वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 262, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
234 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
इस प्रकार जीवन के पचास वर्ष ब्रह्मचर्य और गृहस्थाश्रम की पूर्ति में सम्पूर्ण हो जाते हैं। तृतीय आश्रम वानप्रस्थ में गृह के प्रति मोह त्याग कर घर में ही रहते हुए अपना सम्पूर्ण समय पूजा-अर्चना में व्यतीत करने का आदेश दिया गया है। वानप्रस्थ पूर्ण होने पर संन्यास आश्रम में गृह त्याग कर वन में जाकर फलाहार आदि के सहारे जप-तप में एकाकी जीवन व्यतीत करते हुए मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करना चाहिये। मोक्ष मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना गया है जहाँ आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, ऐसा उल्लेख है। (ग) पुरुषार्थ चतुष्टय :- पुरुषार्थ का सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन में किये जाने वाले कर्त्तव्यों और धर्मों से है। वेदों में ही उसके जीवन को चार पुरुषार्थों में विभाजित कर दिया गया था। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म का पालन जीवन पथ का प्रथम और अन्तिम सन्देश होता था। इसी की छत्रछाया में सारे कार्यों को सम्पन्न करना होता था। गृहस्थाश्रम धार्मिक कृत्यों की पूर्ति करते हुए ईश्वर की प्राप्ति के लिये तथा पितृ, देव तथा ऋषि ऋण से मुक्त होने की प्रेरणा भी प्रदान करता है— पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे॥१ अर्थात् हे परमेश्वर! बल और अन्न की प्राप्ति, कामादि शत्रुओं से तरने के लिये पापों का नाश करने वाला तू, हमें पितृ, देव तथा ऋषि ऋण से अवगत कराता है और उससे मुक्ति पाने के लिये हमें प्रेरित करता है। पुरुषार्थों के द्वारा ही वह जगत् के कल्याण करने का प्रयास करता है। यह सभी व्यवस्थायें जीवन को संयमित एवं मर्यादित करने के लिये निश्चित की गई हैं। वह अर्थोपार्जन करता है, तो धर्मानुसार। अधर्म से अर्जित किये गये धन से यज्ञ आदि कर्म भी सफल नहीं हो सकते हैं। अर्थ अर्जित करने का उद्देश्य भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए व्यय करना नहीं है अपितु धार्मिक कृत्यों, यज्ञ, दान, आदि में व्यय करना है। काम पुरुषार्थ की व्यवस्था का सीधा सम्बन्ध गृहस्थ आश्रम से जुड़ा हुआ है। काम मात्र वासनाओं की पूर्ति का साधन नहीं अपितु सृष्टि को कायम रखने की परम्परा की भी पूर्ति करने से है। पति-पत्नी दोनों के ही द्वारा इसे धार्मिक कृत्य समझकर ही पूर्ण किया जाता है। मोक्ष का सम्बन्ध शेष तीन पुरुषार्थों से अलग है क्योंकि उन सभी की पूर्ति के पश्चात् मोक्ष के लिए जप, तप करने का आदेश किया गया है और इसके लिए वह सांसारिक मोह-माया आदि से मुक्त हो जाता है।
१. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४२८ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar