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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 353 में से

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पृष्ठ 241

चतुर्थ अध्याय 213 समन्वय आश्रम व्यवस्था के साथ पूरी तरह से था। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- ये चार पुरुषार्थ थे जो जीवन की कार्यशैली को अपने अनुरूप ढालने का आदेश देते हैं। धर्म तो व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का ही आधार था, बिना धर्माचरण के तो मुख से वचन निकालने का भी आदेश न था। सम्पूर्ण जीवन में सारे पुरुषार्थों की पूर्ति धर्मानुसार आचरण करते हुए थी। अर्थ पुरुषार्थ की पूर्ति भी धर्म के साथ ही होनी चाहिये। अधर्म से कमाया हुआ अर्थ अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता, अतः इसकी अनुमति प्रदान नहीं की गई। अर्थ प्राप्ति का उद्देश्य अपने निहित दायित्वों की पूर्ति के लिये तथा धार्मिक-कृत्यों की पूर्ति हेतु है। काम पुरुषार्थ का संबंध गृहस्थाश्रम में प्रवेश के साथ जुड़ा हुआ है। इसकी पूर्ति मात्र वासनाओं की तृप्ति के लिए नहीं अपितु ऋणों से मुक्ति, धार्मिक कृत्यों की पूर्ति हेतु करने का आदेश दिया गया है। मोक्ष को जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना गया है और इसकी प्राप्ति के लिए सभी एषणाओं का त्याग वांछित है। नारी की स्थिति :- वैदिक काल में नारी की स्थिति पुरुष की तुलना में कहीं भी कम न थी। उसकी जीवन-शैली भी पुरुषों की भाँति ही चला करती थी। उसे भी २५ वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का पालन करके सभी शिक्षाओं को अर्जित करने का पूरा अधिकार था तथा पति के चुनाव की भी पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी— सिनी॑वालि॒ पृथु॑ष्टुके॒ या दे॒वाना॒मसि॒ स्वसा॑। जु॒षस्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि दिदिड्ढिनः॥१ अर्थात् हे कुमारियों, तुम ब्रह्मचर्य आश्रम के साथ समस्त विद्याओं को प्राप्त कर, युवती होकर अपने को स्वयं परीक्षा करके, वरणयोग्य अभीष्ट पतियों को आप वरो। उन पतियों के साथ आनन्द कर प्रजा-पुत्रादि को उत्पन्न किया करो। पर॑स्या॒ अधि॑ सं॒वतोऽव॑राँ॒ अभ्या॑त॑र। यत्रा॒हमस्मि॒ ताँर॒ अंव॑॥२ अर्थात् कन्या को चाहिए कि अपने से अधिक बल और विद्या वाले एवं बराबर के पुरुष को पति स्वीकार करे, किन्तु छोटे एवं न्यून विद्या वाले को नहीं। जिसके साथ विवाह करे, उसके सम्बन्धी और मित्रों को सब काल में प्रसन्न रक्खें। इन मंत्रों से नारी के जीवन के पक्ष उजागर होते हैं। नारी की स्वतंत्रता एवं उसकी इच्छाओं का सम्मान इस बात का प्रतीक है कि वह राष्ट्र एकता के सूत्र में बद्ध १. यजुर्वेद ३४/१० २. यजुर्वेद ११/७१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar