वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 226, कुल 353 में से
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198 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यथा॑ नो॒ अदि॑तिः॒ करत्पश्वे॒ नृभ्यो॒ यथा॒ गवे॑। यथा॑ तो॒काय॑ रु॒द्रिय॑म्॥१ अर्थात् जैसे माता-पिता अपने पुत्र के लिए, ग्वाले अपने पशुओं के लिए और राजसभा प्रजा के लिए सुखकारी होते हैं, उनके हितार्थ ही सोचते हैं और प्रयत्न करते हैं, वैसे ही मानव सुख के लिए करने और कराने वाले परमेश्वर और पवन भी हैं। विद्या और पुरुषार्थ के बिना सुख सम्भव ही नहीं है। ऋग्वेद में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रजा को राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रक्षा के लिए सूर्य के समान तेजस्वी, प्रजापालन हेतु तत्पर, शत्रु विनाशक एवं परम ऐश्वर्ययुक्त व्यक्ति को ही सभाध्यक्ष बनाना चाहिये। जो प्रजा की रक्षा न कर सके, उसे कदापि राष्ट्राध्यक्ष नहीं बनना चाहिये। स हि द्रो दुरि॑षु व॒त्र ऊ॒र्ध्वनि॑ च॒न्द्रबु॑ध्नो॒ मद॑वृद्धो मनी॒षिभि॑ः। इन्द्रं॒ तम॑ह्वे स्व॒पस्यया॑ धि॒या मंहि॑ष्ठरातिं॒ स हि पप्रि॒रन्ध॑सः॥२ अर्थात् 'मनुष्यों को चाहिये कि जो मेघ के तुल्य प्रजापालक और सूर्यवत् सुखों की वर्षा करता है उस परमेश्वर्य युक्त पुरुष को ही राष्ट्राध्यक्ष का अधिकार प्रदान किया जाये तभी राष्ट्र व राष्ट्रवासियों का हित संभव है।' राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऊपर दिये गये विवरण के अनुसार ऋग्वेद में पूर्ण रूप से इसका वर्णन विद्यमान है। अन्त में ऋग्वेद का निम्न मंत्र इस बात का द्योतक है कि वर्तमान लोकतंत्र का पूर्ण भाव उस समय के शासन में भी विद्यमान था। उप॑ ते॒ स्तोमा॑न्पशु॒पा इ॒वाक॑रं॒ रास्वा॑ पितर्मरुतां सु॒म्नम॒स्मे। भ॒द्रा हि ते॑ सु॒मति॑र्मृ॒ळयत्त॑माथ॒ा वय॒मव॒ इत्ते॑ वृणीमहे॥३ अर्थात् प्रजापुरुष राजपुरुषों से राजनीति और राजपुरुष प्रजापुरुषों से प्रजा व्यवहार को जानने योग्य को जानकर सनातन धर्म का पालन करें। ४. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद के धर्म दर्शन का अनुशीलन : धर्म का स्थान राजनीति से सदैव ही जुड़ा रहता है। आचार संहिता का निर्माण १. ऋग्वेद १/५३/२ २. ऋग्वेद १/५२/३ ३. ऋग्वेद १/११४/९
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar