वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 225, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri तृतीय अध्याय 197 ऋग्वेद में निम्नलिखित मंत्र में 'स्वराज' पद का प्रयोग हुआ है— तं घे॒मित्था नम॑स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते। होत्रा॑भिर॒ग्निं मनु॑षः॒ समि॑न्धते तिति॒र्वांसो॒ अति॒ स्रिधः॑॥१ इस मंत्र में प्रयुक्त 'स्वराज' पद विशिष्ट अर्थ का द्योतक है। देश में स्वराज अर्थात् अपना राजा होना चाहिये। इसका अभिप्राय है कि राष्ट्र का शासक किसी दूसरे राष्ट्र का नहीं होना चाहिये। अपने देश का गुणी, उत्साही एवं कर्मठ व्यक्तित्व को राजा के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहिये जो कि राज्य की सम्यक् व्यवस्था करें। दूसरे राष्ट्र के व्यक्ति के राजा बन जाने से वह हृदय से कभी भी राष्ट्र का हित नहीं कर सकता है। अतः अपने राष्ट्र में (स्वराज्य में) सम्यक् विकास होना अनिवार्य है। अपनी मातृभूमि से जुड़े राजा को जो सम्मान प्रजा द्वारा होता है, वह बाह्य राष्ट्र के निवासी राजा को प्राप्त नहीं हो सकता है। श्रेष्ठ गुणों से युक्त तेजस्वी एवं प्रतापी राजा, सभासद एवं राजसेवक ही राष्ट्र का कल्याण कर सकते हैं।' म॒न्द्रो होता॑ गृह॒पति॑र॒ग्ने दू॒तो वि॒शाम॑सि। त्वे विश्वा॒ संग॑तानि व्र॒ता ध्रु॒वा यानि॑ दे॒वा अकृ॑ण्वत॥२ अर्थात् जो प्रशस्त राजा, दूत और सभासद् होते हैं, वे ही राज्य का पालन कर सकते हैं। उनसे विपरीत मनुष्य नहीं कर सकते हैं। इसके पश्चात् राष्ट्राध्यक्ष के प्रमुख कर्तव्यों को भी इंगित किया गया है। राष्ट्राध्यक्ष एवं राजपुरुषों को चाहिए के वे राष्ट्र में इस प्रकार की व्यवस्था करें जिससे वहाँ के विद्वान् और वैज्ञानिक आध्यात्मिक और आधिभौतिक विषयों पर सम्यक् अनुसंधान कर राष्ट्र के हित साधन में लग सकें। राष्ट्र में विद्वानों का उचित सम्मान हो तथा सदैव राष्ट्रीय संसाधन विकसित किये जा सकें। इसके निमित्त समय-समय पर राष्ट्राध्यक्ष राष्ट्र की रक्षा एवं दण्ड नीति के निर्धारण के लिए विद्वानों के साथ मंत्रणा करें और निष्कर्ष के रूप में राष्ट्रीय नीति का निर्धारण करें। ऋग्वेद में प्रजाजनों के लिए निर्देश है कि वे राष्ट्राध्यक्ष की आज्ञा का पालन करें क्योंकि राष्ट्राध्यक्ष की आज्ञा के पालन के बिना राष्ट्र में सम्पूर्ण उत्कर्ष संभव नहीं। राज्यसभा का गठन इस प्रकार का होना चाहिये कि वह सदैव ही प्रजा के हित में कार्य कर सके। १. ऋग्वेद १/३६/७ २. ऋग्वेद १/३६/५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar