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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 183 इस मंत्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि परमेश्वर को पिता और सम्पूर्ण मानव जाति को सन्तान मानकर विश्व को एक परिवार का स्वरूप प्रदान किया गया है। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण है क्योंकि एक पिता की सन्तान मानकर सम्पूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने की बात कही गई है। और इस तरह की भावना से पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। द्वेषहीन मानवसमाज से ही एकता और अखण्डता की बात सोची जा सकती है। ऋग्वेद की राजनीति में मानवतावाद और जनकल्याण की भावना सर्वत्र परिलक्षित हो रही है। मानवजाति की सुख, शान्ति और उसे वैभवपूर्ण बनाये रखने की भावना निहित है। यु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑। शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा॥१ अर्थात् ईश्वर ने मनुष्य को उसकी शक्तियों एवं सुख सुविधा की ओर इंगित किया है कि एक उत्तम राज्य और उसको धन, आवागमन के आधुनिक साधनों से सम्पन्न करने के लिये उसे पृथ्वी, जल और वायु आदि के गुण व ज्ञान से अवगत होकर उनसे लाभ उठाना होगा। राष्ट्र की एकता एवम् अखण्डता को सुरक्षित बनाने के लिये उसका विकास एवं समृद्धि आवश्यक है ताकि बाह्य व आन्तरिक सुरक्षा को खतरा न रहे। हम किसी भी क्षेत्र में पराश्रित न हों। शत्रुओं से टक्कर लेने में हम अपने आप में पूर्णतया सक्षम हों, तभी हमारा राष्ट्र सुरक्षित रहेगा। म॒हाँ इ॑न्द्रः पर॑श्च॒ नु म॑हि॒त्वम॑स्तु वज्रिणे॑। द्यौर्न प्र॑थि॒ना शव॑ः॥२ अर्थात् 'धार्मिक युद्ध करने वाले मनुष्यों को उचित है कि जो शूरवीर युद्ध में अति धीर मनुष्यों के साथ होकर दुष्ट शत्रुओं पर अपनी विजय प्राप्त की है, इस विजय के लिए हमें परमेश्वर को धन्यवाद करना चाहिये ताकि निरभिमान होकर राष्ट्र की सदैव उन्नति होती रहे।' राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद में स्वराज्य की अवधारणा को स्पष्ट किया गया है। 'स्वराज्य से यहाँ अभिप्राय स्वयं पर शासन करने से है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने पर नियंत्रण रखेगा। अपनी समस्त बुराइयों और दुर्गुणों पर नियंत्रण रखकर अपने साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की उन्नति में प्रयत्नशील रहता है, यही स्वराज्य का प्रतीक है। उत्तम स्वराज्य-शासन सूर्य के समान है एवं प्रलय १. ऋग्वेद १/६/२ २. ऋग्वेद १/८/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar