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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय यजुर्वेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन १. यजुर्वेद में प्रतिबिम्बित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का आधारतत्त्व : राष्ट्र का अस्तित्व पृथ्वी पर सदैव ही विद्यमान रहा है। राष्ट्र के बारे में वैदिककालीन साहित्य में प्रमाण उपलब्ध हैं और मात्र प्रमाण ही नहीं अपितु उसका विस्तृत विवरण भी प्राप्त होता है। ‘‘राष्ट्रे जागृयाम् वयम्’’ अर्थात् हम राष्ट्र में जागें। इसका आशय यही हो सकता है कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता के प्रति सजगता का भाव मानवमात्र में सदैव से ही रहा है। प्रत्येक व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध से परिचित होता था और वेदों में उसको अपने राजा के चयन में गुणों की परीक्षा करने का अधिकार भी प्रदान किया गया है। उस समय मात्र राजा में ही गुणों की अपेक्षा नहीं की गई थी अपितु नागरिकों के भी राष्ट्र के प्रति दायित्व निश्चित किये गये थे। राष्ट्र की रक्षा का दायित्व मात्र राजा का ही नहीं होता है अपितु उसके लिये प्रजाजनों के प्रयास भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं- मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्।१ अर्थात् राष्ट्र या जनसमूह तुमसे गिरे नहीं। इस राष्ट्र के न गिरने का अभिप्राय इसकी एकता और अखण्डता से ही है। जब राष्ट्र का दायित्व राजा को सौंपा जाता है तो यही विचार किया जाता है कि राजा प्रजा को पुत्रवत् मानकर उसका लालन- पालन कर उसे समृद्धशाली एवं दृढ़ बनायेगा। उसमें वैमनस्य या वैचारिक कटुता आने का कोई अवसर प्रदान नहीं करेगा। तभी राष्ट्र एक सूत्र में आबद्ध होकर अपने अस्तित्व की रक्षा करेगा। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता का दृढ़ सूत्र है- राष्ट्र में परस्पर प्रेम एवं सद्भाव। इसके लिये यजुर्वेद के निम्न मन्त्र में इस प्रकार का उल्लेख है- पाहिय॒ज्ञं पाहि॑ य॒ज्ञप॑तिं विष्णु॒स्त्वामि॑न्द्रियेण॑ पातु विष्णुं॒ त्वं पा॑ह्यभि सर्व॑नानि पाहि॥२ १. वा०स० १२/११ २. यजुर्वेद अध्याय ७ मन्त्र २० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar