वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 210 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता सम्पूर्ण राष्ट्र में विभिन्न बातों का एक मत होना अनिवार्य होता है, मतैक्य से भावात्मक एकता में वृद्धि होती है। इसीलिए बुद्धिजीवियों, शिक्षक वर्ग एवं राजनेताओं का यह प्रयास होना चाहिए कि सम्पूर्ण देश में निजी स्वार्थों को त्याग कर यदि मानव के मन में किसी तरह का भेद हो तो भी उन्हें मिलाने का प्रयत्न करना चाहिये। उन्हें इस तरह की शिक्षा दी जानी चाहिये कि अनेकता में एकता का भाव उत्पन्न कर सकें। य॒ज्ञो दे॒वानां॒ प्रत्ये॑ति सु॒म्नमादि॑त्यासो॒ भव॑ता मृ॒डय॑न्तः। आ वो॒ऽर्वाची॑ सुमतिर्व॑वृ॒त्यादधं॒होग्ने॑श्चि॒द्या व॑रिवो॒वित्त॑रा॒स॑त्॥१ अर्थात् जिस देश में पूर्ण विद्या वाले राजकर्मचारी हों वहाँ सब की एकमति होकर अत्यन्त सुख बढ़ें। एक समृद्धशाली देश के लिये सभी को सुशिक्षित होना चाहिए। इस आवश्यकता को वैदिक काल में ही अनुभव कर लिया गया था। शिक्षित नागरिक देश के लिए गौरवशाली प्राणी हो सकते हैं। देश की शासन प्रणाली को सुचारु रूप से चलाने के लिए भी शिक्षा अनिवार्य है। जिस राष्ट्र में शिक्षित एवं प्रबुद्ध नागरिक होंगे, वहाँ पर सभी व्यक्ति एक मत होंगे और राष्ट्र सुख समृद्धि की ओर अग्रसर होगा। देश की एकता एवं अखण्डता के लिए उनमें मतैक्य एवम् आपसी समझदारी बहुत ही आवश्यक होती है। दे॒वासो॒ हि ष्मा॒ मन॑वे॒ सम॑न्यवो॒ विश्वे॑ सा॒कथं सरा॑तयः।२ देश की एकता एवं अखण्डता पर आघात करने वाले दुर्बुद्धिजनों की भी कमी नहीं रहती हैं। अतः सद्विचारों से पूर्ण व्यक्तियों को सदैव अपने परिवेश में सुख शान्ति की स्थापना का प्रयास करना चाहिये तथा ऐसे व्यक्तियों, जो इसमें विघ्न डालें, का अन्त करके ही शान्ति स्थापना का प्रयास करना चाहिये। मानव की मानसिक प्रवृत्तियों की शुद्धता पर हमेशा ही ध्यान दिया जाता है क्योंकि वह ही राष्ट्र की आधारशिला है और सद्विचारों, सद्प्रवृत्तियों की उपस्थिति से ही राष्ट्र की समृद्धि का निर्धारण होता है। २. राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के समाजदर्शन का अनुशीलन राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में समाजदर्शन की भी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। वैदिक वाङ्ग्मय में तत्कालीन भारतीयसमाज का जो चित्र १. यजुर्वेद ३३/६८ २. यजुर्वेद ३३/९४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar