वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 219, कुल 353 में से
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तृतीय अध्याय 191 करने में कभी भी समर्थ एवं सफल नहीं हो सकता है।" जीवन में निश्चित इन चार पुरुषार्थों के सम्बन्ध व्यक्ति के इहलोक और परलोक दोनों से भी जुड़ा हुआ है। सर्वप्रथम धर्म का सम्बन्ध तो व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक जुड़ा रहता है। उसका हर कार्य धर्मानुरूप होना चाहिये तभी उसे सार्थक कहा जा सकता है। इस कार्य के लिये सम्पूर्ण जीवन काल ही निश्चित किया गया है। इसके पश्चात् दूसरे स्तर पर अर्थ आता है। इस अर्थ के द्वारा ही सारे कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। अतः इसकी महत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। इस धन (अर्थ) के द्वारा ही वह अपने धार्मिक, पारिवारिक एवं सामाजिक कार्यों को पूर्ण करता है। यह अर्थ धर्मपूर्ण तरीके से कमाया हुआ होना चाहिये तभी उसका उपयोग सफल होगा। चोरी, डकैती या बेइमानी से कमाया हुआ धन का स्रोत न्यायपूर्ण एवं धार्मिक न होने के कारण वह धर्मसंगत अर्थ नहीं कहा जा सकता है। पूजा, यज्ञ, अनुष्ठान, दान आदि में प्रयुक्त धन धर्मपूर्ण ढंग से अर्जित किया हुआ होना चाहिये। गृहस्थाश्रम का आधार 'काम' की इच्छा है। जीवन की अनिवार्यता होने के कारण ही उसे जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। इसके द्वारा ही मानव अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हुए प्रजा की उत्पत्ति में संलग्न होता है। पत्नी के साथ मिलकर ही धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण किये जाते हैं। 'काम' को शारीरिक सुख की दृष्टि से ही नहीं देखा जाता। इस भावना को गौण मानकर ही गृहस्थाश्रम के दायित्वों की पूर्ति का 'साधनमात्र' माना जा सकता है। इसी सन्दर्भ में निम्न मंत्र उल्लेखनीय है— ब्रह्म॑णस्पते॒ त्वम॒स्य य॒न्ता सू॒क्तस्य॑ बोधि॒ तन॑यं च जिन्व। विश्वं॒ तद्भ॒द्रं यदव॑न्ति दे॒वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीरा॑:॥१ अर्थात् मनुष्य के लिए यही उचित है कि वह वेद के नियमों को सुन्दर अर्थ में ग्रहण करके, युवावस्था में स्वयंवर विवाह कर, धर्म से सन्तानों की उत्पत्ति और रक्षा कर अपने 'कामधर्म' का पालन करते हुए उन्हें भी यथावत् ब्रह्मचर्य की सुन्दर शिक्षा प्रदान करते हुए उन्हें विद्वान् बनाकर अपना और विश्व का सुख बढ़ाये। जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष का सम्बन्ध सम्पूर्ण क्रियाकलापों से जुड़ा हुआ है। जीवन में धर्म, अर्थ, काम- तीनों की यथोचित पूर्ति के पश्चात् उसका मन इन सबसे विरक्त होकर ईश्वरोन्मुख हो जाता है और वह ईश्वर की उपासना में अपने आपको समर्पित कर देता है और इसी जप, तप, पूजा, अर्चना से उसको मोक्ष प्राप्त होता है। ———————————————————— १. ऋग्वेद २/२४/१६
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar