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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

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तृतीय अध्याय 185 चाहिये। विचारशील एवं उच्च महत्त्वाकांक्षा वाले राष्ट्रवासियों से ही राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को बल प्राप्त होता है। सामूहिक हित की भावना से ही सबकी उन्नति सम्भव है और सभी की उन्नति से ही राष्ट्र की दृढ़ता बढ़ती है। उसकी एकता और अखण्डता और मजबूत होती है। इ॒ळा सर॑स्वती म॒ही ति॒स्रो दे॒वीर्म॑यो॒भुवः॑। ब॒र्हिः सी॑दन्त्व॒स्रिधः॑॥१ अर्थात् राष्ट्रभक्तों में समानता की भावना आवश्यक बताते हुए इस तथ्य को निरूपित किया गया है कि प्रत्येक राष्ट्र की भाषा, संस्कृति एवं भूमि ही सुखप्रदाता एवं श्रेयस्कर देवता है। इनकी ही उन्नति करने से वास्तविक राष्ट्रीयउन्नति सम्भव हो सकती है और राष्ट्रीयउन्नति से ही सामूहिक सुख प्राप्त हो सकता है। भाषा एवं संस्कृति सुरक्षित रहे तो मातृभूमि या राष्ट्र पर कोई भी बाह्यशक्ति या शत्रु प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता है। यही कारण है कि ये पदार्थ राष्ट्र के सर्वाधिक उपयोगी होने के साथ-साथ महान् सुखप्रदाता देवता माने गये हैं। शत्रु से राष्ट्र की रक्षा सबसे अहम् बात है क्योंकि शत्रु ही सदैव एक संगठित राष्ट्र के टुकड़े करने के लिये, उसकी अखण्डता पर प्रहार करने के लिये अवसर खोजा करते हैं। इन राष्ट्र के शत्रुओं से प्रहरियों को सदैव सावधान रहना चाहिये क्योंकि ये राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद में उल्लिखित है— प्रेह्य॒र्भीहि॑ धृष्णु॒हि न ते॒ वज्रो॒ नि यं॑सते। इन्द्र॒ नृम्णं हि ते॒ शवो॒ हनो॑ वृ॒त्रं जया॑ अ॒पोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् स्वराज्य शासन की प्रतिष्ठा अविचल रखने के लिये आवश्यक है कि शत्रु का विनाश किया जावे। जिस प्रकार सूर्य को मेघ के हनन में कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, अपितु सहज रूप से ही उसका हनन हो जाता है। इसी प्रकार राष्ट्रप्रेमी भक्तों की इस प्रकार सुव्यवस्था हो कि शत्रुओं का बिना किसी चेष्टा के ही नाश हो जावे। यदा कदा परिस्थितिवश शत्रु पर पुनः पुनः आक्रमण करना पड़ता है और अत्यन्त धैर्य के साथ विपत्ति का सामना करना पड़ता है। उसमें जो वीर सफल होते हैं, उनसे ही यह आशा की जा सकती है कि वे स्वराज्य शासन की गरिमा एवं महिमा का विस्तार कर सकेंगे। सं गोम॑दिन्द्र॒ वाज॑वद॒स्मे पृथु श्रवो॑ बृ॒हत्। वि॒श्वायु॑र्धेह्यक्षि॑तम्॥३ १. ऋग्वेद १/१३/९ २. ऋग्वेद १/८०/३ ३. ऋग्वेद १/९/७

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar