वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 192 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता नारी की स्थिति :- वैदिक ऋषियों ने स्त्री और पुरुष को समकक्ष स्थान पर रखा था। जीवनरूपी वाहन के ये दोनों दो चक्र हैं। इनमें से एक के बिना भी इसके चलने की कोई संभावना नहीं रहती है और इसी कारण जन्म से ही बालक एवं बालिका दोनों के लालन-पालन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है। पारिवारिक जीवन में स्त्री को गृहिणी, जननी और सहचरी तीनों रूपों से परिचित कराया जाता है। ऋग्वेद के सूर्या सूक्त (१०/८५) में स्त्री के गृहिणी स्वरूप की सम्यक् रीति से समीक्षा की गई है। नवविवाहित वधू को अपने घर में प्रवेश करने और सब पर शासन करने के लिए आमंत्रित करने का उल्लेख निम्नांकित मंत्र में स्पष्ट परिलक्षित है- गृहा॒न्गच्छ॑ गृ॒हप॑त्नी यथासो॑ व॒शिनी॒ त्वं वि॒दथ॒मा व॑दासि।१ गृहस्थी के दायित्वों के प्रति गृहिणी को 'गार्हपत्याय जागृति' (ऋ०सं० १०/२५/२७) कहकर जागरूक रखा गया है। सास, ससुर, नन्दों एवं देवरों सहित वह सम्पूर्ण परिवार के 'साम्राज्ञी' के गौरवस्पद पद पर प्रतिष्ठित की गई है- स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव॒ स॒म्राज्ञी॒ श्व॒श्र्वां भव॑। नना॑न्दरि स॒म्राज्ञी॑ भव स॒म्राज्ञी॒ अधि॑ दे॒वृषु॑॥२ नारी को साम्राज्ञी के पद से विभूषित किया गया है और उससे सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य निर्वाह की आशा की जाती थी और उसे सम्मानीय स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है। व्यु॒च्छन्ती॒ हि र॒श्मिभि॒र्विश्व॑मा॒भासि॑ रोच॒नम्। तां त्वामु॑षर्वसूय॒वो गी॒र्भिः कण्वा॑ अहूषत॥३ अर्थात् विद्वानों को समझना चाहिये कि स्त्री के गुण अवर्णनीय होते हैं। उसकी तुलना उषा के गुणों के तुल्य समझे जाने चाहिये और उन्हें इस बात को समझते हुए सबको उपदेश देना चाहिये। उस युग में अपने वैदुष्य के कारण कितनी ही स्त्रियों को विशिष्ट सम्मान प्राप्त हुआ। इनमें से अनेक को मंत्र साक्षात्कार करने में भी प्रतिष्ठा मिली है। सम्पूर्ण रूप से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि नारी को ऋग्वेद काल में सम्माननीय स्थान प्राप्त था। विवाह :- वैदिक युग में बालविवाह की प्रथा नहीं थी। विवाह वर और कन्या १. ऋग्वेद १०/८५/२६ २. ऋग्वेद १०/८५/४६ ३. ऋग्वेद १/४९/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar