वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 353 में से
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246 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यह उद्घोषणा इस बात का प्रतीक है कि देश की एकता एवं अखण्डता के प्रति हर सैनिक उस समय भी जागरूक था और उसी के अनुरूप आज भी देश की सीमाओं से लेकर आन्तरिक महत्त्वपूर्ण स्थलों पर तैनात सैनिक मातृभूमि के दुश्मनों के अस्तित्व को समाप्त करने के लिए संकल्पबद्ध है। इसमें देश में फैले या बाहर से प्रवेश करने को घात में बैठे शत्रुओं का दमन करना अत्यन्त आवश्यक हो गया है। इस बात का संकेत इस ग्रन्थ से प्राप्त हो चुका है। इस ग्रन्थ से इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि सभी राष्ट्रवासी देश रूपी शरीर का अभिन्न अंग है और किसी एक भी अंग के क्षतिग्रस्त या दूषित हो जाने पर जिस प्रकार सम्पूर्ण शरीर विकारग्रस्त हो जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र में भी यदि मतभेद रूपी विकार का समावेश हो जाता है तो वह राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के लिए घातक बन सकता है। सम्पूर्ण शरीर को स्वस्थ रहना आवश्यक है वह चाहे शारीरिक रूप से हो या मानसिक रूप से। व्याधियों को आश्रय देना ही नहीं चाहिए और न ही उनके प्रति असावधान होना चाहिए। इस बारे में निम्न पंक्तियों का उल्लेख प्रासंगिक है— यस्य ते नू चिदादिशं न मिनन्ति स्वराज्य न देवो नाध्रिगुर्जन॥१ अर्थात् यदि राज्य या राष्ट्र का आदर्श रूप में उसका संचालन किया जाये तो सूर्य की तरह अटल रह सकता है और प्रबलतम शत्रु या विरोधी भी किसी दशा में उसमें तनिक भी हानि पहुँचाने में समर्थ नहीं हो सकते हैं। आज भी देश में विद्यमान अनेकता में एकता का रहस्य यही है कि हम वैदिक काल से जिन संस्कारों को धारण करते आये हैं, वे परिष्कृत रूप में सदैव विद्यमान रहेंगे। १. सामवेद भाषाभाष्ये- उत्तरार्चिकः-४/१३२ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar