वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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206 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता है। वर्षा कृषि का आधार है जिसका अधिष्ठाता देवता इन्द्र है और उनकी स्तुति ऋग्वेद में सर्वाधिक की गई है। ऋग्वेद के अनुसार¹ आश्विन युग्म ने मनु को बीज बोने की कला सिखाई तथा आर्यों को हल की सहायता से कृषि-कर्म सिखलाया। पशुपालन के बारे में ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है। व्यापार के बारे में भी ऋग्वेद में उल्लेख प्राप्त होता है- याभिः॑ सु॒दानू औशि॒जाय॑ व॒णिजे॑ दी॒र्घश्र॑वसे॒ मधु॒ कोशो॒ अक्ष॑रत्। क॒क्षीव॑न्तं स्तो॒तारं॒ याभि॒राव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्विना॒ गत॑म्॥² अर्थात् "राजपुरुषों से योग्य है कि जो द्वीप द्वीपान्तर और देश देशान्तर में व्यापार करने के लिये आवे-जावें, उनकी रक्षा का प्रयत्न करें।" इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मधुर सम्बन्ध बनाने का एक साधन व्यापार भी था और इसके अर्थ आगमन के साथ-साथ सम्बन्धों की मधुरता में भी वृद्धि होती थी। ७. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को ऋग्वेद का प्रदेय : सम्पूर्ण ऋग्वेद में मानव, शिक्षा, राष्ट्र, राष्ट्राध्यक्ष एवं प्रजा सभी को पृथक्-पृथक् मंत्रों के द्वारा निर्देश प्रदान किये गये हैं। आज राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ऐसा विषय बना हुआ है कि यह सबसे विचारणीय-विषय और समस्या दोनों ही कहा जा सकता है। इसका समाधान यदि वैदिक वाङ्मय में खोजा जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इस समस्या से जो आज अनुभव किया जा रहा है, उसमें एकता एवं अखण्डता के बारे में पृष्ठभूमि पहले से ही सुनिश्चित की जा चुकी है। यदि आज भी उस पर दृष्टिपात करें तो वे हमें एकता के सूत्र को और मजबूत करने का अवसर प्रदान करते हैं। आदर्श रूप में मातृभूमि या स्वतंत्र राष्ट्र के विकास के लिए सात गुणों को बतलाकर उस मंत्र में एक अत्युपयोगी शिक्षा का समावेश किया गया है। प्रत्येक समाज, राष्ट्र या देश में कुछ न कुछ ऊँच-नीच के भाव रहते हैं। यह सहज अनुभव से आता है कि प्रत्येक परिवार के कुछ सदस्य आयु, शारीरिक बल, विद्या और बुद्धि में एक दूसरे से न्यूनाधिक हो सकते हैं। पुनः जब राष्ट्र बहुत बड़ा होता है तो इस प्रकार के भेद दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक है। आदर्श रूप में उनके मध्य में इस प्रकार का ऐक्य होना चाहिये जिससे उनमें १. ऋग्वेद १/११२/१६ २. ऋग्वेद १/११२/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar