, सुरक्षा एवं शान्तिपूर्ण जीवन देने वाले हों। इन्द्र॑स्य॒ नु वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यानि॑ च॒कार॑ प्रथ॒मानि॑ वज्री। अह॒न्नहि॒मन्व॒पस्त॑तर्द॒ प्र व॒क्षणा॑ अ॒भिन॒त्पर्व॑तानाम्॥२ "अर्थात् ईश्वर का उत्पन्न किया हुआ यह अग्निमय सूर्यलोक जैसे अपने स्वाभाविक गुणों से युक्त अन्नादि, प्रकाश, आकर्षण, दाह, छेदन और वर्षा की उत्पत्ति के लिए कामों को दिन-रात सम्पन्न करता है, ठीक उसी प्रकार प्रजा के पालन में तत्पर राजपुरुषों को भी प्रयास करना चाहिये।" राजसेवकों का कार्य राष्ट्र के निवासियों के हित में सदैव कार्यरत रहना है। वे राष्ट्रहित एवं जनहित के लिए राष्ट्रघाती शत्रुओं के छल-बल को नष्ट करके, उन पर विजय प्राप्त करके, उन्हें अपने राष्ट्र के लिए न्याय, सुख और समृद्धि का संचार करने का प्रयास करते रहना चाहिए। शत्रुरहित राष्ट्र ही समृद्धिपूर्ण एवं ऋद्धि-सिद्धि में पूर्ण हो सकता है। यदिन्द्रा॑ह॒न्प्रथम॒जामही॑ना॒मान्मा॒यिना॑ममि॒नाः प्रोत मा॒याः। आत्सूर्य॑ ज॒नय॒न्द्यामु॒षासं॑ ता॒दीत्ना॒ शत्रुं॒ न किला॑ विवित्से॥३ अर्थात् जैसे कोई राजपुरुष अपने वैरियों के बल और छल का निवारण कर उनको जीत कर अपने राज्य में सुख तथा न्याय का प्रकाश करता है, वैसे ही सूर्य भी १. ऋग्वेद १/३१/११ २. ऋग्वेद १/३२/१ ३. ऋग्वेद १/३२/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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196 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मेघ की घटाओं की सघनता और अपने प्रकाश को ढँकने वाले बादलों का निवारण कर, अपनी किरणों को फैलाकर, मेघों को छिन्न-भिन्न और अन्धकार को दूर कर अपनी दीप्ति को प्रसिद्ध करता है। ऊ॒र्ध्वो न॑ः पा॒ह्यंह॑सो॒ नि के॒तुना॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह। कृ॒धी न॑ ऊ॒र्ध्वाञ्च॒रथाय जी॒वसे॑ वि॒दा दे॒वेषु॑ नो॒ दुव॑ः॥१ अर्थात् अच्छे गुण, कर्म और स्वभाव वाले सभाध्यक्ष राजा का यह कर्तव्य है कि राज्य की रक्षा, नीति और दण्ड के भय से सब मनुष्यों को पाप से हटा सब शत्रुओं को मारकर और विद्वानों की सब प्रकार सेवा करके, प्रजा में ज्ञान, सुख और जीवन बढ़ाने के लिए सब प्राणियों को शुभगुणयुक्त सदा किया करें। सिर्फ राजा का ही राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का दायित्व नहीं है अपितु प्रजाजनों का भी यह कर्तव्य होता है कि वे राजा के कार्यों में सहयोग करें और राष्ट्र की उन्नति, समृद्धि, सुख, शान्ति के लिए अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें। शत्रुओं के दमन करने का दायित्व सिर्फ शासन का ही नहीं होता है अपितु प्रजा का भी यह दायित्व है कि राष्ट्र में शत्रुओं का एकजुट होकर सामना करें, उनके बुरे विचारों को कभी सफल न होने दें। त्वेष॒सो॑ अ॒ग्नेर्म॑वन्तो अ॒र्चयो॑ भी॒मासो॒ न प्रती॑तये। र॒क्षस्विन॑ः॒ सद्मिद्या॑तु॒माव॑तो॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह॥२ अर्थात् 'सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों और प्रजा के मनुष्यों को चाहिए कि जिस प्रकार अग्नि आदि पदार्थ वनों को भस्म कर देते हैं उसी प्रकार कष्ट देने वाले शत्रुओं का भी विनाश करने के लिये सदैव तत्पर रहना चाहिये। इससे सदैव ही प्रजा की रक्षा होती है।' इस मंत्र के द्वारा यह भी प्रदर्शित किया गया है कि राष्ट्र की रक्षा का दायित्व सिर्फ राजपुरुषों, राजा पर ही नहीं होता है, अपितु स्वयं प्रजा को राष्ट्र रक्षा, शत्रुओं से आत्म रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिये। सभी के हित के लिए सदैव ही सबको प्रयत्नशील होना चाहिये। जिस तरह राष्ट्र का निर्माण सभी प्रजाजनों से होता है उसी प्रकार उसकी रक्षा के लिए भी सभी को प्रयत्नशील होना चाहिये। राष्ट्र की संगठन शक्ति के समक्ष बड़े से बड़ा शत्रु भी अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है। शत्रु रहित राष्ट्र ही अखण्ड बना रह सकता है। १. ऋग्वेद १/३६/१४ २. ऋग्वेद १/३६/२०
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 197 ऋग्वेद में निम्नलिखित मंत्र में 'स्वराज' पद का प्रयोग हुआ है— तं घे॒मित्था नम॑स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते। होत्रा॑भिर॒ग्निं मनु॑षः॒ समि॑न्धते तिति॒र्वांसो॒ अति॒ स्रिधः॑॥१ इस मंत्र में प्रयुक्त 'स्वराज' पद विशिष्ट अर्थ का द्योतक है। देश में स्वराज अर्थात् अपना राजा होना चाहिये। इसका अभिप्राय है कि राष्ट्र का शासक किसी दूसरे राष्ट्र का नहीं होना चाहिये। अपने देश का गुणी, उत्साही एवं कर्मठ व्यक्तित्व को राजा के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहिये जो कि राज्य की सम्यक् व्यवस्था करें। दूसरे राष्ट्र के व्यक्ति के राजा बन जाने से वह हृदय से कभी भी राष्ट्र का हित नहीं कर सकता है। अतः अपने राष्ट्र में (स्वराज्य में) सम्यक् विकास होना अनिवार्य है। अपनी मातृभूमि से जुड़े राजा को जो सम्मान प्रजा द्वारा होता है, वह बाह्य राष्ट्र के निवासी राजा को प्राप्त नहीं हो सकता है। श्रेष्ठ गुणों से युक्त तेजस्वी एवं प्रतापी राजा, सभासद एवं राजसेवक ही राष्ट्र का कल्याण कर सकते हैं।' म॒न्द्रो होता॑ गृह॒पति॑र॒ग्ने दू॒तो वि॒शाम॑सि। त्वे विश्वा॒ संग॑तानि व्र॒ता ध्रु॒वा यानि॑ दे॒वा अकृ॑ण्वत॥२ अर्थात् जो प्रशस्त राजा, दूत और सभासद् होते हैं, वे ही राज्य का पालन कर सकते हैं। उनसे विपरीत मनुष्य नहीं कर सकते हैं। इसके पश्चात् राष्ट्राध्यक्ष के प्रमुख कर्तव्यों को भी इंगित किया गया है। राष्ट्राध्यक्ष एवं राजपुरुषों को चाहिए के वे राष्ट्र में इस प्रकार की व्यवस्था करें जिससे वहाँ के विद्वान् और वैज्ञानिक आध्यात्मिक और आधिभौतिक विषयों पर सम्यक् अनुसंधान कर राष्ट्र के हित साधन में लग सकें। राष्ट्र में विद्वानों का उचित सम्मान हो तथा सदैव राष्ट्रीय संसाधन विकसित किये जा सकें। इसके निमित्त समय-समय पर राष्ट्राध्यक्ष राष्ट्र की रक्षा एवं दण्ड नीति के निर्धारण के लिए विद्वानों के साथ मंत्रणा करें और निष्कर्ष के रूप में राष्ट्रीय नीति का निर्धारण करें। ऋग्वेद में प्रजाजनों के लिए निर्देश है कि वे राष्ट्राध्यक्ष की आज्ञा का पालन करें क्योंकि राष्ट्राध्यक्ष की आज्ञा के पालन के बिना राष्ट्र में सम्पूर्ण उत्कर्ष संभव नहीं। राज्यसभा का गठन इस प्रकार का होना चाहिये कि वह सदैव ही प्रजा के हित में कार्य कर सके। १. ऋग्वेद १/३६/७ २. ऋग्वेद १/३६/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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198 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यथा॑ नो॒ अदि॑तिः॒ करत्पश्वे॒ नृभ्यो॒ यथा॒ गवे॑। यथा॑ तो॒काय॑ रु॒द्रिय॑म्॥१ अर्थात् जैसे माता-पिता अपने पुत्र के लिए, ग्वाले अपने पशुओं के लिए और राजसभा प्रजा के लिए सुखकारी होते हैं, उनके हितार्थ ही सोचते हैं और प्रयत्न करते हैं, वैसे ही मानव सुख के लिए करने और कराने वाले परमेश्वर और पवन भी हैं। विद्या और पुरुषार्थ के बिना सुख सम्भव ही नहीं है। ऋग्वेद में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रजा को राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रक्षा के लिए सूर्य के समान तेजस्वी, प्रजापालन हेतु तत्पर, शत्रु विनाशक एवं परम ऐश्वर्ययुक्त व्यक्ति को ही सभाध्यक्ष बनाना चाहिये। जो प्रजा की रक्षा न कर सके, उसे कदापि राष्ट्राध्यक्ष नहीं बनना चाहिये। स हि द्रो दुरि॑षु व॒त्र ऊ॒र्ध्वनि॑ च॒न्द्रबु॑ध्नो॒ मद॑वृद्धो मनी॒षिभि॑ः। इन्द्रं॒ तम॑ह्वे स्व॒पस्यया॑ धि॒या मंहि॑ष्ठरातिं॒ स हि पप्रि॒रन्ध॑सः॥२ अर्थात् 'मनुष्यों को चाहिये कि जो मेघ के तुल्य प्रजापालक और सूर्यवत् सुखों की वर्षा करता है उस परमेश्वर्य युक्त पुरुष को ही राष्ट्राध्यक्ष का अधिकार प्रदान किया जाये तभी राष्ट्र व राष्ट्रवासियों का हित संभव है।' राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऊपर दिये गये विवरण के अनुसार ऋग्वेद में पूर्ण रूप से इसका वर्णन विद्यमान है। अन्त में ऋग्वेद का निम्न मंत्र इस बात का द्योतक है कि वर्तमान लोकतंत्र का पूर्ण भाव उस समय के शासन में भी विद्यमान था। उप॑ ते॒ स्तोमा॑न्पशु॒पा इ॒वाक॑रं॒ रास्वा॑ पितर्मरुतां सु॒म्नम॒स्मे। भ॒द्रा हि ते॑ सु॒मति॑र्मृ॒ळयत्त॑माथ॒ा वय॒मव॒ इत्ते॑ वृणीमहे॥३ अर्थात् प्रजापुरुष राजपुरुषों से राजनीति और राजपुरुष प्रजापुरुषों से प्रजा व्यवहार को जानने योग्य को जानकर सनातन धर्म का पालन करें। ४. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के धर्म दर्शन का अनुशीलन : धर्म का स्थान राजनीति से सदैव ही जुड़ा रहता है। आचार संहिता का निर्माण १. ऋग्वेद १/५३/२ २. ऋग्वेद १/५२/३ ३. ऋग्वेद १/११४/९
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तृतीय अध्याय 199 धर्म के आधार पर ही होता है। धर्मरहित राजनीति का कोई अर्थ नहीं होता है। ऋग्वेद में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में धर्म दर्शन का वर्णन प्राप्त होता है। धर्म से जब मानव जीवन संचालित होता है तो जीवन का कोई भी क्षेत्र चाहे वह पारिवारिक जीवन हो, राजनीतिक या सामाजिक हो, धार्मिक पृष्ठभूमि या नैतिक पृष्ठभूमि से अलग हो ही नहीं सकता है। एतेना॑ग्ने॒ ब्रह्म॑णा वावृधस्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत्तै॑ चकृ॒मा वि॒दा वा॑ । उ॒त प्र णै॒ष्यभि वस्यो॒ अस्मान्त्सं न॑ः सृज सु॒मत्या वाज॑वत्या ॥१ अर्थात् 'जो मनुष्य वेद की रीति से धर्मयुक्त व्यवहार करते हैं वे ज्ञानवान् और श्रेष्ठमति वाले होकर जिस उत्तम विद्वान् की सेवा करते हैं, वह उनको श्रेष्ठ सामर्थ्य और उत्तम विद्या संयुक्त करता है।' जो धर्मपूर्ण व्यवहार करते है उनकी विचारधारा, क्रियाकलाप सभी धर्मपूर्ण होते हैं। इससे समाज, राज्य और स्वयं व्यक्ति का बहुमुखी विकास होता है। व्यक्ति श्रेष्ठता को प्राप्त होता है। अतः सदैव ही उसे धर्मानुकरण ही करना चाहिये। त्वं न॑ः सोम वि॒श्वतो॒ रक्षा॑ राजन्न॒घायत॑ः। न रि॑ष्ये॒त्वार्व॑तः॒ सखा॑ ॥२ अर्थात् मनुष्यों को इस प्रकार ईश्वर की प्रार्थना करके उत्तम यत्न करना चाहिये कि जिससे धर्म के छोड़ने और अधर्म के ग्रहण करने की इच्छा मन में जागृत ही न हो सके। धर्म और अधर्म की प्रवृत्ति में मन की इच्छा ही कारण है, उसकी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए मनुष्य को आत्मनियंत्रण की आवश्यकता होती है, जिससे धर्म के त्याग एवं अधर्म के ग्रहण की सम्भावना ही न रहे। मानव मन चंचल होता है और उसको अपने मत पर धर्माचरण द्वारा ही नियंत्रण रखना होता है। सद्संगति और सद्विचारों से ही उसकी विचारधारा धर्मपूर्ण रहती है जो कि स्वयं उसके लिए और राष्ट्र के लिए उत्तम होती है। तत्तै॑ भ॒द्रं यत्समि॑द्धः॒ स्वे दमे॒ सोमा॑हुतो॒ जर॑से मृ॒ळय॑त्तमः । दधा॑सि॒ रत्नं॑ द्रवि॑णं च दा॒शुषेऽग्ने॒ सख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥३ अर्थात् 'मनुष्यों को चाहिए कि अपने आचरण एवं विचारों को धर्मपूर्ण बनाये रखने के लिए वेद प्रमाण और सृष्टिक्रम के प्रमाण तथा सद्पुरुषों, ईश्वर और विद्वान् १. ऋग्वेद १/३१/१८ २. ऋग्वेद १/९१/८ ३. ऋग्वेद १/९४/१४