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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 195 से सम्मान प्रदान करता है तो पिता भी अपने बच्चों को स्नेह की दृष्टि से अपार वात्सल्य प्रदान करता है। त्वाम॑ग्ने प्रथ॒ममा॒युमा॒यवे॑ दे॒वा अ॑कृण्व॒न्नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म्। इळा॑मकृण्व॒न्मनु॑षस्य॒ शास॑नीं पि॒तुर्यत्पु॒त्रो म॑म॒कस्य॒ जाय॑ते॥१ अर्थात् ईश्वरोक्त व्यवस्था करने वाले वेदशास्त्र और राजनीति के बिना प्रजापालक राजा कभी भी अपने राष्ट्र की प्रजा का पालन नहीं कर सकता है और प्रजा राजा के लिये सन्तान के तुल्य होती है। इसमें सभापति राजा पुत्र के समान प्रजा को शिक्षा अवश्य दे। राजा और प्रजा के बीच का सम्बन्ध तभी मधुर और त्याग की भावना से पूर्ण होता है। राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा के सुख के लिए वह सभी संसाधन जुटाने का प्रयास करें जो कि प्रजा के जीवन को सम्पूर्ण सुख, सुरक्षा एवं शान्तिपूर्ण जीवन देने वाले हों। इन्द्र॑स्य॒ नु वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यानि॑ च॒कार॑ प्रथ॒मानि॑ वज्री। अह॒न्नहि॒मन्व॒पस्त॑तर्द॒ प्र व॒क्षणा॑ अ॒भिन॒त्पर्व॑तानाम्॥२ "अर्थात् ईश्वर का उत्पन्न किया हुआ यह अग्निमय सूर्यलोक जैसे अपने स्वाभाविक गुणों से युक्त अन्नादि, प्रकाश, आकर्षण, दाह, छेदन और वर्षा की उत्पत्ति के लिए कामों को दिन-रात सम्पन्न करता है, ठीक उसी प्रकार प्रजा के पालन में तत्पर राजपुरुषों को भी प्रयास करना चाहिये।" राजसेवकों का कार्य राष्ट्र के निवासियों के हित में सदैव कार्यरत रहना है। वे राष्ट्रहित एवं जनहित के लिए राष्ट्रघाती शत्रुओं के छल-बल को नष्ट करके, उन पर विजय प्राप्त करके, उन्हें अपने राष्ट्र के लिए न्याय, सुख और समृद्धि का संचार करने का प्रयास करते रहना चाहिए। शत्रुरहित राष्ट्र ही समृद्धिपूर्ण एवं ऋद्धि-सिद्धि में पूर्ण हो सकता है। यदिन्द्रा॑ह॒न्प्रथम॒जामही॑ना॒मान्मा॒यिना॑ममि॒नाः प्रोत मा॒याः। आत्सूर्य॑ ज॒नय॒न्द्यामु॒षासं॑ ता॒दीत्ना॒ शत्रुं॒ न किला॑ विवित्से॥३ अर्थात् जैसे कोई राजपुरुष अपने वैरियों के बल और छल का निवारण कर उनको जीत कर अपने राज्य में सुख तथा न्याय का प्रकाश करता है, वैसे ही सूर्य भी १. ऋग्वेद १/३१/११ २. ऋग्वेद १/३२/१ ३. ऋग्वेद १/३२/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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196 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मेघ की घटाओं की सघनता और अपने प्रकाश को ढँकने वाले बादलों का निवारण कर, अपनी किरणों को फैलाकर, मेघों को छिन्न-भिन्न और अन्धकार को दूर कर अपनी दीप्ति को प्रसिद्ध करता है। ऊ॒र्ध्वो न॑ः पा॒ह्यंह॑सो॒ नि के॒तुना॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह। कृ॒धी न॑ ऊ॒र्ध्वाञ्च॒रथाय जी॒वसे॑ वि॒दा दे॒वेषु॑ नो॒ दुव॑ः॥१ अर्थात् अच्छे गुण, कर्म और स्वभाव वाले सभाध्यक्ष राजा का यह कर्तव्य है कि राज्य की रक्षा, नीति और दण्ड के भय से सब मनुष्यों को पाप से हटा सब शत्रुओं को मारकर और विद्वानों की सब प्रकार सेवा करके, प्रजा में ज्ञान, सुख और जीवन बढ़ाने के लिए सब प्राणियों को शुभगुणयुक्त सदा किया करें। सिर्फ राजा का ही राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का दायित्व नहीं है अपितु प्रजाजनों का भी यह कर्तव्य होता है कि वे राजा के कार्यों में सहयोग करें और राष्ट्र की उन्नति, समृद्धि, सुख, शान्ति के लिए अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें। शत्रुओं के दमन करने का दायित्व सिर्फ शासन का ही नहीं होता है अपितु प्रजा का भी यह दायित्व है कि राष्ट्र में शत्रुओं का एकजुट होकर सामना करें, उनके बुरे विचारों को कभी सफल न होने दें। त्वेष॒सो॑ अ॒ग्नेर्म॑वन्तो अ॒र्चयो॑ भी॒मासो॒ न प्रती॑तये। र॒क्षस्विन॑ः॒ सद्मिद्या॑तु॒माव॑तो॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह॥२ अर्थात् 'सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों और प्रजा के मनुष्यों को चाहिए कि जिस प्रकार अग्नि आदि पदार्थ वनों को भस्म कर देते हैं उसी प्रकार कष्ट देने वाले शत्रुओं का भी विनाश करने के लिये सदैव तत्पर रहना चाहिये। इससे सदैव ही प्रजा की रक्षा होती है।' इस मंत्र के द्वारा यह भी प्रदर्शित किया गया है कि राष्ट्र की रक्षा का दायित्व सिर्फ राजपुरुषों, राजा पर ही नहीं होता है, अपितु स्वयं प्रजा को राष्ट्र रक्षा, शत्रुओं से आत्म रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिये। सभी के हित के लिए सदैव ही सबको प्रयत्नशील होना चाहिये। जिस तरह राष्ट्र का निर्माण सभी प्रजाजनों से होता है उसी प्रकार उसकी रक्षा के लिए भी सभी को प्रयत्नशील होना चाहिये। राष्ट्र की संगठन शक्ति के समक्ष बड़े से बड़ा शत्रु भी अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है। शत्रु रहित राष्ट्र ही अखण्ड बना रह सकता है। १. ऋग्वेद १/३६/१४ २. ऋग्वेद १/३६/२०

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 197 ऋग्वेद में निम्नलिखित मंत्र में 'स्वराज' पद का प्रयोग हुआ है— तं घे॒मित्था नम॑स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते। होत्रा॑भिर॒ग्निं मनु॑षः॒ समि॑न्धते तिति॒र्वांसो॒ अति॒ स्रिधः॑॥१ इस मंत्र में प्रयुक्त 'स्वराज' पद विशिष्ट अर्थ का द्योतक है। देश में स्वराज अर्थात् अपना राजा होना चाहिये। इसका अभिप्राय है कि राष्ट्र का शासक किसी दूसरे राष्ट्र का नहीं होना चाहिये। अपने देश का गुणी, उत्साही एवं कर्मठ व्यक्तित्व को राजा के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहिये जो कि राज्य की सम्यक् व्यवस्था करें। दूसरे राष्ट्र के व्यक्ति के राजा बन जाने से वह हृदय से कभी भी राष्ट्र का हित नहीं कर सकता है। अतः अपने राष्ट्र में (स्वराज्य में) सम्यक् विकास होना अनिवार्य है। अपनी मातृभूमि से जुड़े राजा को जो सम्मान प्रजा द्वारा होता है, वह बाह्य राष्ट्र के निवासी राजा को प्राप्त नहीं हो सकता है। श्रेष्ठ गुणों से युक्त तेजस्वी एवं प्रतापी राजा, सभासद एवं राजसेवक ही राष्ट्र का कल्याण कर सकते हैं।' म॒न्द्रो होता॑ गृह॒पति॑र॒ग्ने दू॒तो वि॒शाम॑सि। त्वे विश्वा॒ संग॑तानि व्र॒ता ध्रु॒वा यानि॑ दे॒वा अकृ॑ण्वत॥२ अर्थात् जो प्रशस्त राजा, दूत और सभासद् होते हैं, वे ही राज्य का पालन कर सकते हैं। उनसे विपरीत मनुष्य नहीं कर सकते हैं। इसके पश्चात् राष्ट्राध्यक्ष के प्रमुख कर्तव्यों को भी इंगित किया गया है। राष्ट्राध्यक्ष एवं राजपुरुषों को चाहिए के वे राष्ट्र में इस प्रकार की व्यवस्था करें जिससे वहाँ के विद्वान् और वैज्ञानिक आध्यात्मिक और आधिभौतिक विषयों पर सम्यक् अनुसंधान कर राष्ट्र के हित साधन में लग सकें। राष्ट्र में विद्वानों का उचित सम्मान हो तथा सदैव राष्ट्रीय संसाधन विकसित किये जा सकें। इसके निमित्त समय-समय पर राष्ट्राध्यक्ष राष्ट्र की रक्षा एवं दण्ड नीति के निर्धारण के लिए विद्वानों के साथ मंत्रणा करें और निष्कर्ष के रूप में राष्ट्रीय नीति का निर्धारण करें। ऋग्वेद में प्रजाजनों के लिए निर्देश है कि वे राष्ट्राध्यक्ष की आज्ञा का पालन करें क्योंकि राष्ट्राध्यक्ष की आज्ञा के पालन के बिना राष्ट्र में सम्पूर्ण उत्कर्ष संभव नहीं। राज्यसभा का गठन इस प्रकार का होना चाहिये कि वह सदैव ही प्रजा के हित में कार्य कर सके। १. ऋग्वेद १/३६/७ २. ऋग्वेद १/३६/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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198 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यथा॑ नो॒ अदि॑तिः॒ करत्पश्वे॒ नृभ्यो॒ यथा॒ गवे॑। यथा॑ तो॒काय॑ रु॒द्रिय॑म्॥१ अर्थात् जैसे माता-पिता अपने पुत्र के लिए, ग्वाले अपने पशुओं के लिए और राजसभा प्रजा के लिए सुखकारी होते हैं, उनके हितार्थ ही सोचते हैं और प्रयत्न करते हैं, वैसे ही मानव सुख के लिए करने और कराने वाले परमेश्वर और पवन भी हैं। विद्या और पुरुषार्थ के बिना सुख सम्भव ही नहीं है। ऋग्वेद में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रजा को राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रक्षा के लिए सूर्य के समान तेजस्वी, प्रजापालन हेतु तत्पर, शत्रु विनाशक एवं परम ऐश्वर्ययुक्त व्यक्ति को ही सभाध्यक्ष बनाना चाहिये। जो प्रजा की रक्षा न कर सके, उसे कदापि राष्ट्राध्यक्ष नहीं बनना चाहिये। स हि द्रो दुरि॑षु व॒त्र ऊ॒र्ध्वनि॑ च॒न्द्रबु॑ध्नो॒ मद॑वृद्धो मनी॒षिभि॑ः। इन्द्रं॒ तम॑ह्वे स्व॒पस्यया॑ धि॒या मंहि॑ष्ठरातिं॒ स हि पप्रि॒रन्ध॑सः॥२ अर्थात् 'मनुष्यों को चाहिये कि जो मेघ के तुल्य प्रजापालक और सूर्यवत् सुखों की वर्षा करता है उस परमेश्वर्य युक्त पुरुष को ही राष्ट्राध्यक्ष का अधिकार प्रदान किया जाये तभी राष्ट्र व राष्ट्रवासियों का हित संभव है।' राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऊपर दिये गये विवरण के अनुसार ऋग्वेद में पूर्ण रूप से इसका वर्णन विद्यमान है। अन्त में ऋग्वेद का निम्न मंत्र इस बात का द्योतक है कि वर्तमान लोकतंत्र का पूर्ण भाव उस समय के शासन में भी विद्यमान था। उप॑ ते॒ स्तोमा॑न्पशु॒पा इ॒वाक॑रं॒ रास्वा॑ पितर्मरुतां सु॒म्नम॒स्मे। भ॒द्रा हि ते॑ सु॒मति॑र्मृ॒ळयत्त॑माथ॒ा वय॒मव॒ इत्ते॑ वृणीमहे॥३ अर्थात् प्रजापुरुष राजपुरुषों से राजनीति और राजपुरुष प्रजापुरुषों से प्रजा व्यवहार को जानने योग्य को जानकर सनातन धर्म का पालन करें। ४. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के धर्म दर्शन का अनुशीलन : धर्म का स्थान राजनीति से सदैव ही जुड़ा रहता है। आचार संहिता का निर्माण १. ऋग्वेद १/५३/२ २. ऋग्वेद १/५२/३ ३. ऋग्वेद १/११४/९

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तृतीय अध्याय 199 धर्म के आधार पर ही होता है। धर्मरहित राजनीति का कोई अर्थ नहीं होता है। ऋग्वेद में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में धर्म दर्शन का वर्णन प्राप्त होता है। धर्म से जब मानव जीवन संचालित होता है तो जीवन का कोई भी क्षेत्र चाहे वह पारिवारिक जीवन हो, राजनीतिक या सामाजिक हो, धार्मिक पृष्ठभूमि या नैतिक पृष्ठभूमि से अलग हो ही नहीं सकता है। एतेना॑ग्ने॒ ब्रह्म॑णा वावृधस्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत्तै॑ चकृ॒मा वि॒दा वा॑ । उ॒त प्र णै॒ष्यभि वस्यो॒ अस्मान्त्सं न॑ः सृज सु॒मत्या वाज॑वत्या ॥१ अर्थात् 'जो मनुष्य वेद की रीति से धर्मयुक्त व्यवहार करते हैं वे ज्ञानवान् और श्रेष्ठमति वाले होकर जिस उत्तम विद्वान् की सेवा करते हैं, वह उनको श्रेष्ठ सामर्थ्य और उत्तम विद्या संयुक्त करता है।' जो धर्मपूर्ण व्यवहार करते है उनकी विचारधारा, क्रियाकलाप सभी धर्मपूर्ण होते हैं। इससे समाज, राज्य और स्वयं व्यक्ति का बहुमुखी विकास होता है। व्यक्ति श्रेष्ठता को प्राप्त होता है। अतः सदैव ही उसे धर्मानुकरण ही करना चाहिये। त्वं न॑ः सोम वि॒श्वतो॒ रक्षा॑ राजन्न॒घायत॑ः। न रि॑ष्ये॒त्वार्व॑तः॒ सखा॑ ॥२ अर्थात् मनुष्यों को इस प्रकार ईश्वर की प्रार्थना करके उत्तम यत्न करना चाहिये कि जिससे धर्म के छोड़ने और अधर्म के ग्रहण करने की इच्छा मन में जागृत ही न हो सके। धर्म और अधर्म की प्रवृत्ति में मन की इच्छा ही कारण है, उसकी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए मनुष्य को आत्मनियंत्रण की आवश्यकता होती है, जिससे धर्म के त्याग एवं अधर्म के ग्रहण की सम्भावना ही न रहे। मानव मन चंचल होता है और उसको अपने मत पर धर्माचरण द्वारा ही नियंत्रण रखना होता है। सद्‌संगति और सद्‌विचारों से ही उसकी विचारधारा धर्मपूर्ण रहती है जो कि स्वयं उसके लिए और राष्ट्र के लिए उत्तम होती है। तत्तै॑ भ॒द्रं यत्समि॑द्धः॒ स्वे दमे॒ सोमा॑हुतो॒ जर॑से मृ॒ळय॑त्तमः । दधा॑सि॒ रत्नं॑ द्रवि॑णं च दा॒शुषेऽग्ने॒ सख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥३ अर्थात् 'मनुष्यों को चाहिए कि अपने आचरण एवं विचारों को धर्मपूर्ण बनाये रखने के लिए वेद प्रमाण और सृष्टिक्रम के प्रमाण तथा सद्पुरुषों, ईश्वर और विद्वान् १. ऋग्वेद १/३१/१८ २. ऋग्वेद १/९१/८ ३. ऋग्वेद १/९४/१४

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 200 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के काम और स्वभाव को मन में धारण करके सब प्राणियों के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करके सदा धर्म की उन्नति में अपना सहयोग प्रदान करना चाहिए।' मानव को स्वयं धर्म का आचरण करना चाहिये और दूसरे लोगों को भी इस कार्य के लिये प्रेरित करना चाहिये, ताकि उस समाज का वातावरण धर्ममय हो। धर्म से पृथक् कुछ सोचा ही नहीं जा सकता है। इससे पृथक् कुछ होना भी नहीं चाहिए क्योंकि जीवन का आरम्भ ही धर्ममय वातावरण से होता है। अ॒द्या दे॑वा॒ उदि॑ता॒ सूर्य॑स्य॒ निरंह॑सः पिपृ॒ता निर॑व॒द्यात्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥१ अर्थात् "मनुष्यों का यह कर्तव्य है कि वे पाप की छाया से भी दूर रहें और धर्म का आचरण करते हुए परमपिता परमेश्वर की उपासना करें और उसी के अनुरूप जीवन व्यतीत करते हुए अपने पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की परिपूर्ण सिद्धि करें।" वि यदस्या॑धृ॒जतो॒ वात॑चोदितो॒ ह्वारो॒ न वक्क्रा॑ जर॒णा अना॑कृतः। तस्य॑ प॒त्मन्त्कृ॒ष्णः कृ॑ष्ण॒जंह॑सः॒ शुचि॑जन्म॒नो रज॒ आ व्य॑ध्वनः॥२ अर्थात् धर्म जीवन की वह धुरी है जिस पर परिक्रमा करता हुआ मानव जीवन इस तरह प्रसिद्ध एवं यज्ञपूर्ण होता है जैसे कि सूर्य का यश सम्पूर्ण पृथ्वी को आलोकित करता है। उसी प्रकार व्यक्ति की कीर्ति चारों दिशाओं में फैलती रहती है। अस्ता॑व्य॒ग्निः शि॒मीव॑द्भि॒रर्कैः साम्ना॑ज्य॒य प्र॒तरं॑ दधा॑नः। अ॒मी च॒ ये म॒घव॑ानो व॒यं च॒ मिहं॒ न सूरो॒ अति॑ नि॒ष्टत॑न्युः॥३ अर्थात् जो मनुष्य धार्मिक विद्वानों से अच्छी शिक्षा को पाये हुए धर्म से राज्य का विस्तार करते हुए प्रयत्न करते हैं वे ही राज्य, विद्या और धर्म के उपदेशों का अच्छी प्रकार स्थापन करने के योग्य होते हैं। धर्म के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य सदैव धर्म का प्रचार ही करते हैं और धर्म का विकास मानवीय प्रयासों का ही परिणाम होता है। जिस प्रकार अधर्म को छोड़कर धर्म अपनाकर ईश्वरीय अनुष्ठान करने से ईश्वर की प्राप्ति होती है उसी प्रकार उन्हें अपने जीवन में अतिरमणीय आनन्द की प्राप्ति होती है। १. ऋग्वेद १/११५/६ २. ऋग्वेद १/१४१/७ ३. ऋग्वेद १/१४१/१३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 201 ए॒ष वः॒ स्तोमो॑ मरुत इ॒यं गीर्मा॒न्दार्य॑स्य मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। एषा या॑सीष्ट त॒न्वे॑ व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥१ अर्थात् जो आप्त, शास्त्रज्ञ, धर्मात्मा विद्वान् पुरुषों की उत्तेजना से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होकर धर्मयुक्त व्यवहार का आचरण करते हैं, उनके जन्म की सफलता है यह जानना चाहिये। इस तरह मानव जीवन की सफलता का श्रेय सदैव ही धर्म एवं विवेकपूर्ण आचरण को दिया गया है। यस्या॑व॒धीत्पि॒तरं॒ यस्य॑ मा॒तरं॒ यस्य॑ श॒क्रो भ्रात॑रं॒ नार्त ईष॑ते। वेतीद्व॑स्य॒ पर्य॑ता यतं॒करो॒ न किल्बि॑षादीषते॒ वस्व॑ आक॒रः॥२ अर्थात् "माता, पिता और भ्रातृ आदि का पालन करें तथा उनके पुत्र आदि को चाहिए कि वे निरन्तर सत्कार करें और पापाचरण का त्याग करके धर्म का पालन करते हुए इस प्रकार का आचरण करें कि वे सभी काल में सुखी होवें।" व्यक्ति अपने जीवन में धर्माचार्यों से धर्म की शिक्षा, वेद-शिक्षा, शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण करते हुए धर्म की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करता है और उसका अनुकरण करते हुए अभीष्ट को प्राप्त करता है। इस अभीष्ट की प्राप्ति में ही मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन सफल होता है। ते हि स॒त्या ऋ॑त॒स्पृश॑ ऋ॒तावा॑नो जने॑जने। सु॒नी॒थासः॑ सु॒दान॑वो॒ऽहोश्चि॑द्रुरुच॒क्रयः॑॥३ अर्थात् "जो स्वयं धर्मयुक्त, गुण, कर्म और स्वभाव वाले होते हैं, दुष्ट आचरण से पृथक् व्यवहार करके अन्य मनुष्यों को तादृश अर्थात् अपने समान मानते हैं, वे धन्यवाद के योग्य हैं।" इस प्रकार यह स्पष्ट दृष्टिगोचर है कि ऋग्वेद में दी गई शिक्षा से यह प्राप्त होता है कि धर्मानुरूप आचरण, शिक्षा एवं ज्ञान के द्वारा इस तरह का वातावरण प्रस्तुत होता है कि राष्ट्र एक आदर्श राज्य बन जाता है और वह अपनी राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के प्रति ही निष्ठावान् नहीं रहता है अपितु वह दूसरे राष्ट्रों के लिए भी अपने


१. ऋग्वेद १/१६५/१५ २. ऋग्वेद ५/३४/४ ३. ऋग्वेद ५/६७/४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 202 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन में सम्मान की भावना रखता है- आ यद्द्वा॑मीयचक्ष॑सा मि॒त्रं व॒यं च॑ सू॒र्यः॑। व्यचि॑ष्ठे बहु॒पाय्ये॑ यते॑महि स्व॒राज्ये॑।।१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि वह मित्रता करके सभी राज्यों के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार रखें तथा अपने और दूसरे राज्य के न्याय की रक्षा करते हुए धर्म की उन्नति करें। ५. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के आचारदर्शन, शिक्षा दर्शन एवं अर्थदर्शन का अनुशीलन : राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद में जो आचारदर्शन प्रस्तुत किया गया है उससे एक अच्छी समष्टि प्रस्तुत करने के लिए आचार संहिता प्रस्तुत की गई है। अच्छे संस्कारों से ही व्यक्ति का अच्छा व्यक्तित्व बनता है और सद्चरित्र एवं सुसंस्कारों वाले नागरिकों से ही राष्ट्र का अखण्ड स्वरूप बनता है। उ॒त नः॑ सु॒भगाँ॑ अ॒रिवो॑चेयु॒र्दस्म॒ कृ॒ष्टय॑ः। स्यामेदिन्द्र॑स्य॒ शर्म॑णि।।२ अर्थात् "जब समाज में सभी व्यक्ति विरोध को छोड़कर दूसरों पर उपकार करने का प्रयत्न करते हैं तब शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, जिससे सब मनुष्यों को ईश्वर की कृपा से निरन्तर उत्तम आनन्द प्राप्त होता है।" मानव मात्र के साथ बंधुत्व की भावना का विकास करके जब सबके साथ प्रेम, सहयोग और अपनत्व की भावना से पूर्ण होकर जीवन व्यतीत करते हैं तब एक सुगठित समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है। इसके मध्य निजी हित कभी नहीं आता है। किसी के प्रति द्वेष की भावना रखना भी धर्म और आचार की दृष्टि से गलत है:- मा नो॒ मर्तों अभि द्रुहन् तनूना॑मिन्द्र गिर्वणः। ईशा॑नो यवया व॒धम् ।।३ अर्थात् कोई भी मनुष्य अन्यायपूर्ण ढंग से किसी का अहित करने की कभी न सोचे क्योंकि अन्याय का समर्थन न तो धर्म करता है और न ही आचार संहिता। इससे अच्छा यह है कि व्यक्ति परस्पर सबके साथ मित्र भाव बनाये रखें, क्योंकि बिना अपराध के ईश्वर भी किसी का तिरस्कार नहीं करता है। ठीक उसी प्रकार १. ऋग्वेद ५/६६/६ २. ऋग्वेद १/४/६ ३. ऋग्वेद १/५/१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 203 मानव को भी आपस में सभी के साथ न्यायसंगत व्यवहार करना चाहिये। जो व्यक्ति विद्या-सम्पादन आदि कार्यों में संलग्न होते हैं वे सदा दूसरों को ज्ञान या विद्या प्रदान करने का कार्य करते हैं और उनके प्रयत्न सदा दूसरों का हित करने का ही होता है। ईश्वर ऐसे मनुष्यों को सदैव आशीर्वाद देता है जो मनुष्य विद्वान् होकर सबके प्रति परोपकार की भावना से हित पहुँचाने का प्रयास करते हैं और दूसरों को सुखी देखकर ही वे स्वयं अपने आपको सुखी अनुभव करते हैं। यु॒वाकु॒ हि शची॑नां यु॒वाकु॑ सुमती॒नाम्। भू॒याम॑ वा॒जदा॑व्नाम्॥१ अर्थात् मनुष्यों को सदा आलस्य छोड़कर अच्छे कामों का सेवन तथा विद्वानों का समागम नित्य करना चाहिये, जिससे अविद्या और दरिद्रता जड़ मूल से नष्ट हों। नमो॑ म॒हद्भ्यो॒ नमो॑ अर्भ॒केभ्यो॒ नमो॒ युव॑भ्यो॒ नम॑ आशि॒नेभ्य॑:। यजा॑म दे॒वान्यदि॑ श॒क्नवा॑म॒ मा ज्याय॑स॒: शंस॒मा वृ॑क्षि दे॒वाः॥२ अर्थात् "ईश्वर का यह उपदेश है कि मनुष्यों को चाहिये कि अभिशाप छोड़कर अन्नादि से सब उत्तम जनों का सत्कार करें अर्थात् जितना पदार्थ आदि उत्तम बातों से अपना सामर्थ्य हो उतना उनका संग करके विद्या प्राप्त करें किन्तु उनकी कभी निन्दा न करें।" परनिन्दा मानव के लिये शोभा नहीं देता है, यह सब आचार संगत नहीं है। सम्पूर्ण गुणों से युक्त व्यक्ति ही सर्वश्रेष्ठ मानव समझा जाता है। वि॒द्वांसा॑वि॒दुर॑: पृ॒च्छेदवि॑द्वान्नि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः। नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑॥३ अर्थात् "विद्वान् व्यक्तियों द्वारा दिये गये परामर्श के अनुसार ही दूसरों के साथ व्यवहार करें। सदैव विद्वानों को पूछकर सत्य और असत्य का निर्णय कर आचरण करें और झूठ का सदैव ही त्याग करें। इस बात में किसी को कभी आलस्य नहीं करना चाहिये क्योंकि बिना पूछे कोई नहीं जानता है, इससे किसी को मूर्खों के उपदेश पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये।" ब॒ळित्था तद्वपु॑षे धायि दर्शतं दे॒वस्य॒ भर्गो॒ सह॑सो॒ यतो जनि॑। यदी॒मुप॒ ह्वर॑ते॒ साध॑ते म॒तिर्ऋ॒तस्य॒ धेना॑ अनयन्त स॒स्रुतः॑॥१


१. ऋग्वेद १/१७/४ २. ऋग्वेद १/२७/१३ ३. ऋग्वेद १/१२०/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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204 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

अर्थात् हे मनुष्यों! जिस उत्तम बुद्धि और सत्य आचरण से विद्यावानों का देखने योग्य स्वरूप धारण किया जाता है और उनका कार्य भी सिद्ध किया जाता है, उस वाणी और उस सत्य आचार को तुम नित्य स्वीकार करों। शिक्षा दर्शन :- ऋग्वेद में शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को वास्तविक अर्थ में शिक्षित करके ज्ञान प्रदान करना है। जन्म के पश्चात् वह शिक्षा ग्रहण करने का अधिकारी हो जाता है। विद्या ग्रहण करने के लिए विद्यार्थी का ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य बतलाया गया है। क्योंकि वेद शास्त्रों का ज्ञान आज जैसी पुस्तकें रटने और परीक्षा पास कर लेने मात्र का नाम नहीं था। इस शिक्षा का अर्थ उसे ग्रहण करके उसको अपने जीवन में ही लागू करना होता था। सं नु वो॑चावहै॒ पुनर्य॒तो॑ मे॒ मध्वाभृ॑तम्। होते॑व॒ क्षद॑से प्र॒यम्॥२ अर्थात् जैसे यज्ञ करने वाले एवं कराने वाले प्रीति के साथ मिलकर यज्ञ को सिद्ध कर पूर्ण करते हैं वैसे ही गुरु-शिष्य मिलकर सब विद्याओं का प्रकाश करें। सब मनुष्यों को इस बात की इच्छा निरन्तर रखनी चाहिए कि जिससे हमारी विद्या की वृद्धि प्रतिदिन होती रहे। मधु॒ वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः। माध्वी॑र्नः स॒न्त्वोष॑धीः॥३ अर्थात् हे पढ़ाने वाले विद्वानों! शिक्षकों! तुम और हम मिलकर ऐसा यत्न करें कि जिससे सृष्टि के पदार्थों से समग्र आनन्द के लिये विद्या से उपकारों को ग्रहण कर सकें। मनुष्यों का सदैव यह प्रयास होना चाहिये कि वे अच्छी वैज्ञानिक पद्धति से शिक्षा ग्रहण करके देश व राष्ट्र की उन्नति के लिये अत्याधुनिक विमानों और अस्त्र- शस्त्रों का निर्माण करने में सफलता प्राप्त करें जिससे कि शत्रुओं का सामना कुशलतापूर्वक किया जा सके। एना॒ङ्गू॒षेण॑ वय॒मिन्द्र॑वन्तो॒ऽभि ष्या॑म वृ॒जने॒ सर्व॑वीराः। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः सिन्धु॑ः पृथि॒वी उत द्यौः॥१९॥४ अर्थात् "मनुष्यों को चाहिए कि जिसके पढ़ाने से विद्या और अच्छी शिक्षा बढ़ें,


१. ऋग्वेद १/१४१/१ २. ऋग्वेद १/२५/१७ ३. ऋग्वेद १/९०/६ ४. ऋग्वेद १/१०५/१९

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 205 उसके संग से समस्त विद्याओं का सर्वथा निश्चय करें। वे विद्यायें अधिक उचित होती है जिनसे कि व्यक्ति के आन्तरिक गुणों का विकास हो सके और वह गुणवान् होकर स्वयं भी वैसी ही शिक्षा प्रदान करने में समर्थ हो सके।'' विद्या देने वालों के लिए भी ऋग्वेद में निर्देश दिया गया है कि शिक्षा का स्वरूप एवं उद्देश्य क्या हो? किस प्रकार की शिक्षा सर्वजनहिताय सिद्ध हो सकती है, उस बारे में ऋग्वेद में कहा गया है कि अध्यापकों और उपदेष्टाओं के लिए यह योग्य है कि विद्या और धर्म के उपदेश से सब जनों को विद्वान् धार्मिक करके पुरुषार्थयुक्त निरन्तर किया करें।१ ऋग्वेद में स्त्री-शिक्षा के प्रति भी पूर्ण ध्यान दिया गया है। उस समय स्त्री एवं पुरुष में कोई भेद नहीं किया गया था, अतः कुमारी कन्याओं की शिक्षा के लिए निर्देश है कि वे विदुषियों से शिक्षा ग्रहण करें और वे सभी कुमारी ब्रह्मचारिणी विदुषियों से प्रार्थना करें कि आप हम सबको विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें।२ पुरुष विद्वानों को यदि ब्रह्मचारी कुमारों को शिक्षा प्रदान करनी चाहिये तो विदुषी स्त्रियों को ब्रह्मचारिणी कुमारियों को शिक्षा प्रदान करनी चाहिये। उन्हें अच्छी प्रकार शिक्षा प्रदान करनी चाहिये। सूर्य और भूमि जिस प्रकार सबको उन्नति देते हैं, उसी प्रकार विद्वानों को शिक्षार्थियों को ज्ञान प्रदान करना चाहिये।३ इस प्रकार शिक्षा से ही राष्ट्र का विकास होता है, उनमें ज्ञान आता है और राष्ट्र की महत्ता का उन्हें ज्ञान होता है। राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का भान होता है। अर्थदर्शन :- वैदिक युग में आर्थिक व्यवस्था अत्यन्त सुविकसित प्रतीत होती है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु गति देने के लिए उस देश की कृषि और खनिज सम्पदा का विशेष महत्त्व होता है। आर्थिक दृष्टि से अर्थ का सबसे बड़ा स्रोत पृथिवी ही होती है। इसी पृथिवी के गर्भ से फसलें पैदा होती हैं, इसके गर्भ में खनिजों की खानें सुप्त होती हैं। जल के स्रोत भी पृथिवी के गर्भ में ही रहते हैं और यह सब मानव जीवन के आधार होते हैं। यदि पृथिवी को माँ कहा जाता है तो इसी दृष्टि से वह मातृभूमि होती है। अपनी सभी सन्तानों के लिए अन्न, फल-फूल आदि देने वाली वही होती है। ऋग्वेद में कृषि-कर्म और उसके उपकृत्यों का कई स्थानों पर वर्णन प्राप्त होता १. ऋग्वेद १/११२/१६ २. ऋग्वेद २/४१/१६ ३. ऋग्वेद २/४१/१७-२० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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206 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता है। वर्षा कृषि का आधार है जिसका अधिष्ठाता देवता इन्द्र है और उनकी स्तुति ऋग्वेद में सर्वाधिक की गई है। ऋग्वेद के अनुसार¹ आश्विन युग्म ने मनु को बीज बोने की कला सिखाई तथा आर्यों को हल की सहायता से कृषि-कर्म सिखलाया। पशुपालन के बारे में ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है। व्यापार के बारे में भी ऋग्वेद में उल्लेख प्राप्त होता है- याभिः॑ सु॒दानू औशि॒जाय॑ व॒णिजे॑ दी॒र्घश्र॑वसे॒ मधु॒ कोशो॒ अक्ष॑रत्। क॒क्षीव॑न्तं स्तो॒तारं॒ याभि॒राव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्विना॒ गत॑म्॥² अर्थात् "राजपुरुषों से योग्य है कि जो द्वीप द्वीपान्तर और देश देशान्तर में व्यापार करने के लिये आवे-जावें, उनकी रक्षा का प्रयत्न करें।" इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मधुर सम्बन्ध बनाने का एक साधन व्यापार भी था और इसके अर्थ आगमन के साथ-साथ सम्बन्धों की मधुरता में भी वृद्धि होती थी। ७. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को ऋग्वेद का प्रदेय : सम्पूर्ण ऋग्वेद में मानव, शिक्षा, राष्ट्र, राष्ट्राध्यक्ष एवं प्रजा सभी को पृथक्-पृथक् मंत्रों के द्वारा निर्देश प्रदान किये गये हैं। आज राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ऐसा विषय बना हुआ है कि यह सबसे विचारणीय-विषय और समस्या दोनों ही कहा जा सकता है। इसका समाधान यदि वैदिक वाङ्मय में खोजा जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इस समस्या से जो आज अनुभव किया जा रहा है, उसमें एकता एवं अखण्डता के बारे में पृष्ठभूमि पहले से ही सुनिश्चित की जा चुकी है। यदि आज भी उस पर दृष्टिपात करें तो वे हमें एकता के सूत्र को और मजबूत करने का अवसर प्रदान करते हैं। आदर्श रूप में मातृभूमि या स्वतंत्र राष्ट्र के विकास के लिए सात गुणों को बतलाकर उस मंत्र में एक अत्युपयोगी शिक्षा का समावेश किया गया है। प्रत्येक समाज, राष्ट्र या देश में कुछ न कुछ ऊँच-नीच के भाव रहते हैं। यह सहज अनुभव से आता है कि प्रत्येक परिवार के कुछ सदस्य आयु, शारीरिक बल, विद्या और बुद्धि में एक दूसरे से न्यूनाधिक हो सकते हैं। पुनः जब राष्ट्र बहुत बड़ा होता है तो इस प्रकार के भेद दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक है। आदर्श रूप में उनके मध्य में इस प्रकार का ऐक्य होना चाहिये जिससे उनमें १. ऋग्वेद १/११२/१६ २. ऋग्वेद १/११२/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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तृतीय अध्याय 207 किसी प्रकार का वैर न हो और मातृभूमि की प्रगति में सब समान रूप से भाग ले सकें। इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए बताया गया है- यस्याः मानवानां मध्यतः बहु असम्बाधम्। जिस राष्ट्र या मातृभूमि के विभिन्न सम्प्रदायों में सहज भेद होते हुए निर्वैरभाव एवं सामूहिक उन्नति में परस्पर सौहार्द, सद्भावना एवं सहयोग करने की भावना होती है वही यथार्थ रूप में एकता और अखण्डता को कायम रख सकता है। राष्ट्र की प्रतिष्ठा अविचल रखने के लिए आवश्यक है कि शत्रु का विनाश किया जावे। जिस प्रकार सूर्य को मेघ के हनन में कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है अपितु सहज रूप से ही उसका हनन हो जाता है। राष्ट्रप्रेमियों को इस प्रकार की सुव्यवस्था हो कि शत्रुओं का बिना किसी विशेष चेष्टा के ही नाश हो जावें। कभी-कभी राष्ट्र की महिमा और गरिमा का विस्तार करने के लिये प्रयास करना पड़ता है। निरि॑न्द्र॒ भूम्या॒ अधि॑ वृ॒त्रं ज॑घन्थ॒ निर्दि॒वः। सृ॒जा म॒रुत्व॑तीर॒प॑ जी॒वध॑न्या इ॒मा अ॒पोऽर्च॑न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥१ अर्थात् जो राज्य करने की इच्छा करे वह विद्या, धर्म और विशेष नीति का प्रचार करके स्वयं धर्मात्मा होकर पूरे राष्ट्र के पिता के समान व्यवहार करे। इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॒ दोध॑तः॒ सानुं॒ वज्रे॑ण हीळितः। अ॒भि॒क्रम्याव॑ जिघ्नते॒ऽपः सर्म॑ाय चोदय॒न्नर्च॑न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् 'राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के रक्षक शूरवीर, पराक्रमी अधिकारियों का परम कर्तव्य है कि वे राष्ट्र को शत्रुओं से सर्वथा मुक्त रखें। शत्रुओं के नाश का कार्य सहज गति से होना चाहिये। राष्ट्र के शासन व्यवस्था आदर्श होनी चाहिये ताकि शत्रु यदि उत्पन्न हो तो स्वतः ही नष्ट हो जावें। इसके लिये राज्याधिकारियों को समुचित व्यवस्था करनी चाहियें।' इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्र की सुव्यवस्था का पूर्ण वर्णन करते हुए उसकी एकता और अखण्डता के लिये ऋग्वेद में विभिन्न मंत्रों और सूक्तों में न्याय प्रणाली, चुनाव पद्धति, समस्त शत्रुओं से मातृभूमि की रक्षा एवं सूर्य के आदर्श आदि का अध्ययन किया गया है। इसके लिये यदि ऋग्वेद में वर्णित आदेशों का पालन किया जाय तो हम अपनी वर्तमान समस्या से मुक्त हो सकते हैं। १. ऋग्वेद १/८०/४ २. ऋग्वेद १/८०/५

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय यजुर्वेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. यजुर्वेद में प्रतिबिम्बित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का आधारतत्त्व : राष्ट्र का अस्तित्व पृथ्वी पर सदैव ही विद्यमान रहा है। राष्ट्र के बारे में वैदिककालीन साहित्य में प्रमाण उपलब्ध हैं और मात्र प्रमाण ही नहीं अपितु उसका विस्तृत विवरण भी प्राप्त होता है। ‘‘राष्ट्रे जागृयाम् वयम्’’ अर्थात् हम राष्ट्र में जागें। इसका आशय यही हो सकता है कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता के प्रति सजगता का भाव मानवमात्र में सदैव से ही रहा है। प्रत्येक व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध से परिचित होता था और वेदों में उसको अपने राजा के चयन में गुणों की परीक्षा करने का अधिकार भी प्रदान किया गया है। उस समय मात्र राजा में ही गुणों की अपेक्षा नहीं की गई थी अपितु नागरिकों के भी राष्ट्र के प्रति दायित्व निश्चित किये गये थे। राष्ट्र की रक्षा का दायित्व मात्र राजा का ही नहीं होता है अपितु उसके लिये प्रजाजनों के प्रयास भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं- मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्।१ अर्थात् राष्ट्र या जनसमूह तुमसे गिरे नहीं। इस राष्ट्र के न गिरने का अभिप्राय इसकी एकता और अखण्डता से ही है। जब राष्ट्र का दायित्व राजा को सौंपा जाता है तो यही विचार किया जाता है कि राजा प्रजा को पुत्रवत् मानकर उसका लालन- पालन कर उसे समृद्धशाली एवं दृढ़ बनायेगा। उसमें वैमनस्य या वैचारिक कटुता आने का कोई अवसर प्रदान नहीं करेगा। तभी राष्ट्र एक सूत्र में आबद्ध होकर अपने अस्तित्व की रक्षा करेगा। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता का दृढ़ सूत्र है- राष्ट्र में परस्पर प्रेम एवं सद्भाव। इसके लिये यजुर्वेद के निम्न मन्त्र में इस प्रकार का उल्लेख है- पाहिय॒ज्ञं पाहि॑ य॒ज्ञप॑तिं विष्णु॒स्त्वामि॑न्द्रियेण॑ पातु विष्णुं॒ त्वं पा॑ह्यभि सर्व॑नानि पाहि॥२ १. वा०स० १२/११ २. यजुर्वेद अध्याय ७ मन्त्र २० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 209 इसका अभिप्राय है “राजा एवं विद्वानों को योग्य है कि वे राज्य की निरन्तर उन्नति के लिये प्रयत्नशील रहें। वे आदेश और विद्या के प्रचार द्वारा ही प्रजा को अभिभूत कर सकते हैं। राजा, प्रजा और उत्तम विद्वानों की परस्पर प्रीति से ही ऐश्वर्य की उन्नति और आनन्द में वृद्धि होना संभव है।" राष्ट्र में जब पर्याप्त उन्नति के साधन विद्यमान होंगे और सभी को उसमें संलग्न रहने का अवसर प्राप्त होगा तो वे स्वयं ही अपने परिवार एवं राष्ट्र के निर्माण के प्रति सजग रहेंगे तथा आपसी मेल-जोल एवं प्रेम ही इस बात का प्रतीक है कि राष्ट्र में एकता की भावना दृढ़ रूप से विद्यमान है। वे आपस में मिल-जुल कर रहेंगे तो राष्ट्र में खुशहाली तथा उन्नति के द्वार सदैव ही खुलें रहेंगे। स॒जूर्ब्दो अ॒र्यवो॑भिः स॒जूरू॒षा अ॑रु॒णीभिः॑। सजो॑ष॒साव॒श्विना॒ दध॑त्सौभिः स॒जूः सूर॒ एत॑शेन स॒जूवैश्वान॒र इड॑या घृ॒तेन॒ स्वाहा॑।।१ अर्थात् मनुष्यों में जितनी परस्पर मित्रता हो उतना ही सुख और जितना विरोध उतना ही दुःख होता है। इसीलिए सभी लोग (स्त्री-पुरुष) परस्पर उपकार ही सदा बरतें। किसी भी राष्ट्र की एकता एवम् अखण्डता के लिए उस राष्ट्र के निवासियों के मध्य परस्पर परोपकार, सहयोग एवं प्रेम की भावना की विद्यमानता अत्यन्त आवश्यक है। इनकी उपस्थिति से ही राष्ट्र की सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। एक सुखी और समृद्ध व्यक्ति राष्ट्र की एकता पर प्रहार करने का प्रयास नहीं कर सकता है। सब आपस में मिलकर उसका सामना करने में पूर्ण सक्षम होते हैं। जहाँ लोगों में एकता की भावना रहती है, वहाँ पर राष्ट्र में भी एकता होती है। गाय॒त्री त्रि॒ष्टुब्जग॑त्यनु॒ष्टुप्प॒ङ्क्त्या स॒ह। बृ॒हत्यु॒ष्णिहा॑ क॒कुप्सू॒चीभि॑: शम्यन्तु त्वा।।२ इस मंत्र के भावानुसार जो विद्वान् गायत्री आदि छन्दों के अर्थ को बताने से मनुष्यों को विद्वान् करते हैं, वे सुई से फटे वस्त्र को सीते हैं, वे अलग-अलग मत वालों को सत्य में मिलाप कर देते हैं और उनको एक मत में स्थापित करते हैं, वे जगत् का कल्याण करने वाले होते हैं।


१. यजुर्वेद अध्याय १२ मन्त्र ७३ २. यजुर्वेद २३/३३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 210 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता सम्पूर्ण राष्ट्र में विभिन्न बातों का एक मत होना अनिवार्य होता है, मतैक्य से भावात्मक एकता में वृद्धि होती है। इसीलिए बुद्धिजीवियों, शिक्षक वर्ग एवं राजनेताओं का यह प्रयास होना चाहिए कि सम्पूर्ण देश में निजी स्वार्थों को त्याग कर यदि मानव के मन में किसी तरह का भेद हो तो भी उन्हें मिलाने का प्रयत्न करना चाहिये। उन्हें इस तरह की शिक्षा दी जानी चाहिये कि अनेकता में एकता का भाव उत्पन्न कर सकें। य॒ज्ञो दे॒वानां॒ प्रत्ये॑ति सु॒म्नमादि॑त्यासो॒ भव॑ता मृ॒डय॑न्तः। आ वो॒ऽर्वाची॑ सुमतिर्व॑वृ॒त्यादधं॒होग्ने॑श्चि॒द्या व॑रिवो॒वित्त॑रा॒स॑त्॥१ अर्थात् जिस देश में पूर्ण विद्या वाले राजकर्मचारी हों वहाँ सब की एकमति होकर अत्यन्त सुख बढ़ें। एक समृद्धशाली देश के लिये सभी को सुशिक्षित होना चाहिए। इस आवश्यकता को वैदिक काल में ही अनुभव कर लिया गया था। शिक्षित नागरिक देश के लिए गौरवशाली प्राणी हो सकते हैं। देश की शासन प्रणाली को सुचारु रूप से चलाने के लिए भी शिक्षा अनिवार्य है। जिस राष्ट्र में शिक्षित एवं प्रबुद्ध नागरिक होंगे, वहाँ पर सभी व्यक्ति एक मत होंगे और राष्ट्र सुख समृद्धि की ओर अग्रसर होगा। देश की एकता एवं अखण्डता के लिए उनमें मतैक्य एवम् आपसी समझदारी बहुत ही आवश्यक होती है। दे॒वासो॒ हि ष्मा॒ मन॑वे॒ सम॑न्यवो॒ विश्वे॑ सा॒कथं सरा॑तयः।२ देश की एकता एवं अखण्डता पर आघात करने वाले दुर्बुद्धिजनों की भी कमी नहीं रहती हैं। अतः सद्विचारों से पूर्ण व्यक्तियों को सदैव अपने परिवेश में सुख शान्ति की स्थापना का प्रयास करना चाहिये तथा ऐसे व्यक्तियों, जो इसमें विघ्न डालें, का अन्त करके ही शान्ति स्थापना का प्रयास करना चाहिये। मानव की मानसिक प्रवृत्तियों की शुद्धता पर हमेशा ही ध्यान दिया जाता है क्योंकि वह ही राष्ट्र की आधारशिला है और सद्विचारों, सद्प्रवृत्तियों की उपस्थिति से ही राष्ट्र की समृद्धि का निर्धारण होता है। २. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के समाजदर्शन का अनुशीलन राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में समाजदर्शन की भी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। वैदिक वाङ्ग्मय में तत्कालीन भारतीयसमाज का जो चित्र १. यजुर्वेद ३३/६८ २. यजुर्वेद ३३/९४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 211 परिलक्षित होता है, उसके विश्लेषण से ज्ञात होता है कि वह अत्यन्त सुख- सौमनस्यपूर्ण, एकता और समरसतामूलक तथा स्वस्थ विकास की आधारशिला पर बनाया हुआ वह भवन था जिस पर एक अडिग विशाल गृहयोजना स्थापित थी। समाज का वर्गीकरण जाति या धर्म के आधार पर न होकर व्यवसाय पर आधारित था। पारिवारिक पृष्ठभूमि संयुक्त होते हुए भी सबके विकास की भावना से अनुस्यूत थे। व्यक्ति और समाज के सम्बन्धों में किसी प्रकार की खींचतान की प्रवृत्ति न होकर पारस्परिक दायित्व की ग्रहणशीलता और सहयोग की दृष्टि समाहित थी। स्त्रियों का स्थान अत्यन्त सम्मानपूर्ण था। बालकों एवं किशोरों के प्रति वात्सल्य एवं सद्भाव विद्यमान था। समाज के सभी वर्गों में परस्पर प्रेम की भावना थी। क) वर्ण व्यवस्था :- वैदिककालीन वर्ण व्यवस्था श्रम विभाजन के आधार पर आधारित थी। कोई भी कार्य निकृष्ट नहीं समझा जाता था और कोई भी जाति हीनता की दृष्टि से नहीं देखी जाती थी। यह व्यवस्था जन्मना न होकर कर्मणा थी। इसमें सभी वर्णों में एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना विद्यमान थी। वेदों के अध्ययन, अध्यापन, यजन-याजन ब्राह्मणों के प्रमुख कार्य थे लेकिन कृषि कार्य से भी वे विरत न थे। विद्याध्ययन का अधिकार सभी वर्णों को प्राप्त था। यजुर्वेद में इस आशय को इस मंत्र द्वारा स्पष्ट किया गया है- य॒थेमां वाचं॑ कल्या॒णी मा॒वदा॑नि॒ जने॑भ्यः। ब्र॒ह्म॒रा॒ज॒न्या॑भ्याꣳ शूद्राय॒ चार्या॑य च॒ स्वाय॒ चार॑णाय च। प्रि॒यो दे॒वानां॒ दक्षि॑णायै दा॒तुरि॒ह भू॑यासम॒यं मे॒ कामः॒ समृ॑ध्यता॒मुप॑ मा॒दो न॑मतु॥१ समाज के सभी वर्णों को वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त था। क्षत्रिय वर्ण का कार्य सुशासन स्थापना का तो था ही, साथ ही वे अन्य कार्य भी करते थे। यही स्थिति वैश्यों की भी थी। पशुपालन, कृषि और वाणिज्य इस वर्ण के प्रमुख कार्य थे, परन्तु अन्य कार्यों को भी करना उन्हें सौंपा गया था। शूद्रों का कार्य समाज की सेवा-शुश्रूषा करना कहा गया है, परन्तु उनके प्रति समाज के दृष्टिकोण में किसी तरह की उपेक्षा, घृणा या तिरस्कार की भावना परिलक्षित नहीं होती थी। सभी वर्णों में समानता की भावना ही राष्ट्र की एकता को सम्बल प्रदान करने वाला रहा है। ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिक काल में आश्रम व्यवस्था का प्राविधान था जिसमें मनुष्य की आयु को चार वर्गों में विभाजित करके उसके आचरण एवं दायित्वों १. यजुर्वेद २६/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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212 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को निश्चित कर दिया गया था। उन्हीं के अनुरूप व्यक्ति को अपना जीवन व्यतीत करना होता था। दिवस्परिं प्रथमं ज॑ज्ञे अ॒ग्निर॒स्मद् द्वि॒तीयं॒ परि॑ जा॒तवे॑दाः। तृ॒तीय॑म॒प्सु नृ॒मणा॒ अज॑स्र॒मिन्धा॑न एनं जरते स्वा॒धीः।।१ इस मंत्र का भाव इस बात की पुष्टि करता है कि मनुष्यों को चाहिये की वे प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम के सहित विद्या तथा शिक्षा को ग्रहण कर, दूसरे गृहस्थाश्रम से धन का संचय, तीसरे वानप्रस्थ आश्रम से तप का आचरण और चौथे में संन्यास लेकर वेद विधा और धर्म का नित्य प्रकाश करें। मनुष्य की पूर्ण आयु १०० वर्ष की मानी गई थी और २५-२५ वर्ष के चार भागों में विभाजित करके ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम का नाम दिया गया था। ब्रह्मचर्य आश्रम की अवस्था में २५ वर्षों का काल विद्याध्ययन, शिक्षा ग्रहण एवं सभी कलाओं में पारंगत होने के लिए निश्चित किया गया था। ब्रह्मचर्य की आयु एवं शिक्षा पूर्ण होने पर गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने की अनुमति दी गई थी। अ॒भीमं मं॑हि॒मा दि॒वं विप्रो॑ बभूव स॒प्रथाः॑। उत श्रव॑सा पृथि॒वीथं स॒थं सी॑दस्व म॒हाँ२ अ॑सि॒ रोच॑स्व दे॒ववी॑तमः। वि धूम॒म॑ग्ने अ॒रुषं मि॑येध्य सृज प्रश॑स्त दर्श॒तम्।।२ अर्थात् "यही मनुष्यों की महिमा है। जो ब्रह्मचर्य के साथ विद्या को प्राप्त हो, सर्वत्र फैलाकर, शुभ गुणों का प्रचार करके सृष्टि विद्या की उन्नति करते हैं।" गृहस्थाश्रम में प्रवेश, उसके विचारानुरूप कन्या या वर के साथ विवाह के पश्चात् किया जाता था और इस आश्रम के नियमों के अनुसार ही आचरण अपेक्षित था। पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति के पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश किया जाता था। सम्पूर्ण ध्यान जप-तप में लगाया जाता था, इस आश्रम में घर में ही रहने की अनुमति प्राप्त थी। वानप्रस्थ की आयु ७५ वर्ष पूर्ण होने पर संन्यास आश्रम में प्रविष्ट कर, गृह त्याग कर, वनों में निवास कर, समग्र ध्यान पूजा-पाठ में लगाकर, मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य बना दिया जाता था। ग) पुरुषार्थ चतुष्टय :- वैदिककालीन समाजदर्शन का एक अभिन्न अंग पुरुषार्थ चतुष्टय भी था। जीवन के चार लक्ष्यों को भी निश्चित कर दिया गया था। इनका


१. यजुर्वेद १२/१८ २. यजुर्वेद ३८/१७

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चतुर्थ अध्याय 213 समन्वय आश्रम व्यवस्था के साथ पूरी तरह से था। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- ये चार पुरुषार्थ थे जो जीवन की कार्यशैली को अपने अनुरूप ढालने का आदेश देते हैं। धर्म तो व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का ही आधार था, बिना धर्माचरण के तो मुख से वचन निकालने का भी आदेश न था। सम्पूर्ण जीवन में सारे पुरुषार्थों की पूर्ति धर्मानुसार आचरण करते हुए थी। अर्थ पुरुषार्थ की पूर्ति भी धर्म के साथ ही होनी चाहिये। अधर्म से कमाया हुआ अर्थ अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता, अतः इसकी अनुमति प्रदान नहीं की गई। अर्थ प्राप्ति का उद्देश्य अपने निहित दायित्वों की पूर्ति के लिये तथा धार्मिक-कृत्यों की पूर्ति हेतु है। काम पुरुषार्थ का संबंध गृहस्थाश्रम में प्रवेश के साथ जुड़ा हुआ है। इसकी पूर्ति मात्र वासनाओं की तृप्ति के लिए नहीं अपितु ऋणों से मुक्ति, धार्मिक कृत्यों की पूर्ति हेतु करने का आदेश दिया गया है। मोक्ष को जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना गया है और इसकी प्राप्ति के लिए सभी एषणाओं का त्याग वांछित है। नारी की स्थिति :- वैदिक काल में नारी की स्थिति पुरुष की तुलना में कहीं भी कम न थी। उसकी जीवन-शैली भी पुरुषों की भाँति ही चला करती थी। उसे भी २५ वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का पालन करके सभी शिक्षाओं को अर्जित करने का पूरा अधिकार था तथा पति के चुनाव की भी पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी— सिनी॑वालि॒ पृथु॑ष्टुके॒ या दे॒वाना॒मसि॒ स्वसा॑। जु॒षस्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि दिदिड्ढिनः॥१ अर्थात् हे कुमारियों, तुम ब्रह्मचर्य आश्रम के साथ समस्त विद्याओं को प्राप्त कर, युवती होकर अपने को स्वयं परीक्षा करके, वरणयोग्य अभीष्ट पतियों को आप वरो। उन पतियों के साथ आनन्द कर प्रजा-पुत्रादि को उत्पन्न किया करो। पर॑स्या॒ अधि॑ सं॒वतोऽव॑राँ॒ अभ्या॑त॑र। यत्रा॒हमस्मि॒ ताँर॒ अंव॑॥२ अर्थात् कन्या को चाहिए कि अपने से अधिक बल और विद्या वाले एवं बराबर के पुरुष को पति स्वीकार करे, किन्तु छोटे एवं न्यून विद्या वाले को नहीं। जिसके साथ विवाह करे, उसके सम्बन्धी और मित्रों को सब काल में प्रसन्न रक्खें। इन मंत्रों से नारी के जीवन के पक्ष उजागर होते हैं। नारी की स्वतंत्रता एवं उसकी इच्छाओं का सम्मान इस बात का प्रतीक है कि वह राष्ट्र एकता के सूत्र में बद्ध १. यजुर्वेद ३४/१० २. यजुर्वेद ११/७१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 214 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता होगा तथा वहाँ का जीवन नैतिक एवं आध्यात्मिक नियमों के आधार पर चल रहा होगा। विवाह :- उस समय विवाह आयु के बन्धन में नहीं बँधा था और न ही स्त्री और पुरुष के लिए यह अनिवार्य बन्धन था। वे चुनाव के लिए स्वतंत्र थे और इसके द्वारा वे गृहस्थाश्रम एवं कामपुरुषार्थ की पूर्ति करने का कृत्य ही करते थे। इड॒ एह्य दि॑त॒ एहि॒ सर॑स्व॒त्येहि॑। अ॒सावे॒ह्यासावे॒ह्यासा॑वेहि॑।१ अर्थात् जब स्त्री अथवा पुरुष विवाह की इच्छा करें तब ब्रह्मचर्य और शिक्षा से स्त्री और पुरुष के धर्म और आचरण को जानकर ही करें। जब गुणों एवं शिक्षा में समता होती है, तभी इनमें आपस में एक दूसरे के प्रति सम्मान तथा आदर के भाव की भी उपस्थिति होती है जो कि परिवार के सुख, समृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है। विवाह के लिए जाति एवं कुल का बन्धन नहीं था। गुणों, शिक्षा की तुलना एवं अपनी प्रीति से भी विवाह का उल्लेख प्राप्त होता है। विशाल राष्ट्र में विभिन्न कुल तथा जातियाँ होती हैं और मानव-मानव के मध्य कोई अन्तर न करते हुए आपस में विवाह इस बात का प्रतीक है कि वे उच्च विचारों के थे। प्रेम-विवाह, अंतर्जातीय विवाह जैसे वर्तमान प्रश्नों को कोई स्थान प्राप्त नहीं था। इस बारे में एक स्थान पर इस प्रकार का उल्लेख हुआ है- इन्द्रं॒ दुर॑: क॒वष्यो॒ धाव॑माना॒ वृषा॑णं यन्तु॒ जन॑यः सु॒पत्नी॑ः। द्वारो॑ दे॒वीर॒भितो॒ वि श्र॑यन्ताथं सुवीरा॑ वी॒रं प्रथ॑माना म॒होभि॑ः॥२ अर्थात् जिस कुल एवं देश में परस्पर प्रीति से स्वयंवर विवाह करते हैं 'वहाँ मनुष्य सदा आनन्द में रहते हैं।' इस मंत्र से प्रेम विवाह की ओर संकेत प्राप्त होता है। वे आपस में गुणों की परीक्षा करके ही एक दूसरे को जीवनसाथी बनाने का निर्णय लें। वैदिककालीन समाजदर्शन इस ओर इंगित करता है कि उसे रूढ़िवादी कानूनों और नियमों की श्रृंखलाओं से जकड़ा नहीं गया था। सम्पूर्ण राष्ट्र एक है, यह भाव था। देश और जाति के बन्धन से रहित समाज, एक सुखद एवं उन्नतिकारक समाज से ही एकता एवं अखण्डता का सन्देश प्राप्त होता है। १. यजुर्वेद ३८/२ २. यजुर्वेद २०/४० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar