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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 187 सार्वभौमअखण्डराष्ट्र की संस्थिति तभी संभव है जबकि राष्ट्रवासियों में पारस्परिक प्रेम, सद्भाव एवं बंधुत्व की भावना का विकास हो। राष्ट्र के लोगों को उद्यमी कर्मण्य, परिश्रम से न घबराने वालें और सत्य व धर्म का अनुकरण करने वाले होने चाहियें। वैज्ञानिक गतिविधियों को उस काल में ही बहुत महत्त्व दिया गया था, वायुयान, जलयान और रथों आदि का निर्माण उनके लिये बहुत ही सरल कार्य था। राष्ट्र की सुरक्षा के लिये आवश्यक था कि राष्ट्र में इन सब चीजों की प्रचुरता हो ताकि शत्रु का सामना पूर्ण शान्ति के साथ करके विजयश्री प्राप्त की जा सके। सं वो॒ मदा॑सो अ॒ग्मतेन्द्रे॑ण च म॒रुत्व॑ता। आ॒दि॒त्यैर्भि॒श्च राज॑भिः॥१ अर्थात् राष्ट्र के विद्वान्पुरुष वायु और विद्युत की शक्ति का उपयोग करके सूर्य की किरणों के समान आग्नेयादि अस्त्र, असि आदि शस्त्र और विमान आदि यानों को सिद्ध करते हैं तभी वे शत्रुओं का वीरतापूर्वक सामना करके अपने राष्ट्र को सुख एवं शान्ति से पूर्ण बनाने में सफल होते हैं। राष्ट्र में शिक्षा का पूर्ण प्रसार होना चाहिये, शिक्षा व्यक्ति को वैचारिक संकीर्णता से मुक्त कराती है। वह छोटी-छोटी बातों को लेकर मन में न वैमनस्य पालते हैं और न ही आपस में शत्रुता का भाव रखते है। शिक्षा से उनका ज्ञान विस्तृत होता है। राष्ट्र के आपातकाल में भी वे सदैव राष्ट्र के प्रति जागरूक रहते हैं। सभी उनके कार्यों के अनुरूप शिक्षा देने से वे अपने कार्य में विशेषज्ञ बन जाते हैं। अपने-अपने कार्यों की विशिष्टता से परिचित होते हैं। उन कार्यों का सुचारूपूर्वक सम्पादन करते हैं। राष्ट्र का शासन कार्य भी सुशिक्षित एवं प्रशिक्षित लोगों से अच्छी तरह सम्पन्न होता है। जरा॑बोध॒ तद्वि॑विद्धि॒ विशे॑विशे य॒ज्ञिया॑य। स्तोमं॑ रु॒द्राय॑ दृ॒शीक॑म्॥२ अर्थात् युद्ध विद्या के ज्ञाता लोगों के गुणों का श्रवण किये बिना इस बात का ज्ञान नहीं होता कि कहाँ किस प्रकार युद्ध में अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करना चाहिये। जो प्रजा के सुख के लिए शत्रुओं का सामना करने के उद्देश्य से सैनिकों को प्रशिक्षित करते हैं, वही प्रजापालन के कर्तव्यों को पूर्ण कर पाते हैं। समग्र रूप से यदि ऋग्वेद में वर्णित प्रसंगों को देखा जाय तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के आधारतत्त्व पूर्ण रूप से विद्यमान है और आज की विपरीत परिस्थितियों के अनुरूप उसमें समाधान भी प्रस्तुत किये गये हैं और यही कारण है कि वेद सदैव वर्तमान रहते हैं। उनके प्रसंग १. ऋग्वेद १/२०/५ २. ऋग्वेद १/२७/१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar