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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 186 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् पुरुषार्थ ही व्यक्ति के मनोरथों को सफल कर सकता है, सिर्फ कामना से कुछ भी नहीं हो सकता है। जीवन में ब्रह्मचर्य का धारण, विषयों के अतिक्रमण का त्याग, भोजनादि में श्रेष्ठ नियमों का पालन कर चक्रवर्ती राज्य की लक्ष्मी की सिद्धि मात्र पुरुषार्थ के द्वारा ही सम्भव है। ईश्वर की प्रार्थना मात्र से मनोरथ सिद्ध नहीं होते। इन सबकी प्राप्ति के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना ही उचित है। प्रत्येक कार्य की सफलता तभी सम्भव है जबकि मनुष्य स्वयं ही उसमें प्राण पण से संलग्न रहे। सिर्फ मनोरथ से कार्य सिद्ध होना संभव नहीं है। सु॒विवृतं॑ सु॒निर॒जमिन्द्र॑ त्वादा॑त॒मिद्गश॑ः। गवा॒मर्प॑ व्र॒जं वृ॑धि कृ॒णुष्व॑ राधो॑ अद्रिवः॥१ अर्थात् हे ईश्वर जैसे विश्व की सृष्टि में सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि की उत्पत्ति करके, उसे अपना यश व आशीष प्रदान करके प्रसिद्धि दिलाई है वैसे ही आप मुझ मानवजाति पर कृपा करके अपनी इन्द्रियों आदि की शुद्धि के साथ विद्या, ज्ञान और धर्म के प्रकाश से युक्त कीर्ति, विद्या, धन और वैभवशाली राज्य प्रदान करके सब मनुष्यों को निरन्तर आनन्दित एवं कीर्तिमान बनायें। राष्ट्र में किसी के प्रति भेदभाव और ईर्ष्या द्वेष उचित नहीं है। जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा सदैव लोकोपकार में निरत हैं, उसी प्रकार सम्राट को भी सदैव प्रजाजनों के हित के बारे में ही विचार करना चाहिए- इन्द्रा॑वरुणयोर॒हं सम्राजो॒रव॒ आ वृ॑णे। ता नौ॑ मृळात ई॒दृशे॑॥२ अर्थात् जैसे प्रकाशमान, संसार के उपकार करने, सब सुखों के देने, व्यवहारों के हेतु और चक्रवर्ती राजा के समान सब की रक्षा करने वाले सूर्य तथा चन्द्रमा हैं, वैसे ही हम लोगों को होना चाहिये। जब राष्ट्र में सभी लोग सुख समृद्धि से पूर्ण होते हैं और अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं तब उन्हें अपने राष्ट्र की सुरक्षा का पूर्ण ध्यान रहता है। सारी चिन्ताओं से मुक्त नागरिक राष्ट्र के प्रति समर्पित होते हैं। उन्हें एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या नहीं होती, राष्ट्र व राष्ट्र के शासन के प्रति संतुष्टि उन्हें राष्ट्र के प्रति समर्पित बनाती है। ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर अखण्डसाम्राज्य की भावना अभिव्यक्त की गई है। यह अखण्ड साम्राज्य आज की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का ही प्रतीक है। १. ऋग्वेद १/१०/७ २. ऋग्वेद १/१७/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar