वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 353 में से
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चतुर्थ अध्याय 215 ३. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद में राजदर्शन का अनुशीलन- राजनीति मानवसमाज की अपरिहार्यता है। वैदिक युग में एक सुव्यवस्थित कल्याणकेन्द्रित और सर्वाभिमुखी राजनैतिक व्यवस्था दिखलाई देती है। इस राजनीतिक व्यवस्था के लिए प्रयुक्त राजदर्शन आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत समाज एवं जनकल्याण के लिए सम्मानदायक एवं अधिकारयुक्त था। राज्य एवं राष्ट्र की अवधारणा उस काल में एक समान ही मान ली गई थी और उत्तम राष्ट्र के लिए देश में क्या हो, इसका विचार यजुर्वेद में किया गया है- य॒ज्ञो दे॒वानां॒ प्रत्ये॑ति सु॒म्नमादि॑त्यासो॒ भव॑ता मृड॒यन्तः॑। आ वो॒ऽर्वाची॑ सुमतिर्व॑वृत्त्याद॒धंहो॑श्चि॒द्या व॑रिवो॒वित्त॒रास॑त्॥१ अर्थात् जिस देश में पूर्ण विद्या वाले राजकर्मचारी हों वहाँ सबकी एक मति (वैचारिक एकता) होकर अत्यन्त सुख बढ़े। यजुर्वेद में राष्ट्र की सुख और समृद्धि के लिए पूर्ण शिक्षा का प्रावधान माना गया था क्योंकि शिक्षित जनसंख्या ही राष्ट्र के प्रति एवं अपने हितों के प्रति सजग रहती है और इसी में व्यष्टि तथा समष्टि की उन्नति निहित रहती है। राज्य की वृद्धि एवं समृद्धि के लिए भी उल्लेख किया गया है- विष्णोः॒ कर्मा॑णि पश्यत॒ यतो॑ व्र॒तानि॑ पस्पृ॒शे। इन्द्र॑स्य॒ युज्यः॒ सखा॑॥२ अर्थात् परमेश्वर से प्रीति और सत्याचरण के बिना कोई भी मनुष्य ईश्वर के गुण, कर्म और स्वभाव को देखने के योग्य नहीं हो सकता, न वैसे हुए बिना राज्यकर्मों को यथार्थ न्याय से सेवन कर सकता है, न सत्य एवं धर्माचार से रहित जन राज्य बढ़ाने में कभी समर्थ हो सकता है। एक उत्तम राष्ट्र क्या हो सकता है, उस बारे में यजुर्वेद में स्पष्ट रूप से वर्णित है। एक आदर्श राज्य की कुछ अपेक्षाएँ होती हैं जिनके पूर्ण होने पर ही उसे उत्तम राज्य स्वीकार किया जा सकता है। मो षू ण॑ इन्द्रात्र॑ पृ॒त्सु दे॒वैरस्ति॒ हि ष्मा॑ ते शुष्मिन्नव॒याः। म॒हश्चि॒द्यस्य॑ मी॒ढुषो॑ य॒व्या ह॒विष्म॑तो म॒रुतो॒ वन्द॑ते गीः॥३ १. यजुर्वेद ३३/६८ २. यजुर्वेद ६/४ ३. यजुर्वेद ३/४६
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar