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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

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तृतीय अध्याय 207 किसी प्रकार का वैर न हो और मातृभूमि की प्रगति में सब समान रूप से भाग ले सकें। इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए बताया गया है- यस्याः मानवानां मध्यतः बहु असम्बाधम्। जिस राष्ट्र या मातृभूमि के विभिन्न सम्प्रदायों में सहज भेद होते हुए निर्वैरभाव एवं सामूहिक उन्नति में परस्पर सौहार्द, सद्भावना एवं सहयोग करने की भावना होती है वही यथार्थ रूप में एकता और अखण्डता को कायम रख सकता है। राष्ट्र की प्रतिष्ठा अविचल रखने के लिए आवश्यक है कि शत्रु का विनाश किया जावे। जिस प्रकार सूर्य को मेघ के हनन में कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है अपितु सहज रूप से ही उसका हनन हो जाता है। राष्ट्रप्रेमियों को इस प्रकार की सुव्यवस्था हो कि शत्रुओं का बिना किसी विशेष चेष्टा के ही नाश हो जावें। कभी-कभी राष्ट्र की महिमा और गरिमा का विस्तार करने के लिये प्रयास करना पड़ता है। निरि॑न्द्र॒ भूम्या॒ अधि॑ वृ॒त्रं ज॑घन्थ॒ निर्दि॒वः। सृ॒जा म॒रुत्व॑तीर॒प॑ जी॒वध॑न्या इ॒मा अ॒पोऽर्च॑न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥१ अर्थात् जो राज्य करने की इच्छा करे वह विद्या, धर्म और विशेष नीति का प्रचार करके स्वयं धर्मात्मा होकर पूरे राष्ट्र के पिता के समान व्यवहार करे। इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॒ दोध॑तः॒ सानुं॒ वज्रे॑ण हीळितः। अ॒भि॒क्रम्याव॑ जिघ्नते॒ऽपः सर्म॑ाय चोदय॒न्नर्च॑न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् 'राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के रक्षक शूरवीर, पराक्रमी अधिकारियों का परम कर्तव्य है कि वे राष्ट्र को शत्रुओं से सर्वथा मुक्त रखें। शत्रुओं के नाश का कार्य सहज गति से होना चाहिये। राष्ट्र के शासन व्यवस्था आदर्श होनी चाहिये ताकि शत्रु यदि उत्पन्न हो तो स्वतः ही नष्ट हो जावें। इसके लिये राज्याधिकारियों को समुचित व्यवस्था करनी चाहियें।' इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्र की सुव्यवस्था का पूर्ण वर्णन करते हुए उसकी एकता और अखण्डता के लिये ऋग्वेद में विभिन्न मंत्रों और सूक्तों में न्याय प्रणाली, चुनाव पद्धति, समस्त शत्रुओं से मातृभूमि की रक्षा एवं सूर्य के आदर्श आदि का अध्ययन किया गया है। इसके लिये यदि ऋग्वेद में वर्णित आदेशों का पालन किया जाय तो हम अपनी वर्तमान समस्या से मुक्त हो सकते हैं। १. ऋग्वेद १/८०/४ २. ऋग्वेद १/८०/५

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar