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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri षष्ठ अध्याय अथर्ववेद में राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता का अनुशीलन अथर्ववेद में निरूपित राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के आधारतत्त्व : वेदों के अनुशीलन से हमें उस काल के राजनैतिक व्यवस्था के बारे में ज्ञान होता है। राज्य या राष्ट्र के बारे में तब विचार किया गया जब वैचारिक मतभेद के कारण विभिन्न राष्ट्रों के मध्य युद्ध की स्थिति प्रकट होने लगी और उस समय राजा और राष्ट्र के बारे में स्पष्ट रूप से विचार किया गया और उसका चयन किया गया। राष्ट्र का शासक राजा होता है लेकिन राष्ट्र की सम्पूर्ण शक्ति उसकी प्रजा में ही समाहित होती है। उसके लिए स्वराज्य की कल्पना की गई है जो अथर्ववेद में उल्लिखित है— नाम॒ नाम्ना॑ जोहवीति पु॒रा सूर्या॑त् पु॒रोषस॑:। यदुजः प्र॑थ॒मं संब॒भूव॒ स ह॒ तत् स्व॒राज्य॑मियाय॒ यस्मा॒न्नान्यत् पर॒मस्ति॒ भूतम्॥ १ अर्थात् "जो अज आदि से उत्पन्न हुआ, उसने उस स्वराज्य की प्राप्ति की जिससे दूसरा कोई भूत महत्तर नहीं है। स्वराज्य की उत्कृष्ट वरिमा और गरिमा यहाँ प्रकट हुई है। स्वराज्य से उच्चतम कुछ भी नहीं है। यह मंत्र भारतीय गणतंत्र के लिए भी राष्ट्रगान के रूप में संग्रहणीय है।" इस मंत्र के द्वारा राष्ट्र की संचालन विधि को उत्तम ढंग से किस तरह प्रयोग किया जा सकता है, उसका वर्णन किया गया है। राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता के लिए राज्य संचालन की विधि से ही प्रजा संतुष्ट रहती है और राष्ट्र के प्रति सद्भाव, सद्विचार मनुष्य तभी रख पाता है जबकि वह अपने आपको सुरक्षित एवं शान्तिपूर्ण राजनैतिक स्थितियों में पाता है। राष्ट्रभक्तों या देश के वासियों के लिए कुछ कर्तव्य निर्धारित किये जाते हैं जिसमें राष्ट्र की एकता और अखण्डता का अस्तित्व सुरक्षित रहता है। दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि स्वराज्य में ही राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुरक्षित रहती है क्योंकि स्वशासन से ही स्वराष्ट्र का अस्तित्व बना रह सकता है। विदेशी शासन में चाहें जितनी उत्तम व्यवस्था क्यों न हो, स्वशासन से श्रेष्ठ किसी भी स्थिति में नहीं हो सकता है। १. अथर्ववेद १०/७/३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar