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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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194 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता होने का भय ही नहीं रहता है। सभी वर्णों और वर्गों को समानता का अधिकार प्राप्त होना, स्त्री-पुरुषों को समान अधिकार एवं दायित्वों को पूरा करना, सवर्ण एवं सर्व वर्ण विवाह की पद्धति से वर्णों के मध्य भेद होने का प्रश्न वहीं समाप्त हो जाना, प्रजा को शिक्षा द्वारा गुणों को समुचित विकसित होने का अवसर प्राप्त होना आदि तथ्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका ऋग्वेद में दृष्टिगोचर होती है। (३) राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के राजदर्शन का अनुशीलन : राष्ट्र की शासनव्यवस्था का राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि राष्ट्र की शासन प्रणाली ही उसको सुख, शान्ति पूर्ण वातावरण प्रस्तुत कर सकती है और राष्ट्र के विकास एवं सुरक्षा को दृढ़ता प्रदान करने का कार्य भी करती है। ऋग्वेद काल में शासन का कार्य राजा या सभाध्यक्ष के द्वारा संभाला जाता था। राजा का चयन भी उसके गुणों के अनुसार ही किया जाना चाहिये। राजा के चयन का अधिकार प्रजा के पास था। ऋग्वेद में इसका स्पष्ट उल्लेख है। यं त्वा॑ दे॒वासो॒ मन॑वे॒ दधु॒रिह यजि॑ष्ठं हव्यवाहन। यं कण्वो॑ मेध्या॑ति॒थिर्धन॑स्पृतं॒ यं वृषा॒ यमु॑पस्तु॒तः॥१ अर्थात् इस सृष्टि में सब मनुष्यों को चाहिए कि विद्वान् और सर्वश्रेष्ठ, चतुर पुरुष मिलकर के जिस विचारशील ग्रहण योग्य वस्तुओं को प्राप्त कराने वाले, शुभ गुणों से भूषित, विद्या सुवर्णादिधनयुक्त, सभा के योग्य पुरुष को राज्य शासन के लिए नियुक्त करें वही पिता के तुल्य पालन करने वाला जन राजा होने योग्य होता है। जनसामान्य द्वारा गुणों पर आधारित चुना गया शासक सदैव राष्ट्र के लिये हितकारी ही होता है क्योंकि श्रेष्ठ गुणों से युक्त राजा अपनी प्रजा को सन्तान की तरह मानता है और उनके सुख सुविधा के लिए वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर व्यवस्था करता है। ऋग्वेद में राष्ट्राध्यक्ष के कार्यकलापों, व्यवहारों एवं नीति संविदाओं को अत्यन्त सावधानीपूर्वक वर्णित किया गया है। जिस प्रकार से सन्तानों के द्वारा पिता श्रद्धा एवं सम्मान योग्य होता है, उसी प्रकार राष्ट्राध्यक्ष का सम्मान और सत्कार राष्ट्रवासियों द्वारा किया जाना चाहिये। यदि पुत्र पिता को श्रद्धा और आदर की दृष्टि १. ऋग्वेद १/३६/१०

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar