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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 190 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् जब दो स्त्री-पुरुष विद्वावान्, धर्म का आचरण और विद्या का प्रचार करने वाले सदा परस्पर प्रसन्न हों तब गृहस्थाश्रम में अत्यन्त सुख का सेवन करने वाले व्यक्ति हों। गृहस्थाश्रम की आयु पूर्ण करने पर व्यक्ति को 'वानप्रस्थ आश्रम' में प्रवेश करने का आदेश है। ५० से ७५ वर्ष की आयु तक वह वानप्रस्थ आश्रम में रहता है। इस काल में वह घर में सपत्नीक रहते हुए अपना सम्पूर्ण समय पूजा-पाठ, जप-तप में व्यतीत करने लगता है। सांसारिक मायामोह से मुक्त होकर वह संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने की तैयारी करता है। ७५ वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति 'संन्यास आश्रम' में प्रवेश करता है। इसमें वह गृह त्याग कर वन में जाकर तपस्या करता है और जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिये ही तन और मन से समर्पित हो जाता है। पृक्षो वपु॑ः पितुमा॒न्नित्य॒ आ शये॑ द्वि॒तीय॒मा स॒प्तशि॑वासु मा॒तृषु॑। तृ॒तीय॑मस्य वृष॒भस्य॑ दोह॒से दश॑प्रमतिं जनयन्त्॒ योषण॑ः॥१ अर्थात् जो मनुष्य इस जगत् में सात प्रकार के लोकों में ब्रह्मचर्य से प्रथम, गृहस्थाश्रम से द्वितीय और वानप्रस्थ एवं संन्यास से तृतीय कर्म तथा उपासना के विज्ञान को प्राप्त होते हैं, वे दस इन्द्रियों, दस प्राणों के विषयक मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और जीव के ज्ञान को प्राप्त होते हैं। (ग) पुरुषार्थ :- मानव जीवन में पुरुषार्थ का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि जीवन के कार्यों, धर्मों और नियमों के निर्माण का आधार यह पुरुषार्थ ही है। इन पुरुषार्थों की पूर्ति में ही वह सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर देता है। नैतिक नियमों का भी उल्लेखनीय योगदान है। ए॒तायामोप॑ ग॒व्यन्त॒ इन्द्र॑म॒स्माकं॑ सु प्रम॑तिं वावृधाति। अ॒ना॑मृणः कु॒विदा॒दस्य॑ रा॒यो गवां॒ केतं॑ परमा॒वज॑ते नः॥२ अर्थात् "मनुष्यों को योग्य है कि संसार में अविद्या का नाश तथा विद्या का दान करने से उच्च कोटि के धन सम्पत्ति को बढ़ावें तथा उस परमेश्वर की आज्ञा का पालन और उपासना करके उसी से शरीर तथा आत्मा का बल नित्य बढ़ायें। उनकी सहायता के बिना कोई भी मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी फल को प्राप्त १. ऋग्वेद १/१४१/३ २. ऋग्वेद १/३३/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar