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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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216 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् जब मनुष्य लोग परमेश्वर की आराधना कर, अच्छी प्रकार से सब सामग्री को संग्रह करके, युद्ध में शत्रुओं को जीतकर, चक्रवर्ती राज्य को प्राप्त कर, प्रजा का अच्छी तरह से पालन करके, बड़े आनन्द का सेवन करते हैं, तब उत्तम राज्य होता है। एक योग्य राजा के चयन का कार्य भी प्रजाजनों को करने का स्पष्ट निर्देश यजुर्वेद में प्राप्त है और इसका यह स्वरूप वर्तमान लोकतंत्र की ओर संकेत करता है जहाँ पर शासक का चुनाव जनसाधारण द्वारा होता है। योग्य शासक ही एक राष्ट्र का अच्छी तरह पालन-पोषण और रक्षा करने में सक्षम होता है। वि॒श्वे॑षा॒मदि॑तिर्य॒ज्ञिया॑नां॒ वि॒श्वे॑षामति॑थि॒र्मानु॑षाणाम्। अ॒ग्निर्दे॒वाना॒मव॑ आवृणा॒नः सु॑मृ॒डीको भ॑वतु जा॒तवे॑दाः॥१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि जो सब विद्वानों में गम्भीर बुद्धि वाला, सब मनुष्यों में माननीय प्रजा की रक्षा आदि राजकार्य को स्वीकार करता हो, सब सुखों का दाता और वेदादि शास्त्रों को जानने वाला शूरवीर हो, उसी को राजा बनायें। योग्य राजा के चयन से ही उत्तम राज्य का निर्माण हो जाता है। इसके अतिरिक्त राजा राज्य के सम्पूर्ण कार्यों को अपने अकेले बल पर सम्पन्न नहीं कर सकता है। उसके लिए उसको योग्य मंत्रियों एवं सलाहकारों का चयन करना चाहिये ताकि वे उसके कार्यों में न्यायपूर्ण सलाह दे सकें और न्याय का परिपालन हो सके। श्रुधि॑ श्रु॒त्कर्ण॒ वह्नि॑भिर्दे॒वैर॑ग्ने स॒याव॑भिः। आ सी॑दन्तु ब॒र्हिषि॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा प्रा॒तर्यावा॑णो अध्व॒रम्॥२ अर्थात् सभापति राजा को चाहिये कि अच्छे परीक्षित मंत्रियों को स्वीकार कर, उनके साथ सभा मैं बैठकर, विवाद करने वालों के वचन सुनकर, उस पर विचार कर यथार्थ न्याय करें। राजा को स्वयं भी कुछ विशिष्ट गुणों से युक्त होना चाहिये ताकि वह इतने बड़े राष्ट्र की व्यवस्था और जीवन का कुशलतापूर्वक भार उठा सके। दे॒वं स॑वि॒तः प्र सु॑व य॒ज्ञं प्र सु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य। दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केतं॑ नः पुनातु॒ वाच॒स्पति॒र्वाचं॑ नः स्वदतु॥३ १. यजुर्वेद ३३/१६ २. यजुर्वेद ३३/१५ ३. यजुर्वेद ३०/१

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar