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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 193 के द्वारा पूर्ण यौवन प्राप्ति के पश्चात् ही होता था। ऋग्वेद में सूर्या और सोम के विवाह का वर्णन (१०/८५) से सम्बद्ध मंत्रों से यह तथ्य सुप्रमाणित है। सगोत्रीय विवाह निषिद्ध थे। कन्या को पति चयन की स्वतंत्रता प्राप्त थी। विवाह में मध्यवर्ग कभी बाधा नहीं बना। वर्ण का कोई बन्धन नहीं था। प्रेम विवाहों का भी ऋग्वेद में उदाहरण दिया गया है। ऋग्वेद में चर्चित (ऋ०सं० ९/६७/१०-१२) राजा रथवीति की राजकुमारी के प्रति ऋषिश्यावाश्य के हृदय में प्रणय-भावना की उत्पत्ति और बाद में विवाह का उल्लेख किया गया है। उस समय 'एक पत्नी-विवाह' का ही उल्लेख मिलता है। बहुपत्नी का अपवाद के रूप में कहीं-कहीं उल्लेख प्राप्त होता है। विवाह को स्वयंवर स्वरूप ही मान्यता प्राप्त थी। दोनों को ही गुण व ज्ञान के आधार पर पति एवं पत्नी के चुनाव का अधिकार प्राप्त था। अ॒भि नो॑ दे॒वीरव॑सा म॒हः शर्म॑णा नृ॒पत्नीः॑। अच्छि॑न्नपत्राः सचन्ताम्॥१ अर्थात् जैसी विद्या, गुण, कर्म और स्वभाव वाले पुरुष हों, उनकी स्त्री भी वैसी ही होनी ठीक है, क्योंकि जैसा तुल्य रूप, विद्या, गुण, कर्म, स्वभाव वालों को सुख सम्भव होता है, वैसा अन्य को कभी नहीं हो सकता है। इससे स्त्री अपने समान पुरुष एवं पुरुष अपने तुल्य स्त्री के साथ आपस में प्रसन्न होकर स्वयंवर विधान से विवाह करके सब कर्मों को सिद्ध करें। त्वम॑ग्ने॒ वसू॑ँरि॒ह रु॒द्राँ आ॑दि॒त्याँ उ॒त। यजा॑ स्वध्व॒रं जनं॒ मनु॑जातं घृ॒तप्रु॑षम्॥२ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि अपने पुत्रों को कम से कम चौबीस और अधिक से अधिक अड़तालीस वर्ष तक और कन्याओं को कम से कम सोलह और अधिक से अधिक चौबीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करावें जिससे सम्पूर्ण विद्या और सुशिक्षा को पाकर परीक्षा और स्वयंवर विधि से विवाह करें, जिससे सब सुखी रहें। विवाह एक धार्मिक संस्कार माना जाता था और उसी के अन्तर्गत मनुष्य को सभी दायित्वों को पूरा करना पड़ता था। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में समाजदर्शन, जिन आदर्शों को प्रस्तुत कर रहा है, वह है— व्यक्ति का नियमबद्ध जीवन, जहाँ कोई मानसिक अस्वस्थता १. ऋग्वेद १/२२/११ २. ऋग्वेद १/४५/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar