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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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216 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् जब मनुष्य लोग परमेश्वर की आराधना कर, अच्छी प्रकार से सब सामग्री को संग्रह करके, युद्ध में शत्रुओं को जीतकर, चक्रवर्ती राज्य को प्राप्त कर, प्रजा का अच्छी तरह से पालन करके, बड़े आनन्द का सेवन करते हैं, तब उत्तम राज्य होता है। एक योग्य राजा के चयन का कार्य भी प्रजाजनों को करने का स्पष्ट निर्देश यजुर्वेद में प्राप्त है और इसका यह स्वरूप वर्तमान लोकतंत्र की ओर संकेत करता है जहाँ पर शासक का चुनाव जनसाधारण द्वारा होता है। योग्य शासक ही एक राष्ट्र का अच्छी तरह पालन-पोषण और रक्षा करने में सक्षम होता है। वि॒श्वे॑षा॒मदि॑तिर्य॒ज्ञिया॑नां॒ वि॒श्वे॑षामति॑थि॒र्मानु॑षाणाम्। अ॒ग्निर्दे॒वाना॒मव॑ आवृणा॒नः सु॑मृ॒डीको भ॑वतु जा॒तवे॑दाः॥१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि जो सब विद्वानों में गम्भीर बुद्धि वाला, सब मनुष्यों में माननीय प्रजा की रक्षा आदि राजकार्य को स्वीकार करता हो, सब सुखों का दाता और वेदादि शास्त्रों को जानने वाला शूरवीर हो, उसी को राजा बनायें। योग्य राजा के चयन से ही उत्तम राज्य का निर्माण हो जाता है। इसके अतिरिक्त राजा राज्य के सम्पूर्ण कार्यों को अपने अकेले बल पर सम्पन्न नहीं कर सकता है। उसके लिए उसको योग्य मंत्रियों एवं सलाहकारों का चयन करना चाहिये ताकि वे उसके कार्यों में न्यायपूर्ण सलाह दे सकें और न्याय का परिपालन हो सके। श्रुधि॑ श्रु॒त्कर्ण॒ वह्नि॑भिर्दे॒वैर॑ग्ने स॒याव॑भिः। आ सी॑दन्तु ब॒र्हिषि॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा प्रा॒तर्यावा॑णो अध्व॒रम्॥२ अर्थात् सभापति राजा को चाहिये कि अच्छे परीक्षित मंत्रियों को स्वीकार कर, उनके साथ सभा मैं बैठकर, विवाद करने वालों के वचन सुनकर, उस पर विचार कर यथार्थ न्याय करें। राजा को स्वयं भी कुछ विशिष्ट गुणों से युक्त होना चाहिये ताकि वह इतने बड़े राष्ट्र की व्यवस्था और जीवन का कुशलतापूर्वक भार उठा सके। दे॒वं स॑वि॒तः प्र सु॑व य॒ज्ञं प्र सु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य। दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केतं॑ नः पुनातु॒ वाच॒स्पति॒र्वाचं॑ नः स्वदतु॥३ १. यजुर्वेद ३३/१६ २. यजुर्वेद ३३/१५ ३. यजुर्वेद ३०/१

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चतुर्थ अध्याय 217 अर्थात् जो विद्या की शिक्षा को बढ़ाने वाला, शुद्ध, गुण-कर्म स्वभावयुक्त, राज्य की रक्षा तथा ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला, धर्मात्माओं का रक्षक, परमेश्वर का उपासक और समस्त शुभ गुणों से युक्त हो, वही राजा होने के योग्य होता है। इ॒मां ते॑ धियं॒ प्र भरे॑ म॒हो म॒हीम॒स्य स्तो॒त्रे धि॒षणा॑ यत्त॒ आन॑जे। तमु॑त्स॒वे च॑ प्रस॒वे च॑ सासह॒मिन्द्रं॑ दे॒वासः॑ शव॑सामद॒न्ननु॑ ॥१ अर्थात् जो राजा विद्वानों से उत्तम बुद्धि व वाणी को ग्रहण करते हैं वे सत्य के अनुकूल होते हुए आप आनन्दित होकर औरों को प्रसन्न करते हैं। यजुर्वेद में राजधर्म के बारे में कुछ बातों को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है। राजधर्म भी काल एवं देश के अनुसार ही परिवर्तित होता रहता है। उन्हीं के अनुरूप ही राजधर्म निश्चित होता है। काल के साथ सभी में परिवर्तन होता है। अषा॑ढं यु॒त्सु पृत॑नासु प॒प्रिंथिं स्व॒र्षाम॒प्सां वृ॒जन॑स्य गो॒पाम्। भरे॒षुजाथं सु॑क्षि॒तिं सु॒श्रव॑सं॒ जय॑न्तं॒ त्वामनु॑ मदेम सोम॥२ अर्थात् "जिस राजा एवं सेनापति के उत्तम स्वभाव से राजपुरुष सेवाजन और प्रजापुरुष प्रसन्न रहें और जिनकी प्रसन्नता में राजा प्रसन्न हो, वहाँ दृढ़ विजय, उत्तम, निश्चल, ऐश्वर्य और अच्छी प्रतिष्ठा होती है।" इस प्रकार राजा के अपने राज्य के प्रति धर्म को स्पष्ट किया गया है। चूँकि राजकर्म केवल एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है इसलिए अन्य विद्वद्जनों का सहयोग भी इस कार्य में अपेक्षित है। तभी राजकार्य पूर्ण क्षमता से सम्पन्न होना संभव हो सकता है। इन्द्रा॒ग्नीऽआ गतं॒थं सु॒तं गी॒र्भिर्नभो वरे॑ण्यम्। अस्य पा॑तं धि॒येषि॒ता। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ त्वै॒ष ते॒ योनि॑रिन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ त्वा॥३ अर्थात् अकेला पुरुष यथोक्त राजशासन कर्म नहीं कर सकता है। इस कारण और श्रेष्ठ पुरुषों का सत्कार करके राजकार्यों में युक्त करें, वे भी यथायोग्य व्यवहार से इस राजा का सत्कार करें। राजधर्म में सभी दायित्व मात्र राजपुरुषों के लिए ही निर्मित नहीं है, अपितु इसमें १. यजुर्वेद ३३/२९ २. यजुर्वेद ३४/२० ३. यजुर्वेद ७/३१

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218 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राज्य में निवास करने वाले सभी प्राणी-प्रजाजनों में समाहित किये जाते हैं। सभी के लिए यह नियम लागू होता है कि वे राज्य के उत्थान में अपना सहयोग प्रदान करें। भूर्भुव॒: स्व॒: सु॒प्रजा॒: प्र॒जाभि॑: स्या॒ं सु॒वीरो॑ वी॒रै: सु॒पोष॒: पोषै॑:। नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पाहि॒ शंस्य॑ प॒शून्मे॑ पा॒ह्यथ॑र्य्य पि॒तुं मे॑ पाहि॥१ अर्थात् "मनुष्यों को ईश्वर की उपासना व उसकी आज्ञा के पालन का आश्रय लेकर, उत्तम नियमों से व उत्तम प्रजा, शूरता, पुष्टि आदि कारणों से प्रजा-पालन करके निरन्तर सुखों को सिद्ध करना चाहिये।" राज्य के न्याय-कार्य में स्त्री की सहभागिता को पूर्ण रूप से स्वीकार किया गया है। स्त्री और पुरुष होने का भेद वैदिक काल में कहीं भी प्राप्त नहीं हुआ है। राजा राजकर्म में अपनी रानी से पूर्ण सहयोग प्राप्त कर सकता है। स्त्री व पुरुष दोनों में ही समान शिक्षा और विद्वता प्राप्त होती थी। राज्य सभा में होने वाले न्याय में भी यजुर्वेद के अनुसार स्त्री की सहभागिता होना अनिवार्य माना गया है। ध्रु॒वाऽसि॑ धरु॒णाऽऽस्तृता वि॒श्वक॑र्मणा। मा त्वा॑ समु॒द्र उद्व॑धीन्मा सु॑प॒र्णोऽव्यथ॑माना पृथि॒वीं दृं॑ह ॥२ अर्थात् “जैसी राजनीति-विद्या को राजा ने पढ़ा हो, वैसी ही उसकी रानी भी पढ़ी होनी चाहिये। सदैव दोनों परस्पर पतिव्रता-स्त्रीव्रत होकर न्याय से पालन करें। व्यभिचार और काम की व्यथा से रहित होकर धर्मानुकूल पुत्रों को उत्पन्न करके स्त्रियों को स्त्री-रानी और पुरुषों को पुरुष-राजा न्याय करें।" प्र॒जाप॑तिष्ट्वा सादयत्व॒पां पृष्ठे समु॒द्रस्येम॑न्। व्यच॑स्वतीं प्रथ॑स्वतीं॒ प्रथ॑स्व पृथि॒व्यसि॑॥३ अर्थात् राजपुरुष को चाहिए कि वे जिस-जिस राजकार्य में प्रवृत्त हों, उस-उस कार्य में अपनी-अपनी स्त्रियों को भी स्थापित करें, जो राजपुरुष जिन पुरुषों का न्याय करें उसकी स्त्री का न्याय रानी किया करें। यजुर्वेद के सम्पूर्ण राजधर्म एवं दर्शन पर दृष्टिपात करें तो यह ज्ञात होता है कि राज्य या राष्ट्र के आदर्श होने की संकल्पना तो आरम्भ से ही प्रस्तुत हो गई थी। कहीं १. यजुर्वेद ३/३७ २. यजुर्वेद १३/१६ ३. यजुर्वेद १३/१७

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 219 भी राज्य में विघटनकारी तत्त्वों की उपस्थिति की संभावना होने पर उनका दमन करने का प्राविधान रखा गया है। आदर्श राष्ट्र की भाँति स्त्री व पुरुष दोनों की ही शासन कार्य में सहभागिता स्वीकार की गई है। राज्य की अखण्डता के उद्देश्य से शत्रुओं के दमन के बारे में पूर्ण विवरण प्राप्त होता है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद से पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। ४. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन : वैदिक काल में प्रयोग किये गये सभी कार्यों का सम्बन्ध एक दूसरे के साथ रहा है। उसी प्रकार धर्म को जीवन के हर पक्ष के साथ संयुक्त करके प्रस्तुत किया गया है। धर्म ही जीवन के प्रत्येक पक्ष का संचालन करता था। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के दिए धर्म से जुड़ा हुआ आधार भी स्वीकार किया जा सकता है। धर्माचरण और सत्याचरण ही जीवन को संचालित करता रहा है। अग्ने॑ व्रतपते॒ व्र॒तम॑चारिषं॒ तच्छ॑कं॒ तन्मे॑ऽराधी॒ दम॒हं य ए॒वास्मि॒ सोऽस्मि॑॥१ अर्थात् "मनुष्य को यही निश्चय करना चाहिए कि मैं जैसा कर्म करता हूँ वैसा ही परमेश्वर की व्यवस्था से फल भोगता हूँ और भोगूँगा। सब प्राणी अपने कर्म से विरुद्ध फल को कभी प्राप्त नहीं करते। इसलिए सुख भोगने के लिए धर्मयुक्त कर्म ही करना चाहिये जिससे कभी दुःख न हो।" मानव जीवन का सीधा सम्बन्ध समाज एवं देश के साथ जुड़ा होता है। इसके लिए हर क्रियाकलाप ऐसा संतुलित होना चाहिये जिससे कि स्वयं से किसी अन्य व्यक्ति को भी कष्ट न हो। आ न॑ एतु॒ मनः॒ पुन॒: क्रत्वे॒ दक्षाय जीवसें॑। ज्योक् च॒ सूर्य॑ दृ॒शे॥२ अर्थात् "मनुष्य उत्तम कर्मों के अनुष्ठान के लिए चित्त की शुद्धि एवं जन्म-जन्म में उत्तम चित्त की प्राप्ति की ही इच्छा करें जिससे मनुष्यजन्म को प्राप्त होकर ईश्वर की उपासना का साधन करके उत्तम-उत्तम धर्मों का सेवन कर सकें।" विचार एवं कर्म की शुद्धता ही व्यक्ति के आचरण को शुद्ध रखती है। जीवन के व्यवहार एवं कर्तव्यों की पूर्ति के लिए भी उसे धर्मानुसार चलना होता है। वैदिक काल में धर्म पुरुषार्थ ऐसा है जो कि जीवन के सम्पूर्ण दर्शन को प्रभावित करता रहता १. यजुर्वेद २/२८ २. यजुर्वेद ३/५४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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220 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता था और इससे विलग कोई क्रिया सम्पादित हो ही नहीं सकती थी। अर्थ की प्राप्ति भी धर्मानुसार आचरण के पश्चात् ही हो सकती थी। वेदों का हर मंत्र ही धर्म की व्याख्या करता है और जीवन-दर्शन को धर्ममय करके प्रस्तुत करता है। अक्र॒न् कर्म॑ कर्म॒कृत॑: सह वा॒चा म॑योभुवा॑। दे॒वेभ्यः॒ कर्म॑ कृ॒त्वास्तं॒ प्रेत॑ सचाभुवः॥१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि सर्वथा आलस्य को छोड़कर पुरुषार्थ में ही निरन्तर रह कर, अज्ञान को छोड़कर, वेद विद्या से शुद्ध की हुई वाणी के साथ सदा वर्तन करें और परस्पर प्रीति करके एक दूसरे का सहारा बनें। जो इस प्रकार के मनुष्य हैं, वे ही इस लोक के सुखों को प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं। अन्य अर्थात् आलसी पुरुष आनन्द को कभी नहीं प्राप्त होते हैं। वैदिककालीन धर्म-दर्शन मानवहित, देशहित के लिए ही निर्मित था और यही कारण है कि आज भी जनसाधारण धर्म की भावना से विमुक्त नहीं हो होता है। जन्म से मृत्यु तक के सारे कार्य धर्मानुसार ही पूर्ण होते हैं। ५. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिपेक्ष्य में यजुर्वेद में आचार- दर्शन, शिक्षा-दर्शन एवं अर्थ-दर्शन का अनुशीलन : यजुर्वेद में वर्णित मंत्रों के द्वारा आध्यात्मिक, भौतिक, नैतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों का प्रतिपादन किया गया है। इन्हीं के आधार पर जीवन मूल्यों का निर्धारण हुआ है। यजुर्वेद में यदि आचार-दर्शन पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि इन्हीं रास्तों पर चलकर मानव को जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। मा न॒: शथं सो अ॒र॑रुषो धू॒र्त्तिः प्रण॑ङ् मर्त्यस्य। रक्षा॑ णो ब्रह्मणस्पते।।२ अर्थात् "मनुष्यों को सदा उत्तम काम करना चाहिए और बुरे-बुरे काम छोड़ देने चाहिए तथा किसी के साथ द्रोह व दुष्टों का संग भी न करना और धर्म की रक्षा व परमेश्वर की उपासना स्तुति और प्रार्थना निरन्तर करनी चाहिए।" जीवन में मनुष्यों को उत्तम कर्म करने का निर्देश दिया गया है। किन्तु जिससे अपना हित होता हो और किसी अन्य का अहित, उस कार्य को करना भी न्याय एवं धर्मसंगत नहीं माना जाता है। उसी तरह बुरे और दुष्ट मनोभाव वाले जीवों की संगति भी उचित नहीं मानी गई है। सदैव ही मनुष्य का यह प्रयास होना चाहिये कि १. यजुर्वेद ३/४७ २. यजुर्वेद ३/३०

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चतुर्थ अध्याय २२१ वह ईश्वर की भक्ति एवं उपासना में लीन रहकर अपने दायित्वों की पूर्ति करता रहे। मनुष्यों को उचित है कि जिस वेद के जानने तथा पालन करने वाले परमेश्वर ने वेदविद्या, पृथिवी, जल, वायु और सूर्य आदि शुद्धि करने वाले पदार्थ प्रकाशित किये हैं, उसकी उपासना तथा पवित्र कर्मों के अनुष्ठान मनुष्यों को पूर्ण कामना और पवित्रता के साथ सम्पादित अवश्य करने चाहियें। परमपिता परमेश्वर, जिसने पञ्च-तत्त्वों से निर्मित मनुष्य के लिए सभी पदार्थ इस धरा पर उपलब्ध कराकर जीवन प्रदान किया है, उसके प्रति कृतज्ञ होते हुए और उसकी कृपा अपने ऊपर चाहने की कामना लेकर उसकी उपासना नित्य करनी चाहिये। उन्हें अपने जीवन में अपनाते हुए सत्य के मार्ग का सदैव ही अनुकरण करना चाहिये। विद्या ग्रहण कर उसके प्रचार हेतु प्रयत्नशील रहना भी एक मंगल कार्य है। परन्तु शिक्षादान के काल में स्वयं भी अध्ययन से विरत नहीं होना चाहिये क्योंकि ज्ञान अनन्त है और उसको ग्रहण करने के लिये एक जीवन बहुत छोटा है। भ॒वतं॑ नः॒ सम॑नसौ॒ सचे॑तसावरे॒पसौ॑। मा य॒ज्ञꣳ हिं॑सिष्टं॒ मा य॒ज्ञप॑तिं जातवेदसौ शि॒वौ भ॑वतम॒द्य नः॑॥१॥१ अर्थात् मनुष्य को उचित है कि विद्याप्रचार के लिए पढ़ना, पढ़ाना तथा मंगलाचरण को न छोड़े क्योंकि यही सर्वोत्तम कर्म है। वि॒भूर॑सि प्र॒वाह॑णो॒ वह्नि॑रसि हव्य॒वाह॑नः। श्वा॒त्रोऽसि॒ प्रचे॑तास्तु॒थोऽसि॑ वि॒श्ववे॑दाः॥२ अर्थात् सब मनुष्यों को उचित है कि ईश्वर और विद्वान् का सत्कार कर्म कभी न छोड़ें क्योंकि अन्य किसी से विद्या और सुख का लाभ नहीं हो सकता है। इसलिए इनको जानें। अत्यन्याँ२ अगां॒ नान्याँ२ उपा॑गामर्वा॒क् त्वा॒ परे॑भ्योऽविन्दं परो॒ऽवरै॑भ्यः। तं त्वा॑ जुषामहे देव वनस्पते देव॒यज्या॑यै दे॒वास्त्वा॑ देव॒यज्या॑यै जुषन्तां॒ विष्ण॑वे त्वा। ओष॑धे॒ त्राय॑स्व॒ स्वधि॑ते॒ मैनं॑ꣳ हिंसीः॒ ॥३ १. यजुर्वेद ५/३ २. यजुर्वेद ५/३१ ३. यजुर्वेद ५/४२

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 222 वैदिक वाङ्गय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् "मनुष्यों को चाहिए कि नीच व्यवहार और नीच पुरुषों को छोड़ के अच्छे-अच्छे व्यवहार तथा उत्तम विद्वानों को नित्य चाहें और उत्तमों से उत्तम तथा न्यूनों से न्यून शिक्षा ग्रहण करें। यज्ञ के पदार्थों का तिरस्कार कभी न करें तथा सबको चाहिये कि एक-दूसरे के मेल से सुखी हों।" समाज एवं परिवार में मेलजोल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस मेलजोल की भावना से आपसी वैमनस्य की उत्पत्ति नहीं होती है। सम्पूर्ण समाज एक परिवार के भाँति बना रहता है। "वसुधैव कुटुम्बकम्" की अवधारणा इसी का प्रतीक है और कुटुम्ब की तरह समझने वाले विद्वान्व्यक्ति सर्वहित की कामना करते हैं। इससे पारस्परिक सम्बन्धों में दृढ़ता उत्पन्न होती है। इ॒ष्कर्त्तार॑मध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसं क्षय॑न्त॒र्थं राध॑सो म॒हः। रा॒तिं वा॒मस्य॑ सु॒भगां॑ म॒हीमिषं॒ दधा॑सि सान॒सिं र॒यिम्॥१ अर्थात् जो मनुष्य जैसे अपने लिए सुख की इच्छा करे वैसे ही दूसरों के लिए करे, वही आससत्कार के योग्य होता है। वह व्यवहार जो दूसरों के द्वारा अपने साथ होने पर मनुष्य को उचित न लगे, उसे स्वयं वैसा व्यवहार कदापि नहीं करना चाहिये। सबको यथोचित सम्मान एवं श्रद्धा देने से व्यक्ति के आत्मिक सन्तोष में वृद्धि होती है। यजुर्वेद का आचारदर्शन एक दिशा प्रदान करता है क्योंकि इसमें मनुष्य को किसी से वैर रखने या हिंसा भाव रखने की अनुमति दी ही नहीं गई है। सबके प्रति समान भाव का दृष्टिकोण हो, ऐसा व्यवहार उसे मानवता की ओर ले जाता है। इस तरह का आचार-व्यवहार राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाय तो यही स्पष्ट होता है कि यहाँ देश को जोड़ने और जोड़े ही रखने का सन्देश प्राप्त होता है। शिक्षा दर्शन :- मानव के जीवन में शिक्षा का क्रम जन्म से लेकर मृत्यु तक निरन्तर चलता रहा है। कभी यह प्रत्यक्ष शिक्षा के रूप में और कभी अप्रत्यक्ष शिक्षा के रूप में चलता रहता है। बालक ग्रहण करने के लिए होता है और शिक्षक उसको प्रदान करने के लिए। शिक्षक का दायित्व भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। आध॑त्त पि॒तरो॒ गर्भं॑ कुमा॒रं पुष्क॑रस्स्रजम्। यथे॒ह पुरु॑षोऽस॑त्॥२ १. यजुर्वेद १२/११० २. यजुर्वेद २/३३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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चतुर्थ अध्याय 223 अर्थात् ईश्वर आज्ञा देता है कि विद्वान् पुरुष एवं स्त्रियों को चाहिए कि विद्यार्थी कुमार या कुमारी को विद्या देने के लिए गर्भ के समान धारण करें। जैसे क्रमशः गर्भ के बीच देह बढ़ता है वैसे अध्यापक लोगों को चाहिये कि अच्छी शिक्षा से ब्रह्मचारी, कुमार या कुमारी को श्रेष्ठ विद्या में वृद्धियुक्त करें तथा (उनका) पालन करें। वे विद्या के योग से धर्मात्मा और पुरुषार्थयुक्त होकर सदा सुखी हों, यह अनुष्ठान सदैव करना चाहिये। रेव॑ती रम॑ध्वं॒ बृह॑स्पते धा॒रया॒ वसू॑नि। ऋ॒तस्य॑ त्वा देवहविः पाशेन॒ प्रति॑ मुञ्चामि॒ धर्षा॒ मानु॑षः॥१ अर्थात् विद्वानों को अपनी शिक्षा से कुमार ब्रह्मचारी और कुमारी ब्रह्मचारिणियों को परमेश्वर से लेकर पृथ्वीपर्यन्त पदार्थों का बोध कराना चाहिए, जिससे वे अज्ञानरूपी बन्धन को छोड़कर सदा सुखी रहें। यजुर्वेद में शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है क्योंकि जीवन में ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, परमेश्वर से लेकर पृथ्वी तक के किसी भी वस्तु के गूढ़ज्ञान हेतु प्रयत्न करना और जिज्ञासा की प्रवृत्ति उनमें उत्पन्न होना ही ग्रहण करने की क्षमता का द्योतक है। शिक्षा ग्रहण काल में ब्रह्मचर्य का पालन अत्यन्त अनिवार्य है। इस आयु में ही उन्हें सत्याचरण, धर्माचरण, संयम एवं त्याग से परिचित करा दिया जाता है और यही आधारशिला उनके भविष्य के लिए होती है। वे अच्छे व्यक्ति, नागरिक, माता-पिता, पुत्र-पुत्री के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं। वाचं॑ ते शुन्धामि प्रा॒णं तें शुन्धामि॒ चक्षु॑स्ते शुन्धामि॒ श्रोत्रं॑ ते शुन्धामि॒ नाभिं॑ ते शुन्धामि॒ मेढ्रं॑ ते शुन्धामि पा॒युं तें शुन्धामि च॒रित्रौ॑स्ते शुन्धामि॥२ अर्थात् गुरु और गुरु पत्नियों को चाहिए कि वेद और उपवेद तथा वेद के अंग और उपांगों की शिक्षा में देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण और मन की शुद्धि, शरीर की पुष्टि तथा प्राण की संतुष्टि देकर समस्त कुमार और कुमारियों को अच्छे-अच्छे गुणों में प्रवृत्त करावें। वेद-वेदांगों में शिक्षा का पूर्ण प्राविधान था। दर्शन, मनोविज्ञान, विज्ञान, योग, संगीत, कला आदि सभी की शिक्षा ग्रहण करने के बारे में उल्लेख प्राप्त होते हैं। १. यजुर्वेद ६/८ २. यजुर्वेद ६/१४

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 224 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता शिक्षा के प्रति अध्यापक और अध्येता दोनों के ही दायित्वों का पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया है। पुरुष एवं स्त्री दोनों के लिए ही समस्त शिक्षा की व्यवस्था की गई थी। लिंग के भेद को कहीं भी महत्त्व प्रदान नहीं किया गया था और न ही स्त्री को अबला के रूप में वर्णित किया गया है। ब्रह्मा॑णि मे मतयः॒ शथं॑ सु॒तासः॒ शुष्म॑ इयर्ति प्रभुतो मे॒ अद्रि॑ः। आ शा॑स॒ते प्रति॑ हर्यन्त्यु॒क्थेमा हरी॑ वहत॒स्ता नो॒ अच्छ॑।।१ अर्थात् हे विद्वानों ! जिस कर्म से विद्या और मेघ की उन्नति हो, वैसी क्रिया करों। जो लोग तुम से विद्या और सुशिक्षा चाहते हैं उनको प्रेमपूर्वक दों, और जो आपसे अधिक विद्या वाले हों उनसे तुम विद्या ग्रहण करों। यजुर्वेद में शिक्षकों और उपदेशकों के लिए नियम निश्चित किये गए थे, जिनका अनुकरण ही उनको समाज व विद्यार्थियों के मध्य पूजनीय बनाता था। गुरु प्रथम पूज्य होता था। मनुष्य को ज्ञानी बनाने का कार्य गुरु के द्वारा ही सम्पन्न किया जाता था। दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आ द॑दे॒ नारि॑रसि।।२ अर्थात् हे मनुष्यों, तुम लोग उत्तम विद्वानों को प्राप्त होकर उनसे विद्या-शिक्षा ग्रहण कर इस सृष्टि में नायक बनो॑! विश्वा॒ आशा॑ दक्षिणस॒द्भिर्ऋ॒ दे॒वान्या॑ऽडिह। स्वाहा॑वृतस्य घ॒र्मस्य॒ मधो॑ः पिबतमश्विना।।३ अर्थात् उपदेशक शिक्षा दें और अध्यापक पढ़ावें, वैसे ही सब लोग ग्रहण करें। वैदिक काल की शिक्षा ने संतुलित एवं सुशिक्षित व्यक्ति के निर्माण का सदैव उपदेश दिया है। सभी तरह से शिक्षित एवं उन्नत विचारों वाले व्यक्ति देश की उन्नति व प्रगति के लिए सहयोग प्रदान करते हैं। जहाँ सभी लोगों को उच्चकोटि के विद्वानों द्वारा शिक्षा प्राप्त होती है, वे संकीर्णता और दुष्ट प्रवृत्तियों से अलग रहते हैं। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में यदि यजुर्वेद के शिक्षा दर्शन को देखा जाय तो १. यजुर्वेद ३३/७८ २. यजुर्वेद ३७/१ ३. यजुर्वेद ३८/१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ अध्याय 225 स्पष्ट होता है कि नागरिकों की पृष्ठभूमि ऐसी बनाई जाती है कि वे देशहित और मानवहित को कभी उपेक्षित ही नहीं कर सकते हैं। अर्थ-दर्शन :- वैदिक युग में आर्थिक अवस्था अत्यन्त सुविकसित होती है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु गति देने के लिए उस देश की कृषि और खनिज सम्पदा का विशेष महत्त्व होता है। आर्थिक दृष्टि से पृथिवी के प्रति पूर्ण जागरुकता विद्यमान थी। तत्कालीन आर्यगण इस तथ्य से अवगत थे कि पृथिवी वसुधा ही नहीं विश्वम्भरा (सबका भरण-पोषण करने वाली) भी है। वह हिरण्यवक्षा (अपने गर्भ में स्वर्णादि की खानों को छिपाये हुए) है। उस पृथिवी से मातृवत् पालन करने की प्रार्थना की गई है— 'सा नो भूमिर्विंसृजतां माता पुत्राय मे पयः। इस पृथिवी पर उत्पन्न प्राणियों के भरण-पोषण का दायित्व मातृभूमि पर ही होता है।' सी॒रा यु॒ञ्जन्ति क॒वयॊ यु॒गा वि॑तन्वते॒ पृथ॑क्। धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒या।।१ अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि विद्वानों की शिक्षा से कृषि कर्म की उन्नति करें। जैसे योगी नाड़ियों में परमेश्वर को समाधियोग से प्राप्त होते हैं, वैसे ही कृषि कर्म द्वारा सुखों को प्राप्त होवें। लाङ्ग॑लं पवी॑रवत्स॒शेव॑नं सोम॒पित्स॑रु। तदुद्व॑पति॒ गामविं॑ प्र॒फर्व्यं॑ च॒ पीवरीं॑ प्र॒स्थाव॑द्रथ॒वाह॑नम्।।२ अर्थात् "किसान लोगों को उचित है कि मोटी मिट्टी, अन्न आदि की उत्पत्ति से रक्षा करने वाली पृथिवी की अच्छी तरह से परीक्षा करके, हल आदि साधनों से समतल कर, सुन्दर संस्कारित बीजों से उत्तम धान्य उत्पन्न करके भोगें।" यजुर्वेद में पशुपालन को वैयक्तिक आधार पर ही नहीं अपितु व्यावसायिक आधार पर भी उचित माना गया था इसीलिये इसका उल्लेख प्राप्त होता है। अर्मेभ्यो हस्ति॒पं ज॒वाया॑श्व॒पं पुष्ट्यै॑ गो॒पालं वीर्या॑याविपा॒लं तेज॑सेऽजपा॒लमिरा॑यै की॒नाश॑ं। की॒लाला॑य सुरा॒कारं॑ भ॒द्राय॑ गृ॒हप॑थं॒ श्रेय॑से वित्त॒धमाध्य॑क्ष्यायानुक्ष॒त्तार॑म्।।३ अर्थात् राजपुरुषों को चाहिए कि अच्छे शिक्षित हाथी आदि को रखने वाले पुरुषों को ग्रहण कर इनसे बहुत से व्यवहार सिद्ध करें। १. यजुर्वेद १२/६७ २. यजुर्वेद १२/७१ ३. यजुर्वेद ३०/११ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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226 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता इसी प्रकार इस काल में अनेक प्रकार के उद्योग-धन्धें एवं शिल्प प्रचलित थे। इनमें बाय (कपड़ा बुनने वाले), त्वष्टा या तक्षा (बढ़ई—चाक, नौका, लकड़ी के पात्र आदि बनाने वाले), कर्मकार (लुहार—कृषि यंत्र, युद्धों के निमित्त आयुध निर्माता), कुम्हार, माली, चमार, डोम, नाई, वैद्य, स्वर्णकार आदि मुख्य हैं। विशाल भवनों का निर्माता राजगीरों का भी उल्लेख है। यजुर्वेद के विभिन्न मंत्रों (३०/६,७,१७,२०) में रथकार, तक्षा, मौलाल, कर्मार, मणिकार, इषुकार, धनुष्कार, रज्जु सर्ग, हस्तिप, अश्वप, सुराकार, हिरण्यकार, वणिक प्रभृति शिल्पियों का उल्लेख है। वैदिक काल में द्विविध व्यापार प्रणाली का उल्लेख मिलता है- आन्तरिक एवं बाह्य। आन्तरिक व्यापार भारत में ही विभिन्न प्रदेशों एवं नगरों में विद्यमान था। विदेशों के साथ नौकाओं एवं जलयानों के माध्यम से बाह्य व्यापार भी उस युग में विकसित स्थिति में था। एक स्थान से दूसरे स्थान पर उत्पादित माल को लाने ले जाने के लिये व्यापारी वर्ग बैलों, घोड़ों, ऊँटों, कुत्तों तथा गधों का उपयोग करते थे। अनेक व्यापारी समुद्र मार्ग से भी व्यापार करते थे। निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि वैदिक काल में यजुर्वेद के अनुसार अत्यन्त समृद्ध एवं सम्पन्न अर्थव्यवस्था विद्यमान थी। आर्थिक आधार पर समाज में श्रेणियाँ नहीं थी। समतामूलक, श्रम की प्रतिष्ठाकारक और सांस्कृतिक-जीवन के लिए उपादेय, वह अर्थव्यवस्था हमें आज भी स्पृहणीय प्रतीत होती है, जिसमें धनोपार्जन की केवल शुद्ध, विधिसम्मत और समाज के द्वारा अनुमोदित प्रणाली प्रशस्त समझी जाती थी। स्वार्जित धन का उपयोग भी व्यक्ति को त्यागपूर्वक करना चाहिये। किसी अन्य के धन की कामना न करें। इस तरह का भाव मुखरित रहा है। यथा— “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः, या गृधः कस्यस्विद्धनम्।” यजुर्वेद का अर्थदर्शन भी समृद्धि की ओर इंगित करता है। अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदारी और दूसरों की समृद्धि में सहयोग की कामना रखने वाले व्यक्ति थे। इस तरह के भाव से देश की उन्नति, एकता में सहयोगी तत्त्व बनकर उससे दृढ़ता सिद्ध होती है। ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को यजुर्वेद का प्रदेय : देश या राष्ट्र की सुख-समृद्धि एवं प्रसन्नता ही सभी युगों में प्राप्त साहित्य, काव्य, महाकाव्यों एवं आध्यात्मिक ग्रन्थों में वर्णित रही है। राष्ट्र की एकता और अखण्डता के सन्दर्भ में निम्न मंत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है—

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चतुर्थ अध्याय 227 आ त्वाहार्षमन्तरम् ध्रुवस्तिष्ठा विचाचलिः। विश सूत्वा सर्वा वाञ्छन्तु या त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्॥ १ अर्थात् 'हे अग्ने! मैं तुमको लाया हूँ, तुम भीतर हो (नाभि के ऊपर शरीर के मध्य में)। तुम चलनरहित हो स्थिर बैठो। सारी प्रजा तुम्हें चाहे। राष्ट्र अर्थात् जन समूह तुमसे गिरे नहीं।' इससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि राष्ट्र में जनसमूह के विश्वास का कितना बड़ा स्थान है। राष्ट्र में श्रद्धा, उसकी एकता एवं अखण्डता के प्रति उद्घोष ही उसके अस्तित्व को चिरस्थायी रखने के लिए पर्याप्त है। यजुर्वेद में राजाओं को दिये गये निर्देशों के अनुसार वे अपनी प्रजा का पालन पुत्रवत् करें। अपने देश की उन्नति एवं समृद्धि के लिए यथोचित प्रयास करें। समाज के विद्वानों की सहायता से ही राज्य का शासनकार्य संचालित करें ताकि उनकी प्रजा को योग्य प्रजापालकों का संरक्षण प्राप्त हो और उनके अपने बहुमखी विकास में किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न हो। यही भावना प्रजा को एक निश्चितता प्रदान करती है और अच्छे राजा तथा विद्वान् मंत्रिगण एवं योग्य सेनापतियों के संरक्षण में वे अपने जीवन को सुरक्षित अनुभव करते हैं। उनके उत्तर में ही वे अपने राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के लिए स्वयं प्रयत्नशील होते हैं। उनकी भावनाएँ राष्ट्र के प्रति सीमाओं से नहीं अपितु उसकी मिट्टी से जुड़ी होती है। दुश्मनों की बुरी दृष्टि भी उन्हें स्वीकार नहीं होती है। यजुर्वेद में निर्देशित (७/२०)² मंत्र के अनुसार राजा और विद्वानों के लिए निश्चित किया है कि वे राज्य की निरन्तर उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहें। वे उपदेश और विद्या के प्रचार द्वारा ही अपनी प्रजा को अभिभूत कर सकते हैं। राजा, प्रजा और उत्तम विद्वानों की परस्पर प्रीति से ही ऐश्वर्य की उन्नति और आनन्द में वृद्धि होना संभव है। राष्ट्र में फैली अशिक्षा और विचारों की संकीर्णता ही राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के मार्ग में बाधक बन सकती है। जबकि यजुर्वेद में उल्लिखित मंत्रों के अनुरूप विद्या के प्रचार से ही हम उनके अन्तर में व्याप्त संकीर्णता, साम्प्रदायिकता, अशिक्षा को दूर करके उनके विचारों में समृद्धि ला सकते हैं और वे राष्ट्र की एकता के लिए मजबूत श्रृंखला बनाने में सक्रिय होंगे। राजनीति में १. वाजसनेयी संहिता १२/११ २. पूर्व में उल्लिखित

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 228 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उनकी सीधी भागीदारी भी उनको राष्ट्र से प्रत्यक्ष तौर पर जोड़ती है। उन्हें अपनी महत्ता का स्वयं ज्ञान होता है। यजुर्वेद में उल्लिखित (३४/९४) मंत्र में वर्णित है कि “जो मनुष्य एक दूसरे के लिए सुख देवें, जो मिलकर दुष्टों का वध करें, वे पुत्र-पौत्र वाले होकर भी मनुष्यों के सुख की उन्नति में समर्थ-विद्वान् होने योग्य होते हैं।” इसमें दुष्टों से आशय देश की एकता एवं अखण्डता पर आघात करने वालों को माना जा सकता है क्योंकि दुष्ट-प्रवृत्ति के लोग ही देश के आन्तरिक वातावरण को बिगाड़ने के लिए आतंक फैलाने वाली क्रियाएँ करते हैं। अतः ऐसे लोगों के दमन का पूर्ण उल्लेख है। देश में ऐसे लोगों को मान्यता प्रदान की गई है जो एक दूसरे के लिए सुखकारी प्रमाणित हो सकें। प्राचीन काल से ही भारत एक विस्तृत एवं महान् राष्ट्र के रूप में माना जाता रहा है और इसकी सभ्यता एवं संस्कृति इस बात का प्रतीक है कि विदेशों से आये लोगों को भी मित्रवत् स्वीकार किया जाता रहा है। किसी अन्य राष्ट्र की स्वतंत्रता या अखण्डता का हनन करने का प्रयास कभी नहीं किया गया और न ही अपनी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता पर प्रहार करने वालों को क्षमा किया गया। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय सामवेद में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का अनुशीलन सामवेद में प्रतिबिम्बित राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का आधारतत्त्व : मातृभूमि और राष्ट्र का अस्तित्व मानव जाति के जन्म के साथ ही संज्ञान में आया था। प्राचीनकाल से लेकर आज तक भी अपने देश और मातृभूमि के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का अगाध प्रेम एवं श्रद्धा जीवित रहती है। चाहे देश के अन्दर रहने वाला साधारण नागरिक हो या फिर देश की सीमाओं पर रक्षा कार्य में संलग्न राष्ट्र के प्रहरी सैनिक हो, सभी में एक ही प्रेम भावना विद्यमान रहती है। सामवेद में भी देश की एकता एवं अखण्डता के आधारतत्त्वों की उपस्थिति स्पष्ट परिलक्षित है। देश के नागरिकों में विद्यमान देश-प्रेम की भावना, मातृभूमि केप्रति अगाध श्रद्धा ही उन्हें प्राणोत्सर्ग के लिए उत्प्रेरित करती है। देश में विद्यमान इसी भावना को सामवेद के निम्न मंत्र में वर्णित किया गया है- आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्वि मातरम्। क उग्राः के ह शृण्विरे॥१ अर्थात् शस्त्रविद्या में चतुर योद्धा शस्त्र हाथ में लेकर माता (मातृभूमि की प्रजा) से पूछे कि कौन-कौन देशद्रोही सुने जाते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेमी देश में देशद्रोह की भावना रखने वालों को सहन नहीं कर सकता है क्योंकि वे राष्ट्र की एकता और अखण्डता के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। सच्ची मातृभूमि ही वह भावना है जो कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता की आधारशिला है। इसी भावना की उपस्थिति एक राष्ट्र को और अधिक दृढ़ता प्रदान कर सकती है। आ गन्ता मा रिषण्यत प्रस्थावानो माप स्थात समन्यवः। दृढांचिद्यमयिष्णवः॥२ अर्थात् 'हे यज्ञादि परोपकार के करने वालों! ऋत्विजों एवं वीरों! आओं, किसी १. सामवेद २/२१६ २. सामवेद ४/४१० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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230 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को कष्ट मत दो तथा किसी के साथ संग्राम मत करो। तुम लोग शत्रुओं पर विजय पाने के लिए प्रस्थान (कूच) करने वाले हो, किन्तु ऐसा न करो। यदि तुम लोगों का एक विचार (संगठन) हो तो बलवान् से बलवान् शत्रु पर भी विजय पाना और उसको अपने वश में रखना कठिन नहीं है।' इससे यह भाव प्रदर्शित होता है कि निरर्थक किसी भी व्यक्ति को कष्ट देना या आपसी वैमनस्य रखकर संघर्षरत होना नैतिक दृष्टि से उचित नहीं है। अपनी भावात्मक एकता का विकास करना चाहिए। जब देश में आपस में भावात्मक एकता बढ़ेगी तो इस एकता में व्यवधान डालने वाले इस एकता की भावना का सामना करने में अपने आपको समर्थ न पा सकेंगे और वे अवश्य ही पराजित हो जाएगें। स्वा॒दो॒रित्था॒ वि॑षू॒वतो॒ मध्वो॑: पिबन्ति गौ॒र्य॑:। या इन्द्रे॑ण स॒याव॑री॒र्वृष्णा॒ मद॑न्ति॒ शोभ॑था॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥१ अर्थात् "हे ईश्वर! (सारी प्रजाएँ) धन-धान्य से पूर्ण पृथ्वी पर प्रजातंत्र शासन होने पर उसी प्रकार तृप्त और प्रसन्न होती हैं, जिस प्रकार वर्षा करने वाले सूर्य के साथ चलने वाली किरणें स्वादिष्ट और मधुर जल ग्रहण करती और लोगों को सुखी पहुँचाती हैं।" देश में प्रजातंत्र शासन की व्यवस्था और उसमें सन्निहित एकता की भावना ही राष्ट्रीय एकता का आधार है। जहाँ देश की प्रजा की शासन में भागीदारी होती है और वह अपने शासक को चुनने का अधिकार वहन करती है, उस शासन में व्यक्ति सुख एवं प्रसन्नता से रहता है और देश के प्रति समर्पित रहता है। देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि नैतिकता की दृष्टि से देश के अतिक्रमणकारी शत्रुओं का अन्त कर दे ताकि देश की एकता एवं अखण्डता पर प्रहार करने वाले तत्त्वों का अन्त हो सके। इ॒त्था हि सोम॑ इ॒न्मदो॒ ब्रह्म॑ च॒कार॒ वर्ध॑नम्। शवि॑ष्ठ व॒ज्रिन्नोज॑सा पृथि॒व्या निः शशा॒ अहि॑मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥२ अर्थात् "हे बलवान् शस्त्रधारी योद्धा पुरुष ! अपने राज्य का स्वागत करता हुआ, काले साँप के समान आक्रमण करने वाले भूमि के शत्रुओं का सत्यानाश कर, क्योंकि आनन्द में मग्न होकर स्तुति करने वाले इसी प्रकार तेरी उन्नति का वर्णन करते हैं।" १. सामवेद ४/४०९ २. सामवेद ४/४१०

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 231 प्रेह्मभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यंः सते। इन्द्र नृम्णः हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्॥१ अर्थात् "हे राष्ट्रपति ! कोई शत्रु तेरा शस्त्र नहीं रोक सकता। तेरा बल शत्रुओं को झुका देने वाला है। जैसे सूर्य मेघ को छिन्न-भिन्न कर जल की वर्षा करता है, ऐसे ही तू अपने शत्रुओं के सम्मुख जा, आक्रमण कर तथा उनका नाश करके अपने राष्ट्र की रक्षा कर।" यहाँ पर राष्ट्रपति का आशय किसी व्यक्ति विशेष के लिए न होकर राष्ट्र की एकता की शक्ति की ओर इंगित करके बताया जा रहा है कि राष्ट्र की संगठन शक्ति इतनी सबल होती है कि शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु भी उसके आगे टिक नहीं सकता है। जब राष्ट्र की एकता की शक्ति शत्रु के सामने चट्टान की तरह अडिग खड़ी हो जाती है तो शत्रु अपनी पराजय स्वयं ही स्वीकार कर लेता है। यही वह सशक्त आधार है जिससे कि सदैव ही राष्ट्र की रक्षा होती रहती है। सामवेद के आधार पर कहा जा सकता है कि प्राचीन ऋषियों, मुनियों एवं विद्वानों ने इस बात की कल्पना कर ली थी कि ये आधार भविष्य के मानव जीवन को संचालित करने में सक्षम एवं पर्याप्त होंगे। अतः विचारणीय विषयों एवं समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने विचार प्रस्तुत किये थे जो आज देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के तत्त्व हैं। वे उस काल में भी विचारणीय एवं आदर्श प्रस्तुत करने वाले समझे जाते थे, मात्र उनमें काल के अनुसार परिवर्तन हुआ है। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के समाज- दर्शन का अनुशीलन : समाज के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। जीवन का निवास ही समाज में होता है और उस समाज में रहकर जीवन व्यतीत करने के लिए उसके द्वारा बनाये गये नियमों का पालन मानव जीवन के लिए अनिवार्य होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक की सारी क्रियायें समाज में ही घटित होती है। इस समाज की नैतिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि वैदिक काल में ही निश्चित कर दी गई थी और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आज का समाज भी उसी का अनुकरण करता चला आ रहा है। इतनी स्पष्ट और सुनिश्चित परिकल्पना बनाई गई थी कि एक आदर्श समाज की रूपरेखा आज भी हमें परिलक्षित होती है। १. सामवेद ४/४१३ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 232 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्राचीन समाजदर्शन का आदर्श ही वर्तमान में इसके अग्रिम अध्ययन का आधार बना। चाहे समाज की वर्ण-व्यवस्था हो, आश्रम-व्यवस्था हो या कि नारी और परिवार की स्थिति के बारे में निश्चित मानदण्ड हो, सभी का आधार आज भी हमारा वैदिक वाङ्ग्मय बना हुआ है। उस समय का समाजदर्शन आज के राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अपना पृथक् स्थान रखता है। (क) वर्ण व्यवस्था :- समाज के सभी प्राणी समाज के अभिन्न अंग माने जाते हैं। इसमें सभी को समान अधिकार प्राप्त था। इसी का अनुकरण करके आधुनिक समाजशास्त्रियों ने भी समाज को एक जीवित शरीर माना है। १ समाजरूपी शरीर के चार अंगों में- मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य एवं पैरों से शूद्र की उत्पत्ति मानी जाती है। वैदिक काल में यह वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर कर्म पर आधारित थी और जैसे शरीर के सभी अंग एक दूसरे के पूरक होते हैं और किसी भी अंग के बिना शरीर का कार्य संभव नहीं होता है, उसी प्रकार सभी वर्ण समाज के लिए अनिवार्य हैं। इन वर्णों के बारे में सामवेद में इसी प्रकार उल्लेख किया गया है परन्तु उसमें एक अन्य वर्ण का भी उल्लेख मिलता है- य आर्जिकेषु कृत्वसु ये मध्ये पस्त्यानाम्। ये वा जनेषु पञ्चसु॥ २ अर्थात् हे परमेश्वर ! जो प्राणी सरल स्वभाव वाली योनियों में हैं, जो गृहस्थ है अथवा जो पञ्चजनों में है, (चारों वर्ण पाचवाँ निषाद), वे हमारे लिए कल्याणकारी हों। चारों वर्णों को समाज की व्यवस्था संभालने का कार्यभार समर्पित था। ब्राह्मण वर्ण शिक्षा देने, यज्ञ कराने, दान आदि ग्रहण करने और नीति सम्बन्धी परामर्श देने वाला वर्ण था। चूँकि उसकी उत्पत्ति मुख से मानी जाती है अतः उसको सम्माननीय स्थान प्राप्त था। क्षत्रिय वर्ण का कार्य सुशासन स्थापना तो था ही, अन्य कार्य भी वे करते थे। वैश्यों के लिए पशुपालन, कृषि और वाणिज्य प्रमुख कार्य थे। परन्तु शस्त्र उठाने, देश की रक्षा करने में भी वे पीछे नहीं थे। शूद्र वर्ण के पास सभी वर्णों को सेवा शुश्रूषा करने का कार्य था। इसके बाद भी इन वर्णों में कहीं उच्च और निम्न होने की भावना नहीं पाई जाती थी और यही कारण है कि वे सभी वर्ण देश और समाज के स्थायी स्तम्भ थे। (ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिक काल में सम्पूर्ण मानव जीवन को चार भागों में विभाजित कर, महत्त्वपूर्ण दायित्वों की पूर्ति हेतु समयबद्ध कर दिया गया था। वह १. हर्बर्ट, स्पेन्सर इत्यादि। २. सामवेद ८/११६४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 233 शिक्षा ग्रहण करने के काल में पूरे २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्याध्ययन का कार्य सम्पन्न करता था। सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश की अनुमति दी जाती थी और गृहस्थाश्रम के पच्चीस वर्षों में वह अपने पुरुषार्थ की पूर्ति करता था। इसमें वह धर्म, अर्थ और काम, तीनों पुरुषार्थों का पालन करते हुए जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति की कामना करता था। अपघ्नन्वते मृधोऽप सोमो अराव्णः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥१ अर्थात् 'आत्मा अपने अन्तस् की बुराइयों एवं दुर्गुणों का नाश करता हुआ उसे पवित्र करता है और उसके पश्चात् ही वह आत्मा मोक्ष प्राप्त करता है।' इससे पूर्व व्यक्ति अपने जीवन की परिपक्वावस्था में गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होता है। इस आश्रम में वह अपनी तीनों एषणाओं में से वित्तेषणा और पुत्रेषणा की पूर्ति करता है। इन एषणाओं की पूर्ति से उसकी आत्मा पूर्ण संतुष्ट हो जाती है तब वह लोकेषणा का त्याग करना चाहता है। परन्तु गृहस्थाश्रम में अनुभूत अनुभवों पर वह क्या-क्या चाहता है, यह निम्न मंत्र द्वारा स्पष्ट किया गया है- अक्रांत्समुदः प्रथमे विधर्मं जनयन् प्रजा भुवनस्य गोपाः। वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः॥२ अर्थात् 'गृहस्थाश्रम में अपनी सन्तान और इन्द्रियों का आधार पवित्र धर्म को मानकर प्रजा (पुत्र-पौत्र) को उत्पन्न करने वाले, संसार के नियम का पालन करने वाले, रक्षा के योग्य तथा सच्चा आचरण करने वाले पर कृपा की वर्षा करने वाले, शब्द, स्पर्श आदि से सीधा सम्बन्ध रखने वाले, महान् जीवन धारण करने वाले, आदर के योग्य जीवात्मा अपनी शक्ति से उन्नति करता है।' इसमें गृहस्थाश्रम के दायित्वों एवं कामनाओं का पूर्ण उल्लेख किया गया है। इस आश्रम में रहते हुए भी सबसे अधिक उत्तरदायित्व, कर्तव्यों एवं धर्म के पथ पर चलते हुए सद्मार्ग पर अग्रसर होते रहना पड़ता था। पुरुषार्थों की पूर्ति भी इसी में रहकर करनी पड़ती थी जैसा कि उल्लिखित है- पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्। इन्द्र सोमे सचा सुते॥३ अर्थात् "सभी आश्रमों में प्रसिद्ध गृहस्थाश्रम में रहते हुए हम सब दुःखों के दमन करने वाले, वरण करने योग्य गुणों के स्वामी परमेश्वर का भजन करते हैं।" १. सामवेद ५/५१० २. सामवेद- पूर्वार्चिकः ५/५२९ ३. सामवेद- उत्तरार्चिकः १/७४१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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234 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

इस प्रकार जीवन के पचास वर्ष ब्रह्मचर्य और गृहस्थाश्रम की पूर्ति में सम्पूर्ण हो जाते हैं। तृतीय आश्रम वानप्रस्थ में गृह के प्रति मोह त्याग कर घर में ही रहते हुए अपना सम्पूर्ण समय पूजा-अर्चना में व्यतीत करने का आदेश दिया गया है। वानप्रस्थ पूर्ण होने पर संन्यास आश्रम में गृह त्याग कर वन में जाकर फलाहार आदि के सहारे जप-तप में एकाकी जीवन व्यतीत करते हुए मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करना चाहिये। मोक्ष मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना गया है जहाँ आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, ऐसा उल्लेख है। (ग) पुरुषार्थ चतुष्टय :- पुरुषार्थ का सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन में किये जाने वाले कर्त्तव्यों और धर्मों से है। वेदों में ही उसके जीवन को चार पुरुषार्थों में विभाजित कर दिया गया था। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म का पालन जीवन पथ का प्रथम और अन्तिम सन्देश होता था। इसी की छत्रछाया में सारे कार्यों को सम्पन्न करना होता था। गृहस्थाश्रम धार्मिक कृत्यों की पूर्ति करते हुए ईश्वर की प्राप्ति के लिये तथा पितृ, देव तथा ऋषि ऋण से मुक्त होने की प्रेरणा भी प्रदान करता है— पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे॥१ अर्थात् हे परमेश्वर! बल और अन्न की प्राप्ति, कामादि शत्रुओं से तरने के लिये पापों का नाश करने वाला तू, हमें पितृ, देव तथा ऋषि ऋण से अवगत कराता है और उससे मुक्ति पाने के लिये हमें प्रेरित करता है। पुरुषार्थों के द्वारा ही वह जगत् के कल्याण करने का प्रयास करता है। यह सभी व्यवस्थायें जीवन को संयमित एवं मर्यादित करने के लिये निश्चित की गई हैं। वह अर्थोपार्जन करता है, तो धर्मानुसार। अधर्म से अर्जित किये गये धन से यज्ञ आदि कर्म भी सफल नहीं हो सकते हैं। अर्थ अर्जित करने का उद्देश्य भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए व्यय करना नहीं है अपितु धार्मिक कृत्यों, यज्ञ, दान, आदि में व्यय करना है। काम पुरुषार्थ की व्यवस्था का सीधा सम्बन्ध गृहस्थ आश्रम से जुड़ा हुआ है। काम मात्र वासनाओं की पूर्ति का साधन नहीं अपितु सृष्टि को कायम रखने की परम्परा की भी पूर्ति करने से है। पति-पत्नी दोनों के ही द्वारा इसे धार्मिक कृत्य समझकर ही पूर्ण किया जाता है। मोक्ष का सम्बन्ध शेष तीन पुरुषार्थों से अलग है क्योंकि उन सभी की पूर्ति के पश्चात् मोक्ष के लिए जप, तप करने का आदेश किया गया है और इसके लिए वह सांसारिक मोह-माया आदि से मुक्त हो जाता है।

१. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४२८ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 235 नारी की स्थिति- वैदिक काल में पुरुष एवं स्त्री में कोई भेद नहीं किया गया था क्योंकि बचपन से ही बालक एवं बालिकाओं के विकास में समान दृष्टिकोण अपनाया गया था। उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा देने का प्राविधान था। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पर वे गृह की सुव्यवस्था, बच्चों के समुचित लालन-पालन के साथ ही अग्निहोत्र में भाग लेती हुई पति के धर्मानुष्ठान में भी साहचर्य निभाती थीं। उनको पूर्ण सम्मान प्राप्त था, उनके बिना सुगृह की कल्पना नहीं की जा सकती थी— महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती। यथा चित्रो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते॥१ अर्थात् हे श्रेष्ठ गुणों वाली! धागे के समान सन्तान का विस्तार करने वाली! सत्य और मधुर बोलने वाली कुलीन स्त्री! मनुष्य जैसे चमकती हुई उषा देवी के उदय होने पर महान् धन के उपार्जन के लिए अपने-अपने कामों में लग जाते हैं, ऐसे ही आज तू भी सम्पत्ति, विद्या तथा सच्ची कीर्ति के लिए ज्ञान का प्रकाश दें। उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति। येन तोकं च तनयं च धामहे॥२ अर्थात् "हे धन आदि का संचय करने वाली उषा के तुल्य पवित्राचरण युक्त स्त्री ! तू हमें वह सौभाग्य दे जिससे कि हम पुत्र और पौत्र को भी धारण कर सकें।" स्त्री को समाज में सम्मानीय स्थान देना उस राष्ट्र के निर्माण में एक सकारात्मक पग है क्योंकि भावी नागरिकों की प्रथम शिक्षक माँ ही होती है और माँ द्वारा दी गई शिक्षा अबोध मस्तिष्क पर अपना प्रभाव जीवनपर्यन्त बनाये रखती है। स्त्री कभी भी अपने पुत्र एवं पुत्रियों को विघटनात्मक पथ पर जाने का परामर्श या शिक्षा नहीं दे सकती है। ५. विवाह :- मानव जीवन में विवाह मात्र एक संस्कार नहीं है अपितु उसका सम्बन्ध धर्म, देश और काल सभी को प्रभावित करने वाला होता है। बाल विवाह जैसी कुप्रथा उस समय नहीं पाई जाती थी। विवाह वर और कन्या दोनों के ही पूर्ण यौवन प्राप्त करने पर एवं शिक्षा पूर्ण होने पर ही होता था। कन्या को सुयोग्य पति चयन की स्वतंत्रता प्राप्त थी। वर्ण का भेद इसमें कोई स्थान नहीं रखता था। अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनूँ। सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्॥ १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४२१ २. सामवेद- उत्तरार्चिकः १९/१७३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar