वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 235 नारी की स्थिति- वैदिक काल में पुरुष एवं स्त्री में कोई भेद नहीं किया गया था क्योंकि बचपन से ही बालक एवं बालिकाओं के विकास में समान दृष्टिकोण अपनाया गया था। उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा देने का प्राविधान था। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पर वे गृह की सुव्यवस्था, बच्चों के समुचित लालन-पालन के साथ ही अग्निहोत्र में भाग लेती हुई पति के धर्मानुष्ठान में भी साहचर्य निभाती थीं। उनको पूर्ण सम्मान प्राप्त था, उनके बिना सुगृह की कल्पना नहीं की जा सकती थी— महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती। यथा चित्रो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते॥१ अर्थात् हे श्रेष्ठ गुणों वाली! धागे के समान सन्तान का विस्तार करने वाली! सत्य और मधुर बोलने वाली कुलीन स्त्री! मनुष्य जैसे चमकती हुई उषा देवी के उदय होने पर महान् धन के उपार्जन के लिए अपने-अपने कामों में लग जाते हैं, ऐसे ही आज तू भी सम्पत्ति, विद्या तथा सच्ची कीर्ति के लिए ज्ञान का प्रकाश दें। उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति। येन तोकं च तनयं च धामहे॥२ अर्थात् "हे धन आदि का संचय करने वाली उषा के तुल्य पवित्राचरण युक्त स्त्री ! तू हमें वह सौभाग्य दे जिससे कि हम पुत्र और पौत्र को भी धारण कर सकें।" स्त्री को समाज में सम्मानीय स्थान देना उस राष्ट्र के निर्माण में एक सकारात्मक पग है क्योंकि भावी नागरिकों की प्रथम शिक्षक माँ ही होती है और माँ द्वारा दी गई शिक्षा अबोध मस्तिष्क पर अपना प्रभाव जीवनपर्यन्त बनाये रखती है। स्त्री कभी भी अपने पुत्र एवं पुत्रियों को विघटनात्मक पथ पर जाने का परामर्श या शिक्षा नहीं दे सकती है। ५. विवाह :- मानव जीवन में विवाह मात्र एक संस्कार नहीं है अपितु उसका सम्बन्ध धर्म, देश और काल सभी को प्रभावित करने वाला होता है। बाल विवाह जैसी कुप्रथा उस समय नहीं पाई जाती थी। विवाह वर और कन्या दोनों के ही पूर्ण यौवन प्राप्त करने पर एवं शिक्षा पूर्ण होने पर ही होता था। कन्या को सुयोग्य पति चयन की स्वतंत्रता प्राप्त थी। वर्ण का भेद इसमें कोई स्थान नहीं रखता था। अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनूँ। सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्॥ १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४२१ २. सामवेद- उत्तरार्चिकः १९/१७३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 236 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता य ऊर्ध्वाया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा। घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः॥१ अर्थात् ' हे कन्ये ! जो पुरुष उत्तम विद्या से कल्याणकारी यज्ञ करने वाला हो, विद्वानों को प्राप्त होने वाली ईश्वर की कृपा से मनोहर हो, जो होम के लिए प्राप्त करने में योग्य शुद्ध पवित्र घी के साथ अनेक प्रकार के पदार्थ को पकाने वाली अग्नि के समान तेजस्वी हो, जो प्रसिद्ध विद्वान् पुरुष के समान विद्या को भी प्रकट करने की शक्ति रखता हो, मैं ऐसे पुरुष को ही पति स्वीकार करती हूँ, तू भी ऐसा ही कर।' इस तरह विवाह संस्कार में जाति या वर्ण का कोई भी अवरोध नहीं था। इस तरह की स्वतंत्रता लोगों के मध्य वैमनस्य या संकीर्णता की भावना उत्पन्न नहीं होने देती है और सम्पूर्ण विश्व हमारा परिवार है, ऐसी भावना जागृत होती है और ये सभी स्थितियाँ देश की एकता और अखण्डता के लिए काल में पाये जाने वाले सकारात्मक घटक कहें जायेंगे। ३. राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के राजदर्शन का अनुशीलन- सामवेद काल में राजनैतिक व्यवस्था भी आदर्श थी, जिसमें सम्पूर्ण राष्ट्र में एकता एवं अखण्डता की भावना की अनुभूति होती थी। वैदिक काल में स्वराज्य शासन प्रणाली का प्राविधान दृष्टिगोचर होता है। स्वराज्य का वास्तविक अर्थ है- "आत्म नियंत्रण या स्वयं के ऊपर शासन। जहाँ मानव स्वशासित होता है वहाँ पर किसी अन्य नियंत्रण की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। राजा के बारे में एक आदर्श व्यक्ति का स्वरूप चित्रित मिलता है जो कि परम हितैषी, न्यायकारी, विद्वान् पुरुष ही हो सकता है और ऐसे राज्य में सुख शान्ति की ही कल्पना की जा सकती है- यः रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्रो अर्यमा। न किः स दभ्यते जनः॥२ अर्थात् हे मनुष्यों ! हितैषी, न्यायकारी राजा और उत्तम ज्ञानी पुरुष जिस मनुष्य की रक्षा करते हैं, कोई उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता है। जिस राष्ट्र का राजा ही योग्य व न्यायी होगा उसकी समृद्धि और सुख शान्ति पर सन्देह नहीं किया जा सकता है। स्थान-स्थान पर राजा के लिए कर्त्तव्यों के निर्देश दिये गये हैं- १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४६५ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/१८५ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
पञ्चम अध्याय $\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad$ 237 कदा वसो स्तोत्रꣳहर्यत आ अव श्मशा रुधद्वाः। दीर्घꣳ सुतं वाताप्याय॥$^{१}$ अर्थात् हे ऐश्वर्यवान् राजन्! जब कभी जल-वृष्टि रुक जावे, तब वेदप्रेमी महान् प्रजावर्ग को जल प्रदान करने के लिए नहर बनवाओ। योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमा नृभिः पुरुहूत प्र याहि। असो यथा नोऽविता वृधश्चिद्ददो वसूनि ममदश्च सोमैः॥$^{२}$ अर्थात् 'हे राष्ट्रपति! सभा के स्थान में तेरा मंच बना दिया गया है। हे बहुमत प्राप्त करने वाले! तू सहायक मनुष्यों के साथ उस मंच पर विराजमान हो, जिस प्रकार हमारी रक्षा और उन्नति कर सके, कर। हमें हमारी सम्पत्तियाँ दे और स्वयं भी योग्य पदार्थों से तृप्त हो।' स्वादोरित्या विषूवतो मधोः पिबन्ति गौर्यः। या इन्द्रेण सयावरीर्वृष्णा मदन्ति शोभथा वस्वीरनु स्वराज्यम्॥ $^{३}$ "हे ईश्वर! (सारी प्रजायें) धन-धान्य से पूर्ण पृथिवी पर प्रजातंत्र शासन होने पर उसी प्रकार तृप्त और प्रसन्न होती हैं, जिस प्रकार वर्षा करने वाले सूर्य के साथ चलने वाली किरणें स्वादिष्ट और मधुर जल ग्रहण करती और लोगों को सुखी करती हैं।" प्रजातंत्र शासन की अवधारणा उस समय भी विद्यमान थी और इसी को सर्वश्रेष्ठ भी माना जाता था। अनावश्यक अतिक्रमण या अधिकारों का हनन किसी भी समय अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। आज का प्रजातंत्र और राष्ट्र की एकता और अखण्डता का सन्देश वैदिक युग से ही प्राप्त किया गया प्रतीत होता है। राष्ट्र का स्थान व्यक्ति के जीवन में सर्वोपरि रहा है। राष्ट्र की शत्रुओं से रक्षा करना सबका एक मात्र ध्येय रहता था। प्रेहाभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि यꣳ सते। इन्द्र नृम्णाꣳ हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम्॥$^{४}$ अर्थात् हे राष्ट्रपति! कोई शत्रु तेरे शस्त्र को नहीं रोक सकता। तेरा बल शत्रुओं को झुका देने वाला है। जैसे सूर्य मेघ को छिन्न-भिन्न कर जल की वर्षा करता है, ऐसे १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/२२८ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/३१४ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४०९ ४. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४१३
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 238 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ही तू अपने शत्रुओं के सम्मुख जा, आक्रमण कर तथा उनका नाश करके अपने राष्ट्र की रक्षा कर। राष्ट्र की रक्षा उसकी अखण्डता से जुड़ी हुई है और इसी के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र एक होकर शत्रुओं का सामना करने के लिए तैयार रहता है। वेदों में राष्ट्र-भक्तों को मातृभूमि के पुत्र और पृथिवी को उनकी माता बतलाया गया है। इसी भावना का विकास करते हुए ही कहा गया है कि राष्ट्र के निवासियों में किसी भी प्रकार की ज्येष्ठता और कनिष्ठता की भावना नहीं होना चाहिए और सामान्य रूप से प्रयत्नशील होते हुए राष्ट्र की उन्नति में तत्पर रहना चाहिये। ऐसे ही विचारशील मनुष्यों से राष्ट्र उत्तम फल की आशा कर सकता है जो राष्ट्र की सामूहिक हित की कामना को पूर्ण करने में सक्षम हो सकते हों। परमेश्वर से यही प्रार्थना की गयी है कि इस प्रकार की भावना जनमानस में अधिकाधिक रूप से विद्यमान हो। इसी प्रकार किसी नवोदित देश या राष्ट्र का सहज कल्याण हो सकता है। इस प्रकार की उदात्त भावना का शुद्ध रूप हमें अपने देश भारतवर्ष के संविधान की प्रस्तावना या घोषणा पत्र में भी दृष्टिगोचर होता है जो कि उसके सबसे प्रथम मुखपृष्ठ पर ही इस प्रकार अंकित है— "भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६ नवम्बर १९४९ ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल ६ सम्वत् २००६ वि०) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।" इसमें समाहित सभी गुण हमें वैदिक काल के राजदर्शन से ही प्राप्त हो रहे हैं। ४. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के धर्मदर्शन का अनुशीलन- भारत में मानव जीवन की संचालनशक्ति धर्म को ही माना गया है और यही कारण है कि व्यक्ति आज भी धार्मिकता से अपने आपको पृथक् नहीं कर पाता है। वह पाप और पुण्य की अवधारणा में बँधा हुआ है। वैदिक साहित्य में तो जीवन के उद्देश्यों में प्रमुख 'धर्म' को ही माना गया था, कालान्तर में इसके स्वरूप में परिवर्तन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
पञ्चम अध्याय 239
अवश्य हुआ लेकिन मानवमस्तिष्क में आज भी इसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित है। सामवेद में इसके बारे में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है— प्र भूर्जयन्तं महां विपोधां मूरैरमूरं पुरां दर्माणम्। नयन्तं गीर्भिर्वना धियं धा हरिश्मश्रुं न वर्मणा धनर्चिम्॥१ अर्थात् 'हे मनुष्य ! तू भूमि के चलाने वाले, महान् बुद्धिमानों के रक्षक, मूर्खों के द्वारा न जानने योग्य, मूल रहित वेदवाणी द्वारा, ज्ञान और रक्षा द्वारा, प्रशंसनीय सुख को प्राप्त कराने वाले सूर्य के समान धनों के स्वामी परमेश्वर को धारण कर।' मा नो हृणीथा अतिथिं वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एषः। यः सुहोता स्वध्वरः॥२ अर्थात् हे मनुष्य ! जो परमेश्वर उत्तमदाता कल्याणकारी यज्ञ का स्वामी, सब का बसाने वाला तथा अत्यन्त प्रशंसनीय है, उस हमारे पूजनीय देव के प्रति क्रोध या अनादर का भाव मत करो। ईश्वर सदैव पूजनीय है, उसका स्वरूप अवर्णनीय है। वह सदैव ही मानव मात्र का सहायक होता है। उसकी स्तुति से सदैव कल्याण ही होता है। उसकी आराधना करते हुए संसार में सद्कर्मों और परोपकार में ही जीवन व्यतीत करना उचित होता है। पाप कर्मों का त्याग, जीव मात्र के प्रति दया, यज्ञ और स्तुतियों के द्वारा परमेश्वर की आराधना ही जीवन के प्रमुख उद्देश्यों में समाहित होना चाहिए। जीवन की पूर्णता इसी में व्याप्त है। वृत्रस्य त्वा श्वसथादोषमाणा विश्वेदेवा अजहुर्ये सखायः। मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि॥३ अर्थात् हे जीवात्मा ! जो इन्द्रियाँ तेरी मित्र होती हैं, वे भी पाप के श्वास से ही प्रभावित होकर तेरा साथ छोड़ देती है। केवल प्राण ही तेरे साथी होते हैं। जब ये साथ देते हैं तो पाप की सारी सेना को तू जीत लेता है। त्वं ह त्यत्सप्तभ्यो जायमानोऽशत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र। गूढे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्द्भ्यो भुवनेभ्यो रणं धाः॥४
१. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/७४ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/३४ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः १/३२४ ४. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ३/३२६
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 240 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् हे जीव! तू मित्ररूप सात इन्द्रियों के लिए उत्पन्न होकर भोगों में फँसा हुआ उनका शत्रु बन जाता है। तू अत्यन्त गूढ़, द्यु एवम् पृथिवी लोक में भी कर्मानुसार प्राप्त होता है। तू ऐश्वर्यशाली लोकों की प्राप्ति के लिए जीवन संग्राम को धारण करता है। जीवन में ज्ञान और कर्म का उपदेश ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार कर्मों का फल मनुष्य को सदैव ही प्राप्त होता है। सद्कर्मों का फल जीवन में सद् ही प्राप्त होता है और दुष्कर्मों का फल सदैव बुरा ही हो सकता है। इस अवधारणा से व्यक्ति का जीवन भी नियंत्रित होता है क्योंकि उसे कर्मफल का भय सदैव ही भयभीत करता रहता है। अचेत्यग्निश्चिकितिर्हव्यवाट् न सुमद्रथः॥१ अर्थात् "परमात्मा को सब जानते हैं और वह भी सबको जानता है। परमात्मा मनुष्यों को उनके भले और बुरे कर्मों के फल तथा योग्य पदार्थों को देता है। शुद्ध ज्ञान ही भगवान् का रथ है।" धर्म के अनुसार मनुष्य की अन्तिम गति मोक्ष प्राप्त करने की होती है और वह इस शाश्वत सत्य को कभी नहीं भूलता कि मृत्यु अवश्यम्भावी है और उसे मोक्ष प्राप्ति हेतु जप-तप करने में रत रहना है। यह उसके जीवन का महत्त्वपूर्ण चरण होता है। तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरत्स मन्दी धावति॥२ अर्थात् जो पुरुष अन्नरूप सुन्दर गिरायी हुई सोमरस की धारा से यज्ञ करता हुआ परमेश्वर की स्तुति करता है, वह स्तुति करने वाला अवश्य ही तर जाता है। अर्थात् उत्तम गति पाता है। एते असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः। विश्वान्यभि सौभगा॥३ अर्थात् सब शुभगुणों से युक्त यज्ञ, दुःखों से पार लगाने वाले पवित्र निष्काम कर्म और समस्त संपदाओं की प्राप्ति के उद्देश्य से किये जाते हैं। इस प्रकार सामवेद में वर्णित धर्मदर्शन अन्य वेदों से पृथक् नहीं है। वेदों के अनुसार मानव जीवन धर्माचरण से युक्त नैतिकता की प्रमुखता वाला था। इसमें ईश्वर, राष्ट्र, परिवार सभी की महत्ता को स्वीकार किया गया है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में इस दर्शन के अनुसार इस भावना को दृढ़ता प्राप्त १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ४/४४ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ५/५०० ३. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ४/८३० CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 241 होती है। दुष्ट, पापियों और अनाचारियों के मर्दन का सदैव वर्णन मिला है। वे व्यक्ति जो मानव, समाज और राष्ट्र के लिए घातक हों, उन्हें पापी और अनाचारी के अतिरिक्त क्या कहा जा सकता है। ऐसे व्यक्तियों से ही देश और समाज को हानि हो सकती है। इससे यह स्पष्ट है कि सामवेद में धर्मदर्शन द्वारा एकता और अखण्डता के लिए भी समुचित वातावरण प्रस्तुत किया गया है। ५. राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में सामवेद के आचार- दर्शन, शिक्षा-दर्शन एवम् अर्थ-दर्शन का अनुशीलन- मनुष्य के आचार-विचारों की शुद्धता से ही सम्पूर्ण व्यक्तित्व के बारे में आकलन किया जा सकता है। नैतिकता का जीवन में समावेश ही उसके जीवन को मानवीय बनाता है। नीति के अनुसार आचार-विचार का अनुकरण करने वाले समाज से एक आदर्श समाज एवं राष्ट्र का निर्माण होता है। एक आदर्श समाज से ही एकता सूत्र में आबद्ध राष्ट्र तैयार होता है। नीति में अपनी अदृश्य शक्ति होती है जो मानव को आत्मिक बल प्रदान करती है। अग्निमिन्धानो मनसा धियꣳ सचेत मर्त्यः। अग्निमिन्धे विवस्वभिः॥१ अर्थात् "मनुष्यों को चाहिए कि वह योग की अग्नि को प्रदीप्त करता हुआ मन के साथ बुद्धि को संयुक्त करे और ज्ञान-ज्योतियों से अपने अन्दर परमेश्वर को प्रकाशित करे।" न कि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि। मन्त्रश्रुत्यं चरामसि॥२ अर्थात् हे विद्वान् पुरुषों! हम न तो किसी की हिंसा करते हैं और न किसी को पथभ्रष्ट ही करते हैं, अपितु जैसा वेद कहता है उसी के अनुसार आचरण करते हैं। यही कारण है कि वेदों में सूक्ष्म से सूक्ष्म और बृहत् से बृहत् विषय को स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है, चाहे वह देवों से सम्बन्धित आचार व्यवहार हो या माता-पिता, पति-पत्नी, भृत्यादि के साथ किया गया व्यवहार। मा चिदन्यद्वि शꣳसत सखायो मा रिषण्यत। इन्द्रमित्स्तोता वृषणꣳ सचा सुते मुहुरुक्था च शꣳसत॥३ अर्थात् हे मित्र! सत्य के विपरीत मत बोलो। किसी को दुःख मत दो, कामनाओं १. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिक: १/१९ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिक: २/१७६ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिक: ३/२४२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
242 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की पूर्ति करने वाले ईश्वर की सम्मिलित स्तुति करो, जगत् में वेद मंत्रों का पाठ करो। सत्य ही ईश्वर है और ईश्वर ही सत्य है, इसीलिए सत्याचार ही जीवन का आदर्श होना चाहिए। दूसरों के प्रति दया का भाव, सहानुभूति और सहयोग की भावना, मानव व्यवहार के वह उजले पक्ष हैं जो एक मनुष्य को उच्चता की ओर ले जाते हैं। परि त्यः हर्यतः हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण। यो देवान् विश्वाँऽ इत् परि मदेन सह गच्छति॥१ अर्थात् "जो प्रसन्नता के साथ विद्वान् और अतिथियों की सेवा करता है उस कमनीय तथा भरण के योग्य मनुष्य को संसार के सभी उत्तम पदार्थ अपने उत्तम गुण के सहित प्राप्त होते हैं।" राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए उच्च चरित्र के नागरिकों की आवश्यकता होती है और सद्आचरण के लोगों के आचार-विचार में नैतिकता और मानवता का समावेश होना चाहिए। शिक्षा दर्शन - वैदिक शिक्षा पद्धति का प्रमुख उद्देश्य मानव की प्राकृतिक शक्तियों को सुविकसित कर उसे जीवन के सागर में आने वाले झंझावतों से लड़ने की शक्ति प्रदान करने में समर्थ बनाना था। शिक्षा का संबंध ब्रह्मचर्य आश्रम से भी है। उस समय विद्यार्थियों को ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचारिणी कहा जाता था। अपना सम्पूर्ण ध्यान केन्द्रित करके शिक्षा व विद्या ग्रहण करना ही इनका उद्देश्य था। वैसे ब्रह्मचर्य का प्रथम ब्रह्म शब्द वेद, तप और सत्य का वाचक है। तपस्या के अनुष्ठानपूर्वक वेद और सत्य का ज्ञान प्राप्त करना ही विद्यार्थी का धर्म था, जिससे वह मृत्यु तक पर विजय प्राप्त कर सके। शिक्षक और उपदेशक भी अपने अक्षुण्ण ज्ञान को निःस्वार्थ भाव से विद्यार्थियों को देने को अपना परम कर्तव्य समझते थे। सम्पूर्ण ज्ञान से जन-जन को शिक्षित करके समाज को सुशिक्षित बनाना उनके लिए प्रसन्नता का विषय होता था और वे भी अपने शिष्यों की दृष्टि में परम पूज्य गुरु होते थे। इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना। अयं वामह्वेऽवसे शचीवसू विशं विशंऽ हि गच्छथः॥२
१. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः १८/१६८१ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः ३/३०४
४. अध्याय ७-८: चरित्र-निर्माण, तपोमय जीवन, समाज-सहयोग एवं आधुनिक प्रासंगिकता
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 243 अर्थात् “हे अध्यापक और उपदेशक! दिव्यगुण चाहने वाले सभी लोग, ज्ञान को आश्रय देने वाले तुम दोनों को पुकारते हैं। मैं भी तुम दोनों का आह्वान करता हूँ। तुम लोग ज्ञान का उपदेश देने के लिए प्रजा के पास जाते हो।” अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अहः सना। दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्णा सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुतः हवम्॥२॥¹ अर्थात् “हे अध्यापक और उपदेशक! मैंने समस्त विद्याओं को आपसे पढ़ा है। सदा हमारे दुःख को दूर करने वाले, हिरण्य आदि का प्रयोग बताने वाले, परमेश्वर तक पहुँचाने वाले, मधुविद्या के ज्ञाता, आप लोग मेरी पुकार सुनें और मुझे संसार- सागर से पार लगावें।” शिक्षा से वंचित स्त्री व पुरुष के बारे में वैदिक काल में सोचना व्यर्थ ही है। गुरु को ईश्वर से साक्षात्कार कराने वाला स्वीकार किया गया है— गुरु बिन होय न ज्ञान। गुरु ही अज्ञानरूपी अंधकार को हटाकर उसमें ज्ञानरूपी प्रकाश का सूर्य चमकाता है और व्यक्ति उसी प्रकाश में जीवन को अच्छे विचारों से देखता एवं भोगता है। उस समय की शिक्षा मात्र ज्ञान के लिए ही नहीं अपितु सभी क्षेत्रों में इसका विकास था। शिल्प विद्या को भी प्रमुख स्थान दिया जाता था। आज का विज्ञान जो कुछ उपलब्ध करा रहा है उसकी रूपरेखा एवं उपस्थिति उस काल में भी थी। अश्विना वर्तिरस्मदा गोमद्दस्रा हिरण्यवत्। अर्वाग्रथः समनसा नि यच्छतम्॥² अर्थात् “हे शिल्प विद्या के पढ़ने और पढ़ाने वाले! शिल्पज्ञान के विघ्नों को दूर करने तथा समान मन वाले तुम लोग हमारे लिए गौ और सुवर्ण आदि की प्राप्ति का मार्ग दिखलाओं तथा हमें विमान आदि साधन भी प्रदान करों।” इसके साथ ही मनुष्यों को भी निर्देश दिया गया है कि वे अपने पुत्र-पौत्रों की शिक्षा के लिए विद्वान् आचार्य को ही नियुक्त करें। अग्निं वो वृधन्तमध्वराणां पुरूतमम्। अच्छा नप्त्रे सहस्वते॥³
१. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः १९/१७४४ २. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः १९/१७३४ ३. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ५/९४६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
244 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् "हे मनुष्यों! तुम लोग अपने पुत्र, पौत्र आदि को बलवान्, विद्वान्, बनाने के लिए शिक्षायज्ञ की वृद्धि करने वाले महान् विद्वान् आचार्य की सेवा में उपस्थित हो।" शिक्षा से ही चरित्र एवं व्यक्तित्व का निर्माण होता है। नागरिकों की शिक्षा और चरित्र से राष्ट्र की आधारशिला दृढ़ होती है। इससे व्यक्ति का योगदान देश व समाज के लिए उत्तम होता है। वैदिककालीन शिक्षा की भूमिका आज के सन्दर्भ में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। अर्थदर्शन- वैदिक युग में अर्थदर्शन आज के सन्दर्भ में भी उल्लेखनीय है। किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को सुचारु गति देने के लिए राष्ट्र की कृषि और खनिज सम्पदा का विशेष महत्त्व होता है। आर्थिक दृष्टि से पृथिवी के प्रति पूर्ण जागरुकता विद्यमान थी। अभ्यर्ष स्वायुध सोम द्विबर्हसः रयिम्। अथा नो वस्यसस्कृधि॥१ अर्थात् "हे मनुष्यों के रक्षक परमेश्वर ! तू हमें द्युलोक तथा पृथिवी पर फैले धन को प्राप्त करा और हमें उन्नत कर।" पृथिवी से प्राप्त खनिज पदार्थों से भी राष्ट्र की समृद्धि में वृद्धि होती है और पृथिवी अपने गर्भ में सुवर्ण, रजत और न जाने कितने खनिजों को छिपाये बैठी है, जो हमारे राष्ट्र की समृद्धि का प्रतीक है। इन सबके प्रति मोह वैदिक काल में कहीं भी परिलक्षित नहीं होता था- सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः। सोमा अर्षन्तु विष्णवे॥२ अर्थात् "हमारे शास्त्रीय विचार, विद्युत, वायु, जल, सुवर्ण आदि खनिज पदार्थ तथा यज्ञादि व्यापक परमेश्वर के ज्ञान के लिए हों।" आर्थिक दृष्टि से समृद्धि ही राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता में सहायक होती है क्योंकि आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न राष्ट्र आत्मनिर्भर होता है और विदेशी सहायता के लिए उसे पराश्रित नहीं होना पड़ता है। स्वयं की शान्ति का आधार देश का हर क्षेत्र में उन्नतिशील होना ही है। आज के सन्दर्भ में भी यही विषय विचारणीय है कि देश में उपलब्ध स्वदेशी वस्तुओं को प्रयोग करके आत्मनिर्भर बनें तथा अपने स्थान को विश्वमानचित्र में सम्मानीय बनाये रखें। १. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ७/१०५३ २. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ७/७६६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चम अध्याय 245 ६. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को सामवेद का प्रदेय- राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति हमारे प्राचीन वैदिक वाङ्मय से ही सुरक्षित है। यदि एक-एक पक्ष पर गूढ़ता से विचार किया जाय तो "मातृभूमि" को जननी माना जाता है। मातृभूमि या राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि होती है। इसके लिए भी वेदों में विचार किया गया है। महान्, सत्यनिष्ठा, सरलता, प्रचण्ड क्षात्र-तेज धर्मानुष्ठान एवं कर्त्तव्यपालन का गुण प्रत्येक शुभ कार्य को दक्षतापूर्वक सम्पन्न करना, ज्ञान और समर्पण की भावना "मातृभूमि" (राष्ट्र अथवा देश) को धारण अथवा पालन-पोषण करने में सक्षम होते हैं। वह मातृभूमि भूतकाल और भविष्य में तथा मध्य के आने वाले वर्तमानकाल के सकल पदार्थों की पालन करने वाली है। ऐसी वह मातृभूमि हमारी उन्नति के लिए अत्यन्त विस्तृत स्थान अथवा अवसर प्रदान करे। मातृभूमि के प्रति प्रेम व निष्ठा सिर्फ वर्तमान काल का ही विषय नहीं है, अपितु जब से पृथ्वी और मानव का अस्तित्व संज्ञान में आया तभी से मातृभूमि और उसके पुत्रों में अगाध प्रेम की भावना पाई जाती है। यह भावना ही देश की अखण्डता का प्रतीक है। मातृभूमि के शासन के लिए 'स्वशासन' और 'प्रजातंत्र' की अवधारणा आज आधुनिक काल की कल्पना नहीं है बल्कि इसका उल्लेख वैदिक साहित्य से ही प्राप्त हो चुका है। आ न इन्द्रो शातग्विनं गवां पोषः स्वाक्ष्म्यम्। वहा भगत्तिमूतये॥¹ अर्थात् हे परमेश्वर ! हमें रक्षा के लिए इन्द्रियों में सैकड़ों प्रकार के बल से युक्त पुष्टि, राष्ट्र का संगठन तथा मान-प्रतिष्ठा प्रदान कर। "इस मंत्र के द्वारा देश के प्रत्येक नागरिक के मन में व्याप्त विचारों का उद्घाटन होता है कि उसकी अपनी मातृभूमि के प्रति क्या भावनायें हैं?" देश की एकता और अखण्डता को चुनौती देने वालों के लिए मातृभूमि के साहसी पुत्रों द्वारा सिंहनाद करने का उल्लेख सामवेद में है- आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छाद्वि मातरम्। क उग्राः के ह शृण्विरे॥² अर्थात् 'शास्त्र विद्या में निपुण वीर शस्त्र हाथ में लेकर (मातृभूमि की प्रजा) से पूछे कि कौन-कौन देशद्रोही यहाँ निवास करते हैं?' १. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः ४/८३५ २. सामवेद भाषाभाष्ये- पूर्वार्चिकः २/२१६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
246 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यह उद्घोषणा इस बात का प्रतीक है कि देश की एकता एवं अखण्डता के प्रति हर सैनिक उस समय भी जागरूक था और उसी के अनुरूप आज भी देश की सीमाओं से लेकर आन्तरिक महत्त्वपूर्ण स्थलों पर तैनात सैनिक मातृभूमि के दुश्मनों के अस्तित्व को समाप्त करने के लिए संकल्पबद्ध है। इसमें देश में फैले या बाहर से प्रवेश करने को घात में बैठे शत्रुओं का दमन करना अत्यन्त आवश्यक हो गया है। इस बात का संकेत इस ग्रन्थ से प्राप्त हो चुका है। इस ग्रन्थ से इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि सभी राष्ट्रवासी देश रूपी शरीर का अभिन्न अंग है और किसी एक भी अंग के क्षतिग्रस्त या दूषित हो जाने पर जिस प्रकार सम्पूर्ण शरीर विकारग्रस्त हो जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र में भी यदि मतभेद रूपी विकार का समावेश हो जाता है तो वह राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के लिए घातक बन सकता है। सम्पूर्ण शरीर को स्वस्थ रहना आवश्यक है वह चाहे शारीरिक रूप से हो या मानसिक रूप से। व्याधियों को आश्रय देना ही नहीं चाहिए और न ही उनके प्रति असावधान होना चाहिए। इस बारे में निम्न पंक्तियों का उल्लेख प्रासंगिक है— यस्य ते नू चिदादिशं न मिनन्ति स्वराज्य न देवो नाध्रिगुर्जन॥१ अर्थात् यदि राज्य या राष्ट्र का आदर्श रूप में उसका संचालन किया जाये तो सूर्य की तरह अटल रह सकता है और प्रबलतम शत्रु या विरोधी भी किसी दशा में उसमें तनिक भी हानि पहुँचाने में समर्थ नहीं हो सकते हैं। आज भी देश में विद्यमान अनेकता में एकता का रहस्य यही है कि हम वैदिक काल से जिन संस्कारों को धारण करते आये हैं, वे परिष्कृत रूप में सदैव विद्यमान रहेंगे। १. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः-४/१३२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय अथर्ववेद में राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता का अनुशीलन अथर्ववेद में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के आधारतत्त्व : वेदों के अनुशीलन से हमें उस काल के राजनैतिक व्यवस्था के बारे में ज्ञान होता है। राज्य या राष्ट्र के बारे में तब विचार किया गया जब वैचारिक मतभेद के कारण विभिन्न राष्ट्रों के मध्य युद्ध की स्थिति प्रकट होने लगी और उस समय राजा और राष्ट्र के बारे में स्पष्ट रूप से विचार किया गया और उसका चयन किया गया। राष्ट्र का शासक राजा होता है लेकिन राष्ट्र की सम्पूर्ण शक्ति उसकी प्रजा में ही समाहित होती है। उसके लिए स्वराज्य की कल्पना की गई है जो अथर्ववेद में उल्लिखित है— नाम॒ नाम्ना॑ जोहवीति पु॒रा सूर्या॑त् पु॒रोषस॑:। यदुजः प्र॑थ॒मं संब॒भूव॒ स ह॒ तत् स्व॒राज्य॑मियाय॒ यस्मा॒न्नान्यत् पर॒मस्ति॒ भूतम्॥ १ अर्थात् "जो अज आदि से उत्पन्न हुआ, उसने उस स्वराज्य की प्राप्ति की जिससे दूसरा कोई भूत महत्तर नहीं है। स्वराज्य की उत्कृष्ट वरिमा और गरिमा यहाँ प्रकट हुई है। स्वराज्य से उच्चतम कुछ भी नहीं है। यह मंत्र भारतीय गणतंत्र के लिए भी राष्ट्रगान के रूप में संग्रहणीय है।" इस मंत्र के द्वारा राष्ट्र की संचालन विधि को उत्तम ढंग से किस तरह प्रयोग किया जा सकता है, उसका वर्णन किया गया है। राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के लिए राज्य संचालन की विधि से ही प्रजा संतुष्ट रहती है और राष्ट्र के प्रति सद्भाव, सद्विचार मनुष्य तभी रख पाता है जबकि वह अपने आपको सुरक्षित एवं शान्तिपूर्ण राजनैतिक स्थितियों में पाता है। राष्ट्रभक्तों या देश के वासियों के लिए कुछ कर्तव्य निर्धारित किये जाते हैं जिसमें राष्ट्र की एकता और अखण्डता का अस्तित्व सुरक्षित रहता है। दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि स्वराज्य में ही राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुरक्षित रहती है क्योंकि स्वशासन से ही स्वराष्ट्र का अस्तित्व बना रह सकता है। विदेशी शासन में चाहें जितनी उत्तम व्यवस्था क्यों न हो, स्वशासन से श्रेष्ठ किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता है। १. अथर्ववेद १०/७/३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 248 वैदिक वाङ्गय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता वैदिक काल में राष्ट्र के रक्षार्थ यज्ञादि कार्य सम्पन्न किये जाते थे और इन यज्ञों में राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति की कामना की जाती थी ताकि राष्ट्र को सभी ऐश्वर्य प्राप्त हो सकें और अपने अस्तित्व के लिए वह रक्षा में स्वयं सक्षम हो सकें। इ॒मं होमं॑ य॒ज्ञम॑वते॒मं सं॒स्त्रावेणा॒ उत॑। य॒ज्ञमि॒मं वर्ध॑यता॒ गिरः॑ संस्त्रा॒व्येण ह॒विषा॑ जुहोमि॥१ अर्थात् इस मंत्र के द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञों और होमों को सम्बोधित करके कहा गया है कि आप इस यज्ञ की, यज्ञकर्ता पुरुष की या यज्ञमय राष्ट्र की रक्षा करें और हे समस्त ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाले उपायों! तुम भी इस यज्ञपति और राष्ट्रपति की रक्षा करो। ऐसे राष्ट्र में राजा के बारे में भी यह आशा की जाती है कि वह राष्ट्रपालक हो। राष्ट्र का ठीक तरह से पालन होने से ही प्रजा उसके प्रति श्रद्धावान एवम् समर्पित होती है। यह समर्पण ही वह भावना है जो कि राष्ट्रवासियों के लिए और राष्ट्र के लिए बहुमूल्य होती है- बृह॒स्पतिः॒ समर्जय॒द् वसू॑नि म॒हो व्र॒जान् गोम॑तो दे॒व ए॒षः। अ॒पः सिषा॑स॒न्त्स्व॑ऽरप्रतीतो॒ बृह॒स्पति॒र्हन्त्य॒मित्र॑म॒र्कैः॥२ अर्थात् एक बृहत् राष्ट्र का पालक राजा ऐश्वर्यों आदि पर विजय प्राप्त करता है। इस विजय से वह गौ पशुओं से सम्पन्न बड़े समूहों पर विजय प्राप्त करता है। वह स्वयं किसी से भी विरोध द्वारा व्यवधान न डालने योग्य सुखमय और समृद्धिशाली राष्ट्र के समस्त कार्यों को सम्पन्न करता हुआ प्रजा के शत्रुओं का नाश करता है। इस तरह के राजा की छत्रछाया में प्रजा सदैव सुखी रहकर राष्ट्रहित के बारे में ही विचार करती है। कर्त्तव्यों और योग्यता एवं अपेक्षाओं को मात्र राजा से ही जोड़ा गया है। राजा तो राष्ट्र का संरक्षक होता है और प्रजा उसकी संरक्षित। राष्ट्र का अस्तित्व मात्र राजा से नहीं होता है, सदाचारी गुणवान् प्रजा का भी होना अत्यन्त आवश्यक है। इन्हीं के द्वारा राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का परिपालन होता है- स॒त्यं बृ॒हदृ॒तमु॒ग्रं दी॒क्षा तपो॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञः पृ॑थि॒वीं धार॑यन्ति। सा नो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य॒ पत्न्यु॒रुं लो॒कं पृ॑थि॒वी नः॑ कृणोतु॥३ १. अथर्ववेद ११/५/२ २. अथर्ववेद २०/९०/३ ३. अथर्ववेद १२/१/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 249 अर्थात् मातृभूमि के आदर्श भक्तों में कुछ गुणों का होना अत्यन्त आवश्यक है। जिस राष्ट्र में देशभक्त, सत्यनिष्ठ, प्रचण्ड, क्षात्रतेज, धर्मानुष्ठान एवं कर्तव्यपालन के गुण से युक्त प्रत्येक शुभ कार्य को दक्षतापूर्वक सम्पन्न करते हैं तथा यथार्थ ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना रखते हैं, मातृभूमि (राष्ट्र) के पालन-पोषण करने में समर्थ होते हैं, वे ही अपना भूत, वर्तमान और भविष्य में सब तरह से पोषित करने वाली मातृभूमि की रक्षा करके, उसकी उन्नति के विस्तृत स्थान एवं अवसर प्रदान करें। इन गुणों से ही राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को सबल आधार प्राप्त होता है। इन गुणों से युक्त राष्ट्रभक्तों पर राष्ट्र गर्व करता है और ऐसे राष्ट्रभक्तों से युक्त राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता की ओर शत्रु दृष्टिपात भी नहीं कर सकता है। राष्ट्र को, मातृभूमि को, अपनी माता ही माना जाता है और जन्मदात्री माँ से मातृभूमि अधिक सम्मान और त्याग की अधिकारिणी होती है। राष्ट्रभक्तों के लिए जन्मदात्री माँ सबके लिए अपनी होती है लेकिन मातृभूमि एक है और उसके करोड़ों पुत्र हों तो ऐसी माँ के लिए गर्व का विषय अवश्य ही होगा। उसकी उन्नति, समृद्धि एवं रक्षा की उदात्त भावना राष्ट्र-भक्तों में पाया जाना स्वाभाविक है- यत् ते॒ मध्यं॑ पृथि॒वि॒ यच्च॒ नभ्यं॒ यास्त॒ ऊर्ज॑स्त॒न्वः॑ संब॒भूवुः॑। तासु॑ नो धेह्य॒भि नः॑ पवस्व मा॒ता भूमिः॑ पु॒त्रो अ॒हं पृ॑थि॒व्याः। प॒र्जन्यः॑ पि॒ता स उ॑ नः पिपर्तु॥१ अर्थात् इसमें मातृभूमि से राष्ट्रभक्तों द्वारा प्रार्थना की गई है कि "हे मातृभूमि! हमें अपने विद्वान् पुत्रों को जो कि ज्ञान से परिपूर्ण हैं और इस पृथिवी का केन्द्र हैं, उनके संरक्षण में हमें देकर हमारी रक्षा कीजिए और उनसे ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान कीजिए। हे मातृभूमि! मैं धरा का पुत्र हूँ और आकाश मेरे पिता हैं। अतः आप हमारा सम्यक् पालन-पोषण करें।" मातृभूमि अथवा राष्ट्र एक माँ की तरह ही सम्माननीय होती है। जिस प्रकार जननी के सभी बच्चों में परस्पर भ्रातृत्व एवं स्नेह रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण मातृभूमि पर बसने वाले करोड़ों पुत्रों अर्थात् देशवासियों में परस्पर भ्रातृत्व की भावना का विकास होना चाहिए। समाज के सर्वश्रेष्ठ विद्वान्-जन समाज की रक्षा करें। इस तरह से नैतिक, विधिक और सामाजिक मूल्यों से युक्त समाज के नागरिकों में व्यास भ्रातृत्व का भाव ही राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का आधार हो सकता है। इसी भाव को अन्यत्र भी विवेचित किया गया है- १. अथर्ववेद १२/१/१२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
250 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता त्वज्जा॒तास्त्वयि॑ चरन्ति॒ मर्त्या॒स्त्वं बिभ॑र्षि द्विपद॒स्त्वं चतु॑ष्पदः। तवे॒मे पृ॑थिवि॒ पञ्च॑ मान॒वा येभ्यो॒ ज्योति॑र॒मृतं॒ मर्त्ये॑भ्य उद्यन्त्सूर्यो॑ र॒श्मिभि॑रा॒तनो॑ति॥१ अर्थात् हम समस्त जीवों को, जिसमें दो पैर और चार पैर वाले सभी प्राणियों का समावेश होता है, इसी भू-माता से उत्पन्न हैं और निरन्तर उनकी गोद में ही विद्यमान रहते हुए ही गतिशील होने में समर्थ हैं। वह ही हमारी पालक माँ है। इसीलिए प्रत्येक राष्ट्रभक्त को अपनी इस माँ के लिए मन में उत्तम विचार ही रखने चाहिए। इसके बिना एक क्षण भी जीवन धारण नहीं कर सकते। प्रत्येक राष्ट्रवासी को इस सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसके ही पुत्र एवं पुत्री हैं, इस कारण सब राष्ट्रवासी वास्तव में भाई-बहन ही नहीं अपितु सहोदर हैं। सबमें एकता का भाव ही राष्ट्र की एकता और अखण्डता का आधार हो सकता है। मातृभूमि पर कुदृष्टि डालने वाले शत्रुओं की कमी नहीं है। दूषित विचार वाले शत्रु समय-समय पर आक्रमण कर इसके विनष्ट करने में तथा इस पर अधिकार करने की कामना रखते हैं। ऐसे शत्रुओं का संहार करने में राजव्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था को सदैव चौकस रहना चाहिए। वीर राजा और राष्ट्रभक्त सैनिकों के संबल पर ही मातृभूमि स्वतंत्र और अखण्ड बनी रह सकती है। व्याकूतय एषामितार्थो चित्तानि मुह्यत। अथो॒ यदुद्यैषां॑ हृदि॒ तदे॑षां॒ परि॑ निर्जहि॥२ अर्थात् दुष्ट विचार वाले शत्रुओं के विचार हमारे राष्ट्र के लिए प्रतिकूल दिशा में जायें और वे अपने हित के प्रतिकूल चेष्टाएँ करें, जो उनके मन मोहयुक्त हो जावें और जो कुछ आज इनके मन में है वह इनमें पराभूत होने से नाश को प्राप्त हों। शत्रुओं की दुष्प्रवृत्तियों पर स्वमेव अंकुश लग जाना चाहिये। जिस मातृभूमि के लिए राष्ट्रभक्तों की अभेद्य रक्षापंक्ति रक्षा में संलग्न हो उसके शत्रु को उस दिशा में विचार करना भी पाप ही समझा जाय। ऐसे शत्रुओं का सामना करने वाले ऐसे वीरों का राष्ट्र अपनी एकता और अखण्डता के लिए प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए विवश नहीं है। अथर्ववेद में प्रस्तुत मंत्रों से इस बात को स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वैदिक काल से ही अखण्ड भारत की परिकल्पना का जो दृश्य प्रस्तुत किया गया है वह आज भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित है और यह आधार आज भी उतने ही १. अथर्ववेद १२/१/१५ २. अथर्ववेद ३/२/४
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 251 सुदृढ़ है जितने कि उस काल में वर्णित किये गये हैं। २. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में अथर्ववेद के समाज- दर्शन का अनुशीलन : वैदिक काल में सामाजिक जीवन पूर्ण रूप से नियमबद्ध ढंग से चलता था। व्यक्ति के जीवन का हर पक्ष नैतिकता और धर्म के निश्चित नियमों का पालन करता था। आदर्श समाज की धारणा प्रस्तुत करता था। समाज में लिङ्ग, वर्ण और वर्ग के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं पाया जाता था। सभी का निर्णय नीति के अनुसार ही किया गया था। (क) वर्ण व्यवस्था :- वर्ण व्यवस्था के बारे में कुछ विद्वानों में मतभेद भी पाया जाता है कि उस काल में वर्ण व्यवस्था थी या नहीं, लेकिन ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के १०वें मंत्र में चारों वर्णों की उत्पत्ति पुरुष के विभिन्न अंगों से मानी गई है और उसी के अनुरूप कार्य भी प्रदान किये गये थे। वैदिक काल में वर्णों के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी की उपस्थिति थी लेकिन इसका वर्गीकरण कर्ममूलक माना गया था जन्ममूलक नहीं। यदि ब्राह्मण को सम्माननीय कार्य व स्थान प्राप्त था तो क्षत्रियों को अपनी क्षमता के अनुरूप, वैश्य को उनकी क्षमता के और शूद्रों को भी उनकी क्षमता के अनुरूप कार्य प्रदान किया गया था और इसका कोई प्रतिबन्ध नहीं था कि ब्राह्मण शस्त्र धारण नहीं करता था, क्षत्रिय वाणिज्यक कार्य नहीं कर सकता था। शूद्र का कार्य निकृष्ट है, ऐसी कोई भावना उस काल में नहीं पाई जाती थी। शूद्रों का कार्य आज के अकुशल कर्मकार की श्रेणी में आता है। इनको समाज में सभी वर्णों की भाँति समकक्ष स्थान प्राप्त था। इसको अथर्ववेद के इस क्षेत्र मंत्र के द्वारा समझा जा सकता है- प्रि॒यं मां कृणु दे॒वेषु॑ प्रि॒यं राज॑सु मा कृणु। प्रि॒यं सर्व॑स्य॒ पश्य॑त॒ उत शू॒द्र उ॒तार्ये॑॥१ उस काल में शूद्र या वर्ण के लिये कोई निम्न स्थान निश्चित नहीं था बल्कि सभी को समाज में समान सम्मान प्राप्त था। (ख) आश्रम व्यवस्था :- वैदिक काल में शतायु मानव की कल्पना की जाती थी और वास्तव में वह शतायु होता था। धर्म और नीति के साथ जीवन व्यतीत करते १. अथर्ववेद १९/६२/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
252 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता हुए वह अपने जीवन को चार चरणों में बाँट देता था और हर चरण के लिये पृथक्- पृथक् आचार, विचार और नियमों का निर्माण किया गया था। जीवन प्रारम्भ के साथ ही ब्रह्मचर्य आश्रम आरम्भ होता था और उसका २५ वर्ष की आयु तक चलने का प्राविधान था, जिसमें वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्याध्ययन के लिए गुरु के समक्ष रहता था और विद्या ग्रहण करता था- ब्रह्म॒चारी॑ष्णंश्च॑रति॒ रोद॑सी उ॒भे तस्मि॑न् दे॒वाः संम॑नसो भवन्ति। स दा॑धार पृथि॒वीं दिवं॑ च॒ स आ॒चार्य॑ं१ तप॑सा पिपर्ति॥१ अर्थात् वेद के अध्ययन में दृढ़, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला ब्रह्मचारी, पृथिवी, माता-पिता, दोनों का अनुकरण करता हुआ अथवा अपने आचरण से दोनों का प्रिय होते हुए और स्वयं उनको प्रेम करते हुए इस पृथिवी पर विचरण करता है। उसमें समस्त देव, विद्वान् और राजा आदि एक चित्त हो जाते हैं। वह पृथिवी, माता-पिता, सूर्य, विद्या और गुरु सभी को धारण करता है। वह अपने तप से आचार्य की आज्ञाओं का पूर्ण पालन करता है। अर्थात् वह आचार्य की त्रुटियों को भी पूर्ण करता है। ब्रह्मचर्य की आयु के पश्चात् गृहस्थाश्रम का काल आरम्भ हो जाता है। यह आश्रम जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि लौकिक जीवन के सभी कर्त्तव्यों का आरम्भ और अन्त इसी आश्रम में है। ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर जिन दायित्वों को पूरा करने के लिए आदेशित किये गये हैं वह निम्न मंत्र में उल्लिखित है- सम॑स्मिँल्लो॒के स॒मु दे॑व॒याने॒ सं स्मा॑ सु॒मेतं॑ यम॒राज्ये॑षु। पू॒तौ प॒वित्रे॑रु॒प तद्व॑ध॑येथां॒ यद्यु॒द् रेतो॒ अधि॑ वां संब॒भूव॑॥२ अर्थात् "हे पति-पत्नी! तुम दोनों इस लोक में सदा एक साथ समान भाव से रहो! देव परमेश्वर की उपासना या मोक्ष मार्ग की साधना में भी सदा दोनों एकत्र रहो और निरन्तर साथ रहते हुए यम, नियन्ता तथा राम के समस्त राज्य के कार्यों अथवा यम गार्हपत्य के समस्त कार्यों में या परमात्मा के समस्त उपासना आदि कार्यों में, गृहस्थ के समस्त कार्यों में तुम दोनों समान भाव से एकत्र रहो। पुत्र उत्पत्ति होने पर उसे शुभ संस्कारों में पुष्ट करके, उसमें उत्तम संस्कारों को समावेशित करके, उसे शुभ गुणों से युक्त मानव बनाओ।" १. अथर्ववेद ११/७/१ २. अथर्ववेद १२/३/३
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय 253 इस गृहस्थाश्रम में ही व्यक्ति देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण को पूर्ण करता है। धर्म का पालन करते हुए सभी एषणाओं की पूर्ति करनी चाहिए। धार्मिक कृत्यों, अनुष्ठानों, यज्ञ आदि कर्म को भी सपत्नीक पूर्ण करना चाहिए। इसमें ही गृहस्थ धर्म की पूर्णता है। गृहस्थाश्रम के सभी दायित्वों के पूर्ण होने पर वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने की व्यवस्था है। वानप्रस्थाश्रम में मनुष्य सभी, इच्छाओं की पूर्ति के बाद प्रवेश करता है। इस आश्रम में वह घर के वरिष्ठ होने के नाते अपने संरक्षण में पुत्रों को गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराते हैं और स्वयं सपत्नीक अपना समय पूजा-पाठ आदि में घर में रहकर ही व्यतीत करते हैं। वानप्रस्थाश्रम गृह-निवास की अनुमति प्रदान करता है। वानप्रस्थाश्रम की अवधि पूर्ण होने पर व्यक्ति सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो जाता है और संन्यास आश्रम में प्रवेश करके वह गृह एवं पत्नी, पुत्र आदि सभी को त्याग देता है तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर आराधना, यज्ञ, जप, तप आदि में लीन हो जाता है। (ग) पुरुषार्थ - मनुष्य के लिए वैदिक काल में कार्य और कर्म भी निश्चित कर दिये गये थे। यही मानव जीवन के आधार थे। इन्हीं के अनुसार उसे सम्पूर्ण कार्य करने थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— यह चार पुरुषार्थ चतुष्टय कहलाते थे। यह व्यक्ति के लिए जीवनधर्म थे। धर्म का अनुपालन व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरे काल में करना होता था। उस काल में धर्म ही व्यक्ति को जीवन के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाता था। शेष पुरुषार्थों की पूर्ति भी वह धर्म के अनुसार ही करता था। अर्थ से वह अपने गृहस्थाश्रम की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था और इसको अर्जित करने के लिए भी ईमानदारी और सत्य का अनुसरण करते हुए ही प्रयास करता था ताकि वह धर्मपूर्ण धनोपार्जन कहला सके। अच्छे साधनों से अर्जित किये हुए धन से ही दान, यज्ञ आदि कार्य पूर्ण व सफल हो सकते थे। इनकी सार्थकता के लिए ही धर्म का अनुपालन आवश्यक है। काम पुरुषार्थ की पूर्ति के लिए वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है और सपत्नीक सन्तानोत्पत्ति, माता-पिता की सेवा, यज्ञ, दान, तप आदि कार्यों को पूर्ण करता है। यहाँ पर काम का सेवन अपनी वासनापूर्ति के उद्देश्य से नहीं किया जाता है। यह इसलिए पूर्ण किया जाता है कि उसे विवाह संस्कार के नियमों को पूर्ण करना है। सृष्टि के नियमानुसार उसकी उत्पत्ति में अपना अंशदान सृष्टि (सन्तति) करके करना है और अपने पितृ ऋण से उऋण होना है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 254 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मोक्ष पुरुषार्थ जीवन का अन्तिम लक्ष्य है और इसके लिए व्यक्ति को पहले सारे पुरुषार्थ धर्मानुसार पूर्ण करते हुये जीवन की लोकेषणा, वित्तेषणा और पुत्रेषणा से मुक्त होकर ही वह पहले वानप्रस्थ आश्रम और उसके बाद संन्यास आश्रम में प्रवेश करके अपना शेष समय ईश-आराधना, जप, तप और यज्ञ आदि में व्यतीत करते हुए मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है। (घ) नारी स्थिति - वेदकालीन समाज पितृमूलक समाज था लेकिन स्त्रियों की स्थिति में कहीं भी निम्नता का भाव प्रदर्शित नहीं होता था। स्त्रियों को भी पुरुषों की भाँति ब्रह्मचारिणी रहते हुए शिक्षा प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था। उसी को सरसता की प्रतिमूर्ति समझी जाता था। वह मात्र गृहस्थी की ही स्वामिनी नहीं थी अपितु अपने पति पर भी उसका पूर्ण स्वामित्व माना जाता था। गृहलक्ष्मी के रूप में उसका सर्वदा सम्मान था और हर कार्य में उसकी सम्मति ली जाती थी। आर्य नारियों में नैतिकता पूर्णतः विद्यमान थी। वे शोभन, आचरण तथा सदाचार के लिए सर्वथा प्रसिद्ध थी। धार्मिक कृत्यों में नारी का विशिष्ट स्थान था। पुरुष धार्मिक कृत्यों को पत्नी के बिना पूर्ण नहीं कर सकता था। निष्कर्ष यह है कि नारी का उदात्त चरित्र, नैतिक-आदर्श, शिक्षण-योग्यता तथा सामाजिक सहयोग की दृष्टि से उपनिषद्-युग अपने पूर्ववर्ती संहिता-युग से विशेष दूर नहीं था। पूर्ववर्ती युगों का 'आदर्श-नारी-जीवन' उसी प्रकार काम्य और कमनीय था। उपनिषदों के इतिहास में नारी चिरस्मरणीय रहेगी। (ङ) विवाह प्रथा - वैदिक काल में आदर्श विवाह प्रथा प्रचलित थी जहाँ स्त्री एवं पुरुष दोनों को ही समान स्थान प्राप्त था। वहाँ पर विवाह संस्कार में भी दोनों को वर या वधू चुनने का अधिकार भी प्राप्त था। बाल-विवाह जैसी प्रथा उस समय विद्यमान न थी। कन्या द्वारा पूर्ण यौवन प्राप्त करने के बाद ही विवाह सम्पन्न होता था। अथर्ववेद में विवाह के बारे में विशद् वर्णन किया गया है जिससे कि प्रकट होता है कि इस संस्कार में पिता, वर, वधू को किन-किन दायित्वों को पूर्ण करना पड़ता था और उनसे क्या अपेक्षाएँ की जाती थीं। इस बारे में इस मंत्र के द्वारा जाना जा सकता है कि विवाह के लिए पुरुष की योग्यता को कैसे मापा जा सकता था और नियंत्रित किया जाता था- उ॒द्य॑च्छ॒ध्वमप॑ रक्षो॑ हना॒त्ये॒मां नारीं॑ सु॒कृते॒ दधा॑त। धा॒ता वि॑पु॒श्चित्पति॑म॒स्यै वि॑वेदु॒ भगो॒ राजा॑ पु॒र ए॑तु प्रजान॒न्॥१ १. अथर्ववेद १४/१/५९ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar