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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

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तृतीय अध्याय 189 ब्राह्मणों के लिए वेदों का अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन प्रमुख कार्य थे, किन्तु कृषि प्रभृति कार्यों से भी वे उस समय विरत न थे। राज्यसंचालन और युद्धों में भाग लेना भी उनको अस्वाभाविक न था। क्षत्रिय-वर्ण के लिये तो शासन, सुव्यवस्था आदि कार्य निश्चित थे फिर भी अन्य कार्यों को करने के लिये उन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। यही बात वैश्यों पर भी लागू होती थी। उनके लिये प्रमुख कार्य पशु-पालन, कृषि और वाणिज्य आदि थे। शूद्रों का कर्म समाज की सेवा सुश्रुषा करना कहा गया है किन्तु उस समय इस वर्ग के प्रति कोई तिरस्कार या उपेक्षा का भाव नहीं दिखलाई देता था। (ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिकयुग में मानवजीवन को कर्म, धर्म, नियम आदि की दृष्टि से उसकी पूर्ण आयु को १०० वर्ष का अनुमान करके २५-२५ वर्ष की आयु के चार वर्ग बनाकर उन्हें अलग-अलग चार आश्रमों के नाम देकर उसके कार्य, धर्म आदि निश्चित कर दिये गये थे। इनका अनुकरण करता हुआ मनुष्य अपने जीवन के अन्तिम लक्ष्य, मोक्ष तक पहुँच ही जाता है। जीवन के आरम्भ से २५ वर्ष की आयु तक का काल 'ब्रह्मचर्य-आश्रम' का काल कहा जाता है। इसमें व्यक्ति विद्या ग्रहण करने का कार्य अपनी सम्पूर्ण निष्ठा से करता है। अध्ययनकाल पूर्ण करने के बाद ही वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। स प्र॒त्नथा॑ स॒हसा॑ जा॒यमा॑नः स॒द्यः काव्या॑नि बळ्धत्त वि॒श्वा॑। आ॒प॑श्च मि॒त्रं धिष॑णा च सा॒धन्दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम् ॥१ अर्थात् मनुष्य ब्रह्मचर्य और विद्या की प्राप्ति के बिना कवि नहीं हो सकता और न कविता के बिना परमेश्वर एवं बिजुली को जानकर कार्यों को कर सकता है। इससे उक्त ब्रह्मचर्य आदि नियम का अनुष्ठान नित्य करना चाहिये। ब्रह्मचर्य के जीवन के बाद व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है और आयु के ५० वर्ष तक का काल वह इसमें व्यतीत करता है। इसमें रहकर ही वह जीवन के तीनों ऋण- देवऋण, ऋषिऋण एवं पितृऋण से मुक्ति हेतु सत्कर्म करता है। जीवन के धर्म के कार्य वह सपत्नीक पूर्ण करता है। धार्मिक अनुष्ठानों को भी वह सपत्नीक ही पूर्ण करता है। सन्तान के जन्म से वह वंश की परम्परा को आगे बढ़ाता है। यद॒द्य भा॒गं विभ॒जासि॑ नृ॒भ्य॒ उ॒षो दे॑वि मर्त्य॒त्रा सु॑जाते। दे॒वो नो॒ अत्र॑ सवि॒ता दमो॑ना॒ अना॑गसो वोचतु॒ सूर्या॑य ॥२ १. ऋग्वेद १/९६/१ २. ऋग्वेद १/१२३/३

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar