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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 242

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 214 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता होगा तथा वहाँ का जीवन नैतिक एवं आध्यात्मिक नियमों के आधार पर चल रहा होगा। विवाह :- उस समय विवाह आयु के बन्धन में नहीं बँधा था और न ही स्त्री और पुरुष के लिए यह अनिवार्य बन्धन था। वे चुनाव के लिए स्वतंत्र थे और इसके द्वारा वे गृहस्थाश्रम एवं कामपुरुषार्थ की पूर्ति करने का कृत्य ही करते थे। इड॒ एह्य दि॑त॒ एहि॒ सर॑स्व॒त्येहि॑। अ॒सावे॒ह्यासावे॒ह्यासा॑वेहि॑।१ अर्थात् जब स्त्री अथवा पुरुष विवाह की इच्छा करें तब ब्रह्मचर्य और शिक्षा से स्त्री और पुरुष के धर्म और आचरण को जानकर ही करें। जब गुणों एवं शिक्षा में समता होती है, तभी इनमें आपस में एक दूसरे के प्रति सम्मान तथा आदर के भाव की भी उपस्थिति होती है जो कि परिवार के सुख, समृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है। विवाह के लिए जाति एवं कुल का बन्धन नहीं था। गुणों, शिक्षा की तुलना एवं अपनी प्रीति से भी विवाह का उल्लेख प्राप्त होता है। विशाल राष्ट्र में विभिन्न कुल तथा जातियाँ होती हैं और मानव-मानव के मध्य कोई अन्तर न करते हुए आपस में विवाह इस बात का प्रतीक है कि वे उच्च विचारों के थे। प्रेम-विवाह, अंतर्जातीय विवाह जैसे वर्तमान प्रश्नों को कोई स्थान प्राप्त नहीं था। इस बारे में एक स्थान पर इस प्रकार का उल्लेख हुआ है- इन्द्रं॒ दुर॑: क॒वष्यो॒ धाव॑माना॒ वृषा॑णं यन्तु॒ जन॑यः सु॒पत्नी॑ः। द्वारो॑ दे॒वीर॒भितो॒ वि श्र॑यन्ताथं सुवीरा॑ वी॒रं प्रथ॑माना म॒होभि॑ः॥२ अर्थात् जिस कुल एवं देश में परस्पर प्रीति से स्वयंवर विवाह करते हैं 'वहाँ मनुष्य सदा आनन्द में रहते हैं।' इस मंत्र से प्रेम विवाह की ओर संकेत प्राप्त होता है। वे आपस में गुणों की परीक्षा करके ही एक दूसरे को जीवनसाथी बनाने का निर्णय लें। वैदिककालीन समाजदर्शन इस ओर इंगित करता है कि उसे रूढ़िवादी कानूनों और नियमों की श्रृंखलाओं से जकड़ा नहीं गया था। सम्पूर्ण राष्ट्र एक है, यह भाव था। देश और जाति के बन्धन से रहित समाज, एक सुखद एवं उन्नतिकारक समाज से ही एकता एवं अखण्डता का सन्देश प्राप्त होता है। १. यजुर्वेद ३८/२ २. यजुर्वेद २०/४० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar