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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 353 में से

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पृष्ठ 260

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 232 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्राचीन समाजदर्शन का आदर्श ही वर्तमान में इसके अग्रिम अध्ययन का आधार बना। चाहे समाज की वर्ण-व्यवस्था हो, आश्रम-व्यवस्था हो या कि नारी और परिवार की स्थिति के बारे में निश्चित मानदण्ड हो, सभी का आधार आज भी हमारा वैदिक वाङ्ग्मय बना हुआ है। उस समय का समाजदर्शन आज के राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अपना पृथक् स्थान रखता है। (क) वर्ण व्यवस्था :- समाज के सभी प्राणी समाज के अभिन्न अंग माने जाते हैं। इसमें सभी को समान अधिकार प्राप्त था। इसी का अनुकरण करके आधुनिक समाजशास्त्रियों ने भी समाज को एक जीवित शरीर माना है। १ समाजरूपी शरीर के चार अंगों में- मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य एवं पैरों से शूद्र की उत्पत्ति मानी जाती है। वैदिक काल में यह वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर कर्म पर आधारित थी और जैसे शरीर के सभी अंग एक दूसरे के पूरक होते हैं और किसी भी अंग के बिना शरीर का कार्य संभव नहीं होता है, उसी प्रकार सभी वर्ण समाज के लिए अनिवार्य हैं। इन वर्णों के बारे में सामवेद में इसी प्रकार उल्लेख किया गया है परन्तु उसमें एक अन्य वर्ण का भी उल्लेख मिलता है- य आर्जिकेषु कृत्वसु ये मध्ये पस्त्यानाम्। ये वा जनेषु पञ्चसु॥ २ अर्थात् हे परमेश्वर ! जो प्राणी सरल स्वभाव वाली योनियों में हैं, जो गृहस्थ है अथवा जो पञ्चजनों में है, (चारों वर्ण पाचवाँ निषाद), वे हमारे लिए कल्याणकारी हों। चारों वर्णों को समाज की व्यवस्था संभालने का कार्यभार समर्पित था। ब्राह्मण वर्ण शिक्षा देने, यज्ञ कराने, दान आदि ग्रहण करने और नीति सम्बन्धी परामर्श देने वाला वर्ण था। चूँकि उसकी उत्पत्ति मुख से मानी जाती है अतः उसको सम्माननीय स्थान प्राप्त था। क्षत्रिय वर्ण का कार्य सुशासन स्थापना तो था ही, अन्य कार्य भी वे करते थे। वैश्यों के लिए पशुपालन, कृषि और वाणिज्य प्रमुख कार्य थे। परन्तु शस्त्र उठाने, देश की रक्षा करने में भी वे पीछे नहीं थे। शूद्र वर्ण के पास सभी वर्णों को सेवा शुश्रूषा करने का कार्य था। इसके बाद भी इन वर्णों में कहीं उच्च और निम्न होने की भावना नहीं पाई जाती थी और यही कारण है कि वे सभी वर्ण देश और समाज के स्थायी स्तम्भ थे। (ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिक काल में सम्पूर्ण मानव जीवन को चार भागों में विभाजित कर, महत्त्वपूर्ण दायित्वों की पूर्ति हेतु समयबद्ध कर दिया गया था। वह १. हर्बर्ट, स्पेन्सर इत्यादि। २. सामवेद ८/११६४ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar