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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 353 में से

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पृष्ठ 237

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 209 इसका अभिप्राय है “राजा एवं विद्वानों को योग्य है कि वे राज्य की निरन्तर उन्नति के लिये प्रयत्नशील रहें। वे आदेश और विद्या के प्रचार द्वारा ही प्रजा को अभिभूत कर सकते हैं। राजा, प्रजा और उत्तम विद्वानों की परस्पर प्रीति से ही ऐश्वर्य की उन्नति और आनन्द में वृद्धि होना संभव है।" राष्ट्र में जब पर्याप्त उन्नति के साधन विद्यमान होंगे और सभी को उसमें संलग्न रहने का अवसर प्राप्त होगा तो वे स्वयं ही अपने परिवार एवं राष्ट्र के निर्माण के प्रति सजग रहेंगे तथा आपसी मेल-जोल एवं प्रेम ही इस बात का प्रतीक है कि राष्ट्र में एकता की भावना दृढ़ रूप से विद्यमान है। वे आपस में मिल-जुल कर रहेंगे तो राष्ट्र में खुशहाली तथा उन्नति के द्वार सदैव ही खुलें रहेंगे। स॒जूर्ब्दो अ॒र्यवो॑भिः स॒जूरू॒षा अ॑रु॒णीभिः॑। सजो॑ष॒साव॒श्विना॒ दध॑त्सौभिः स॒जूः सूर॒ एत॑शेन स॒जूवैश्वान॒र इड॑या घृ॒तेन॒ स्वाहा॑।।१ अर्थात् मनुष्यों में जितनी परस्पर मित्रता हो उतना ही सुख और जितना विरोध उतना ही दुःख होता है। इसीलिए सभी लोग (स्त्री-पुरुष) परस्पर उपकार ही सदा बरतें। किसी भी राष्ट्र की एकता एवम् अखण्डता के लिए उस राष्ट्र के निवासियों के मध्य परस्पर परोपकार, सहयोग एवं प्रेम की भावना की विद्यमानता अत्यन्त आवश्यक है। इनकी उपस्थिति से ही राष्ट्र की सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। एक सुखी और समृद्ध व्यक्ति राष्ट्र की एकता पर प्रहार करने का प्रयास नहीं कर सकता है। सब आपस में मिलकर उसका सामना करने में पूर्ण सक्षम होते हैं। जहाँ लोगों में एकता की भावना रहती है, वहाँ पर राष्ट्र में भी एकता होती है। गाय॒त्री त्रि॒ष्टुब्जग॑त्यनु॒ष्टुप्प॒ङ्क्त्या स॒ह। बृ॒हत्यु॒ष्णिहा॑ क॒कुप्सू॒चीभि॑: शम्यन्तु त्वा।।२ इस मंत्र के भावानुसार जो विद्वान् गायत्री आदि छन्दों के अर्थ को बताने से मनुष्यों को विद्वान् करते हैं, वे सुई से फटे वस्त्र को सीते हैं, वे अलग-अलग मत वालों को सत्य में मिलाप कर देते हैं और उनको एक मत में स्थापित करते हैं, वे जगत् का कल्याण करने वाले होते हैं।


१. यजुर्वेद अध्याय १२ मन्त्र ७३ २. यजुर्वेद २३/३३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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