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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 353 में से

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पृष्ठ 245

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चतुर्थ अध्याय 217 अर्थात् जो विद्या की शिक्षा को बढ़ाने वाला, शुद्ध, गुण-कर्म स्वभावयुक्त, राज्य की रक्षा तथा ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला, धर्मात्माओं का रक्षक, परमेश्वर का उपासक और समस्त शुभ गुणों से युक्त हो, वही राजा होने के योग्य होता है। इ॒मां ते॑ धियं॒ प्र भरे॑ म॒हो म॒हीम॒स्य स्तो॒त्रे धि॒षणा॑ यत्त॒ आन॑जे। तमु॑त्स॒वे च॑ प्रस॒वे च॑ सासह॒मिन्द्रं॑ दे॒वासः॑ शव॑सामद॒न्ननु॑ ॥१ अर्थात् जो राजा विद्वानों से उत्तम बुद्धि व वाणी को ग्रहण करते हैं वे सत्य के अनुकूल होते हुए आप आनन्दित होकर औरों को प्रसन्न करते हैं। यजुर्वेद में राजधर्म के बारे में कुछ बातों को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है। राजधर्म भी काल एवं देश के अनुसार ही परिवर्तित होता रहता है। उन्हीं के अनुरूप ही राजधर्म निश्चित होता है। काल के साथ सभी में परिवर्तन होता है। अषा॑ढं यु॒त्सु पृत॑नासु प॒प्रिंथिं स्व॒र्षाम॒प्सां वृ॒जन॑स्य गो॒पाम्। भरे॒षुजाथं सु॑क्षि॒तिं सु॒श्रव॑सं॒ जय॑न्तं॒ त्वामनु॑ मदेम सोम॥२ अर्थात् "जिस राजा एवं सेनापति के उत्तम स्वभाव से राजपुरुष सेवाजन और प्रजापुरुष प्रसन्न रहें और जिनकी प्रसन्नता में राजा प्रसन्न हो, वहाँ दृढ़ विजय, उत्तम, निश्चल, ऐश्वर्य और अच्छी प्रतिष्ठा होती है।" इस प्रकार राजा के अपने राज्य के प्रति धर्म को स्पष्ट किया गया है। चूँकि राजकर्म केवल एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है इसलिए अन्य विद्वद्जनों का सहयोग भी इस कार्य में अपेक्षित है। तभी राजकार्य पूर्ण क्षमता से सम्पन्न होना संभव हो सकता है। इन्द्रा॒ग्नीऽआ गतं॒थं सु॒तं गी॒र्भिर्नभो वरे॑ण्यम्। अस्य पा॑तं धि॒येषि॒ता। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ त्वै॒ष ते॒ योनि॑रिन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ त्वा॥३ अर्थात् अकेला पुरुष यथोक्त राजशासन कर्म नहीं कर सकता है। इस कारण और श्रेष्ठ पुरुषों का सत्कार करके राजकार्यों में युक्त करें, वे भी यथायोग्य व्यवहार से इस राजा का सत्कार करें। राजधर्म में सभी दायित्व मात्र राजपुरुषों के लिए ही निर्मित नहीं है, अपितु इसमें १. यजुर्वेद ३३/२९ २. यजुर्वेद ३४/२० ३. यजुर्वेद ७/३१

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar