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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 353 में से

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पृष्ठ 224

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196 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मेघ की घटाओं की सघनता और अपने प्रकाश को ढँकने वाले बादलों का निवारण कर, अपनी किरणों को फैलाकर, मेघों को छिन्न-भिन्न और अन्धकार को दूर कर अपनी दीप्ति को प्रसिद्ध करता है। ऊ॒र्ध्वो न॑ः पा॒ह्यंह॑सो॒ नि के॒तुना॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह। कृ॒धी न॑ ऊ॒र्ध्वाञ्च॒रथाय जी॒वसे॑ वि॒दा दे॒वेषु॑ नो॒ दुव॑ः॥१ अर्थात् अच्छे गुण, कर्म और स्वभाव वाले सभाध्यक्ष राजा का यह कर्तव्य है कि राज्य की रक्षा, नीति और दण्ड के भय से सब मनुष्यों को पाप से हटा सब शत्रुओं को मारकर और विद्वानों की सब प्रकार सेवा करके, प्रजा में ज्ञान, सुख और जीवन बढ़ाने के लिए सब प्राणियों को शुभगुणयुक्त सदा किया करें। सिर्फ राजा का ही राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का दायित्व नहीं है अपितु प्रजाजनों का भी यह कर्तव्य होता है कि वे राजा के कार्यों में सहयोग करें और राष्ट्र की उन्नति, समृद्धि, सुख, शान्ति के लिए अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें। शत्रुओं के दमन करने का दायित्व सिर्फ शासन का ही नहीं होता है अपितु प्रजा का भी यह दायित्व है कि राष्ट्र में शत्रुओं का एकजुट होकर सामना करें, उनके बुरे विचारों को कभी सफल न होने दें। त्वेष॒सो॑ अ॒ग्नेर्म॑वन्तो अ॒र्चयो॑ भी॒मासो॒ न प्रती॑तये। र॒क्षस्विन॑ः॒ सद्मिद्या॑तु॒माव॑तो॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह॥२ अर्थात् 'सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों और प्रजा के मनुष्यों को चाहिए कि जिस प्रकार अग्नि आदि पदार्थ वनों को भस्म कर देते हैं उसी प्रकार कष्ट देने वाले शत्रुओं का भी विनाश करने के लिये सदैव तत्पर रहना चाहिये। इससे सदैव ही प्रजा की रक्षा होती है।' इस मंत्र के द्वारा यह भी प्रदर्शित किया गया है कि राष्ट्र की रक्षा का दायित्व सिर्फ राजपुरुषों, राजा पर ही नहीं होता है, अपितु स्वयं प्रजा को राष्ट्र रक्षा, शत्रुओं से आत्म रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिये। सभी के हित के लिए सदैव ही सबको प्रयत्नशील होना चाहिये। जिस तरह राष्ट्र का निर्माण सभी प्रजाजनों से होता है उसी प्रकार उसकी रक्षा के लिए भी सभी को प्रयत्नशील होना चाहिये। राष्ट्र की संगठन शक्ति के समक्ष बड़े से बड़ा शत्रु भी अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है। शत्रु रहित राष्ट्र ही अखण्ड बना रह सकता है। १. ऋग्वेद १/३६/१४ २. ऋग्वेद १/३६/२०

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar