वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 235 नारी की स्थिति- वैदिक काल में पुरुष एवं स्त्री में कोई भेद नहीं किया गया था क्योंकि बचपन से ही बालक एवं बालिकाओं के विकास में समान दृष्टिकोण अपनाया गया था। उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा देने का प्राविधान था। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पर वे गृह की सुव्यवस्था, बच्चों के समुचित लालन-पालन के साथ ही अग्निहोत्र में भाग लेती हुई पति के धर्मानुष्ठान में भी साहचर्य निभाती थीं। उनको पूर्ण सम्मान प्राप्त था, उनके बिना सुगृह की कल्पना नहीं की जा सकती थी— महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती। यथा चित्रो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते॥१ अर्थात् हे श्रेष्ठ गुणों वाली! धागे के समान सन्तान का विस्तार करने वाली! सत्य और मधुर बोलने वाली कुलीन स्त्री! मनुष्य जैसे चमकती हुई उषा देवी के उदय होने पर महान् धन के उपार्जन के लिए अपने-अपने कामों में लग जाते हैं, ऐसे ही आज तू भी सम्पत्ति, विद्या तथा सच्ची कीर्ति के लिए ज्ञान का प्रकाश दें। उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति। येन तोकं च तनयं च धामहे॥२ अर्थात् "हे धन आदि का संचय करने वाली उषा के तुल्य पवित्राचरण युक्त स्त्री ! तू हमें वह सौभाग्य दे जिससे कि हम पुत्र और पौत्र को भी धारण कर सकें।" स्त्री को समाज में सम्मानीय स्थान देना उस राष्ट्र के निर्माण में एक सकारात्मक पग है क्योंकि भावी नागरिकों की प्रथम शिक्षक माँ ही होती है और माँ द्वारा दी गई शिक्षा अबोध मस्तिष्क पर अपना प्रभाव जीवनपर्यन्त बनाये रखती है। स्त्री कभी भी अपने पुत्र एवं पुत्रियों को विघटनात्मक पथ पर जाने का परामर्श या शिक्षा नहीं दे सकती है। ५. विवाह :- मानव जीवन में विवाह मात्र एक संस्कार नहीं है अपितु उसका सम्बन्ध धर्म, देश और काल सभी को प्रभावित करने वाला होता है। बाल विवाह जैसी कुप्रथा उस समय नहीं पाई जाती थी। विवाह वर और कन्या दोनों के ही पूर्ण यौवन प्राप्त करने पर एवं शिक्षा पूर्ण होने पर ही होता था। कन्या को सुयोग्य पति चयन की स्वतंत्रता प्राप्त थी। वर्ण का भेद इसमें कोई स्थान नहीं रखता था। अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनूँ। सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्॥ १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४२१ २. सामवेद- उत्तरार्चिकः १९/१७३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar