वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 239, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 211 परिलक्षित होता है, उसके विश्लेषण से ज्ञात होता है कि वह अत्यन्त सुख- सौमनस्यपूर्ण, एकता और समरसतामूलक तथा स्वस्थ विकास की आधारशिला पर बनाया हुआ वह भवन था जिस पर एक अडिग विशाल गृहयोजना स्थापित थी। समाज का वर्गीकरण जाति या धर्म के आधार पर न होकर व्यवसाय पर आधारित था। पारिवारिक पृष्ठभूमि संयुक्त होते हुए भी सबके विकास की भावना से अनुस्यूत थे। व्यक्ति और समाज के सम्बन्धों में किसी प्रकार की खींचतान की प्रवृत्ति न होकर पारस्परिक दायित्व की ग्रहणशीलता और सहयोग की दृष्टि समाहित थी। स्त्रियों का स्थान अत्यन्त सम्मानपूर्ण था। बालकों एवं किशोरों के प्रति वात्सल्य एवं सद्भाव विद्यमान था। समाज के सभी वर्गों में परस्पर प्रेम की भावना थी। क) वर्ण व्यवस्था :- वैदिककालीन वर्ण व्यवस्था श्रम विभाजन के आधार पर आधारित थी। कोई भी कार्य निकृष्ट नहीं समझा जाता था और कोई भी जाति हीनता की दृष्टि से नहीं देखी जाती थी। यह व्यवस्था जन्मना न होकर कर्मणा थी। इसमें सभी वर्णों में एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना विद्यमान थी। वेदों के अध्ययन, अध्यापन, यजन-याजन ब्राह्मणों के प्रमुख कार्य थे लेकिन कृषि कार्य से भी वे विरत न थे। विद्याध्ययन का अधिकार सभी वर्णों को प्राप्त था। यजुर्वेद में इस आशय को इस मंत्र द्वारा स्पष्ट किया गया है- य॒थेमां वाचं॑ कल्या॒णी मा॒वदा॑नि॒ जने॑भ्यः। ब्र॒ह्म॒रा॒ज॒न्या॑भ्याꣳ शूद्राय॒ चार्या॑य च॒ स्वाय॒ चार॑णाय च। प्रि॒यो दे॒वानां॒ दक्षि॑णायै दा॒तुरि॒ह भू॑यासम॒यं मे॒ कामः॒ समृ॑ध्यता॒मुप॑ मा॒दो न॑मतु॥१ समाज के सभी वर्णों को वेदाध्ययन का अधिकार प्राप्त था। क्षत्रिय वर्ण का कार्य सुशासन स्थापना का तो था ही, साथ ही वे अन्य कार्य भी करते थे। यही स्थिति वैश्यों की भी थी। पशुपालन, कृषि और वाणिज्य इस वर्ण के प्रमुख कार्य थे, परन्तु अन्य कार्यों को भी करना उन्हें सौंपा गया था। शूद्रों का कार्य समाज की सेवा-शुश्रूषा करना कहा गया है, परन्तु उनके प्रति समाज के दृष्टिकोण में किसी तरह की उपेक्षा, घृणा या तिरस्कार की भावना परिलक्षित नहीं होती थी। सभी वर्णों में समानता की भावना ही राष्ट्र की एकता को सम्बल प्रदान करने वाला रहा है। ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिक काल में आश्रम व्यवस्था का प्राविधान था जिसमें मनुष्य की आयु को चार वर्गों में विभाजित करके उसके आचरण एवं दायित्वों १. यजुर्वेद २६/२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar