भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 353 में से

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पृष्ठ 261

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 233 शिक्षा ग्रहण करने के काल में पूरे २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्याध्ययन का कार्य सम्पन्न करता था। सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश की अनुमति दी जाती थी और गृहस्थाश्रम के पच्चीस वर्षों में वह अपने पुरुषार्थ की पूर्ति करता था। इसमें वह धर्म, अर्थ और काम, तीनों पुरुषार्थों का पालन करते हुए जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति की कामना करता था। अपघ्नन्वते मृधोऽप सोमो अराव्णः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥१ अर्थात् 'आत्मा अपने अन्तस् की बुराइयों एवं दुर्गुणों का नाश करता हुआ उसे पवित्र करता है और उसके पश्चात् ही वह आत्मा मोक्ष प्राप्त करता है।' इससे पूर्व व्यक्ति अपने जीवन की परिपक्वावस्था में गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होता है। इस आश्रम में वह अपनी तीनों एषणाओं में से वित्तेषणा और पुत्रेषणा की पूर्ति करता है। इन एषणाओं की पूर्ति से उसकी आत्मा पूर्ण संतुष्ट हो जाती है तब वह लोकेषणा का त्याग करना चाहता है। परन्तु गृहस्थाश्रम में अनुभूत अनुभवों पर वह क्या-क्या चाहता है, यह निम्न मंत्र द्वारा स्पष्ट किया गया है- अक्रांत्समुदः प्रथमे विधर्मं जनयन् प्रजा भुवनस्य गोपाः। वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः॥२ अर्थात् 'गृहस्थाश्रम में अपनी सन्तान और इन्द्रियों का आधार पवित्र धर्म को मानकर प्रजा (पुत्र-पौत्र) को उत्पन्न करने वाले, संसार के नियम का पालन करने वाले, रक्षा के योग्य तथा सच्चा आचरण करने वाले पर कृपा की वर्षा करने वाले, शब्द, स्पर्श आदि से सीधा सम्बन्ध रखने वाले, महान् जीवन धारण करने वाले, आदर के योग्य जीवात्मा अपनी शक्ति से उन्नति करता है।' इसमें गृहस्थाश्रम के दायित्वों एवं कामनाओं का पूर्ण उल्लेख किया गया है। इस आश्रम में रहते हुए भी सबसे अधिक उत्तरदायित्व, कर्तव्यों एवं धर्म के पथ पर चलते हुए सद्मार्ग पर अग्रसर होते रहना पड़ता था। पुरुषार्थों की पूर्ति भी इसी में रहकर करनी पड़ती थी जैसा कि उल्लिखित है- पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्। इन्द्र सोमे सचा सुते॥३ अर्थात् "सभी आश्रमों में प्रसिद्ध गृहस्थाश्रम में रहते हुए हम सब दुःखों के दमन करने वाले, वरण करने योग्य गुणों के स्वामी परमेश्वर का भजन करते हैं।" १. सामवेद ५/५१० २. सामवेद- पूर्वार्चिकः ५/५२९ ३. सामवेद- उत्तरार्चिकः १/७४१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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