भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 184 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर्यन्त अविचल रहने वाला बतलाया गया है। यस्य॑ ते॒ नू चि॑दा॒दिशं॒ न मि॒नन्ति॑ स्व॒राज्य॑म्। न दे॒वो नाध्रि॑गुर्जनः॥१ इस मंत्र में स्वराज्य को सर्वोत्तम राज्य व्यवस्था स्वीकार किया गया है और इसकी दृढ़ता को स्वीकार किया गया है। इसका संचालन यदि आदर्श रूप में किया जाये तो इसके अस्तित्व को कभी कोई खतरा नहीं हो सकता। ऐसे राष्ट्र युगों-युगों तक सूर्य के समान अटल बनकर अपने अस्तित्व को बनाये रखते हैं। अस्य॒ हि स्वय॑शस्तरं सवि॒तुः कच्छन॒ प्रियम्। न मि॒नन्ति॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् उत्तम-आदर्श-स्वराज्य-शासन के तेज की अनन्य-राशि सूर्य के प्रकाश अथवा जगदुत्पादक परमेश्वर से तुलना की गई है। जिस प्रकार पूर्ण रूप से व्यवस्थित होने के कारण सूर्य या ईश्वर की सत्ता का कभी विनाश सम्भव नहीं है, उसी प्रकार उत्तम गुण से युक्त एवं आदर्श राज्य शासन एवं अधिकारियों की छत्रछाया में स्वराज्य-शासन का भी कभी विनाश नहीं हो सकता। प्रत्येक राष्ट्र के लिये यह आवश्यक है कि वहाँ के नागरिकों में राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार होना चाहिये। मातृभूमि को अपनी जन्मदात्री माँ के सदृश मानने वाले राष्ट्रभक्त ही राष्ट्र के वास्तविक भक्त होते हैं। उनमें आपस में बन्धुत्व की भावना सदा जागृत रहनी चाहिये। जो राष्ट्र का संचालन करते हैं उन्हें भी विद्वान् होना आवश्यक है। सारे राष्ट्र की निष्ठा एवं विश्वास उनमें निहित होना चाहिये और उन्हें भी पितासदृश संरक्षण देकर सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये। नागरिकों में इस प्रकार की उदात्त भावना उस दशा में ही संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति में परस्पर समभाव हो और कोई किसी को ज्येष्ठ या कनिष्ठ न समझे। यह भाव जाति या धर्म या किसी वर्ग आदि के आधार पर भी नहीं होना चाहिये। ते अ॑ज्ये॒ष्ठा अ॑कनि॒ष्ठास॒ उद्भिदोऽम॑ध्यमासो॒ मह॑सा वि वा॑वृधुः। सु॒जा॒तासो॑ जु॒नुषा॒ पृश्नि॑मातरो दि॒वो मर्या आ नो॒ अच्छा॑ जिगातन॥३ अर्थात् राष्ट्र भक्तों में किसी प्रकार की ज्येष्ठता एवं कनिष्ठता की भावना नहीं होनी चाहिये। सभी को अपने सद्प्रयत्नों से राष्ट्र की उन्नति के लिये प्रयत्नशील होना १. ऋग्वेद ८/९३/११ २. वही ५/८२/२ ३. ऋग्वेद ५/५९/६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar