भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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188 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कभी भूतकालिक हो ही नहीं सकते हैं। २. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के समाज दर्शन का अनुशीलन वैदिकवाङ्ग्मय में तत्कालीन भारतीयसमाज का जो चित्र अंकित है, उसके विश्लेषण से ज्ञात होता है कि वह अत्यन्त सुख सौमनस्यपूर्ण, समता एवं समरसता मूलक और स्वस्थ मानसिक विकास की आधारशिला पर प्रतिष्ठित अवधारणा थी। समाज का वर्गीकरण विभिन्न व्यावसायिक पृष्ठभूमि के आधार पर किया गया था। परिवार संयुक्त होते हुए भी उनमें प्रत्येक व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास के अवसर प्रदान किये जाते थे। हर क्षेत्र में कार्य करने का उन्हें अधिकार था। स्त्री और पुरुष के मध्य कोई भी भेद नहीं किया जाता था। पारिवारिक पृष्ठभूमि यदि संयुक्त थी तब भी उनके मध्य खींचतान की प्रवृत्ति न होकर पारस्परिक दायित्व की ग्रहणशीलता और सहयोग की दृष्टि निहित थी। समाज के सभी वर्गों में परस्पर प्रेम की भावना थी। (क) वर्ण व्यवस्था :- ऋग्वैदिक समाज, श्रम विभाजन के सिद्धान्त के अनुरूप चार वर्गों में विभक्त दिखलाई देता है। सुप्रसिद्ध 'पुरुष-सूक्त' में समाज की परिकल्पना पुरुष के रूप में विभिन्न वर्णों की योजना उसके विविध अवयवों के रूप में की गई है- ब्राह्मणो॑ऽस्य॒ मुख॑मासीद् बा॒हू रा॑ज॒न्य॑: कृ॒तः। ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्य॑: प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत।१ अर्थात् समाज में बने चार वर्णों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा जी के मुख से, बाहुओं से क्षत्रिय जाति की, जंघाओं से वैश्य की और पैरों से शूद्र का जन्म माना गया है। इसी के अनुरूप ही समाजशास्त्रियों ने भी समाज को जीवित शरीर माना है।२ इससे मिलकर ही समाज का निर्माण हुआ है। समाजशास्त्रियों ने सामाजिक वर्गीकरण का आधार इसी को स्वीकार किया है। वैदिक युग में यह वर्ण विभाजन जन्मानुसार न होकर कर्मानुसार ही होता था और जैसे मानव शरीर के सभी अंग एक दूसरे से सम्बद्ध है, शरीर के किसी एक अंग के रोग से पीड़ित होने पर पूरे शरीर को कष्ट होता है, ठीक उसी प्रकार एक वर्ण के कष्ट की अनुभूति दूसरे वर्ण को होना भी स्वाभाविक था। १. ऋग्वेद १०/९०/१२ २. हर्बर्ट स्पेन्सर आदि।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar