वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 195 से सम्मान प्रदान करता है तो पिता भी अपने बच्चों को स्नेह की दृष्टि से अपार वात्सल्य प्रदान करता है। त्वाम॑ग्ने प्रथ॒ममा॒युमा॒यवे॑ दे॒वा अ॑कृण्व॒न्नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म्। इळा॑मकृण्व॒न्मनु॑षस्य॒ शास॑नीं पि॒तुर्यत्पु॒त्रो म॑म॒कस्य॒ जाय॑ते॥१ अर्थात् ईश्वरोक्त व्यवस्था करने वाले वेदशास्त्र और राजनीति के बिना प्रजापालक राजा कभी भी अपने राष्ट्र की प्रजा का पालन नहीं कर सकता है और प्रजा राजा के लिये सन्तान के तुल्य होती है। इसमें सभापति राजा पुत्र के समान प्रजा को शिक्षा अवश्य दे। राजा और प्रजा के बीच का सम्बन्ध तभी मधुर और त्याग की भावना से पूर्ण होता है। राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा के सुख के लिए वह सभी संसाधन जुटाने का प्रयास करें जो कि प्रजा के जीवन को सम्पूर्ण सुख, सुरक्षा एवं शान्तिपूर्ण जीवन देने वाले हों। इन्द्र॑स्य॒ नु वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यानि॑ च॒कार॑ प्रथ॒मानि॑ वज्री। अह॒न्नहि॒मन्व॒पस्त॑तर्द॒ प्र व॒क्षणा॑ अ॒भिन॒त्पर्व॑तानाम्॥२ "अर्थात् ईश्वर का उत्पन्न किया हुआ यह अग्निमय सूर्यलोक जैसे अपने स्वाभाविक गुणों से युक्त अन्नादि, प्रकाश, आकर्षण, दाह, छेदन और वर्षा की उत्पत्ति के लिए कामों को दिन-रात सम्पन्न करता है, ठीक उसी प्रकार प्रजा के पालन में तत्पर राजपुरुषों को भी प्रयास करना चाहिये।" राजसेवकों का कार्य राष्ट्र के निवासियों के हित में सदैव कार्यरत रहना है। वे राष्ट्रहित एवं जनहित के लिए राष्ट्रघाती शत्रुओं के छल-बल को नष्ट करके, उन पर विजय प्राप्त करके, उन्हें अपने राष्ट्र के लिए न्याय, सुख और समृद्धि का संचार करने का प्रयास करते रहना चाहिए। शत्रुरहित राष्ट्र ही समृद्धिपूर्ण एवं ऋद्धि-सिद्धि में पूर्ण हो सकता है। यदिन्द्रा॑ह॒न्प्रथम॒जामही॑ना॒मान्मा॒यिना॑ममि॒नाः प्रोत मा॒याः। आत्सूर्य॑ ज॒नय॒न्द्यामु॒षासं॑ ता॒दीत्ना॒ शत्रुं॒ न किला॑ विवित्से॥३ अर्थात् जैसे कोई राजपुरुष अपने वैरियों के बल और छल का निवारण कर उनको जीत कर अपने राज्य में सुख तथा न्याय का प्रकाश करता है, वैसे ही सूर्य भी १. ऋग्वेद १/३१/११ २. ऋग्वेद १/३२/१ ३. ऋग्वेद १/३२/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar