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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 353 में से

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पृष्ठ 240

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212 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को निश्चित कर दिया गया था। उन्हीं के अनुरूप व्यक्ति को अपना जीवन व्यतीत करना होता था। दिवस्परिं प्रथमं ज॑ज्ञे अ॒ग्निर॒स्मद् द्वि॒तीयं॒ परि॑ जा॒तवे॑दाः। तृ॒तीय॑म॒प्सु नृ॒मणा॒ अज॑स्र॒मिन्धा॑न एनं जरते स्वा॒धीः।।१ इस मंत्र का भाव इस बात की पुष्टि करता है कि मनुष्यों को चाहिये की वे प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम के सहित विद्या तथा शिक्षा को ग्रहण कर, दूसरे गृहस्थाश्रम से धन का संचय, तीसरे वानप्रस्थ आश्रम से तप का आचरण और चौथे में संन्यास लेकर वेद विधा और धर्म का नित्य प्रकाश करें। मनुष्य की पूर्ण आयु १०० वर्ष की मानी गई थी और २५-२५ वर्ष के चार भागों में विभाजित करके ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम का नाम दिया गया था। ब्रह्मचर्य आश्रम की अवस्था में २५ वर्षों का काल विद्याध्ययन, शिक्षा ग्रहण एवं सभी कलाओं में पारंगत होने के लिए निश्चित किया गया था। ब्रह्मचर्य की आयु एवं शिक्षा पूर्ण होने पर गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने की अनुमति दी गई थी। अ॒भीमं मं॑हि॒मा दि॒वं विप्रो॑ बभूव स॒प्रथाः॑। उत श्रव॑सा पृथि॒वीथं स॒थं सी॑दस्व म॒हाँ२ अ॑सि॒ रोच॑स्व दे॒ववी॑तमः। वि धूम॒म॑ग्ने अ॒रुषं मि॑येध्य सृज प्रश॑स्त दर्श॒तम्।।२ अर्थात् "यही मनुष्यों की महिमा है। जो ब्रह्मचर्य के साथ विद्या को प्राप्त हो, सर्वत्र फैलाकर, शुभ गुणों का प्रचार करके सृष्टि विद्या की उन्नति करते हैं।" गृहस्थाश्रम में प्रवेश, उसके विचारानुरूप कन्या या वर के साथ विवाह के पश्चात् किया जाता था और इस आश्रम के नियमों के अनुसार ही आचरण अपेक्षित था। पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति के पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश किया जाता था। सम्पूर्ण ध्यान जप-तप में लगाया जाता था, इस आश्रम में घर में ही रहने की अनुमति प्राप्त थी। वानप्रस्थ की आयु ७५ वर्ष पूर्ण होने पर संन्यास आश्रम में प्रविष्ट कर, गृह त्याग कर, वनों में निवास कर, समग्र ध्यान पूजा-पाठ में लगाकर, मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य बना दिया जाता था। ग) पुरुषार्थ चतुष्टय :- वैदिककालीन समाजदर्शन का एक अभिन्न अंग पुरुषार्थ चतुष्टय भी था। जीवन के चार लक्ष्यों को भी निश्चित कर दिया गया था। इनका


१. यजुर्वेद १२/१८ २. यजुर्वेद ३८/१७

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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