वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 248 वैदिक वाङ्गय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता वैदिक काल में राष्ट्र के रक्षार्थ यज्ञादि कार्य सम्पन्न किये जाते थे और इन यज्ञों में राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति की कामना की जाती थी ताकि राष्ट्र को सभी ऐश्वर्य प्राप्त हो सकें और अपने अस्तित्व के लिए वह रक्षा में स्वयं सक्षम हो सकें। इ॒मं होमं॑ य॒ज्ञम॑वते॒मं सं॒स्त्रावेणा॒ उत॑। य॒ज्ञमि॒मं वर्ध॑यता॒ गिरः॑ संस्त्रा॒व्येण ह॒विषा॑ जुहोमि॥१ अर्थात् इस मंत्र के द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञों और होमों को सम्बोधित करके कहा गया है कि आप इस यज्ञ की, यज्ञकर्ता पुरुष की या यज्ञमय राष्ट्र की रक्षा करें और हे समस्त ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाले उपायों! तुम भी इस यज्ञपति और राष्ट्रपति की रक्षा करो। ऐसे राष्ट्र में राजा के बारे में भी यह आशा की जाती है कि वह राष्ट्रपालक हो। राष्ट्र का ठीक तरह से पालन होने से ही प्रजा उसके प्रति श्रद्धावान एवम् समर्पित होती है। यह समर्पण ही वह भावना है जो कि राष्ट्रवासियों के लिए और राष्ट्र के लिए बहुमूल्य होती है- बृह॒स्पतिः॒ समर्जय॒द् वसू॑नि म॒हो व्र॒जान् गोम॑तो दे॒व ए॒षः। अ॒पः सिषा॑स॒न्त्स्व॑ऽरप्रतीतो॒ बृह॒स्पति॒र्हन्त्य॒मित्र॑म॒र्कैः॥२ अर्थात् एक बृहत् राष्ट्र का पालक राजा ऐश्वर्यों आदि पर विजय प्राप्त करता है। इस विजय से वह गौ पशुओं से सम्पन्न बड़े समूहों पर विजय प्राप्त करता है। वह स्वयं किसी से भी विरोध द्वारा व्यवधान न डालने योग्य सुखमय और समृद्धिशाली राष्ट्र के समस्त कार्यों को सम्पन्न करता हुआ प्रजा के शत्रुओं का नाश करता है। इस तरह के राजा की छत्रछाया में प्रजा सदैव सुखी रहकर राष्ट्रहित के बारे में ही विचार करती है। कर्त्तव्यों और योग्यता एवं अपेक्षाओं को मात्र राजा से ही जोड़ा गया है। राजा तो राष्ट्र का संरक्षक होता है और प्रजा उसकी संरक्षित। राष्ट्र का अस्तित्व मात्र राजा से नहीं होता है, सदाचारी गुणवान् प्रजा का भी होना अत्यन्त आवश्यक है। इन्हीं के द्वारा राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का परिपालन होता है- स॒त्यं बृ॒हदृ॒तमु॒ग्रं दी॒क्षा तपो॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञः पृ॑थि॒वीं धार॑यन्ति। सा नो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य॒ पत्न्यु॒रुं लो॒कं पृ॑थि॒वी नः॑ कृणोतु॥३ १. अथर्ववेद ११/५/२ २. अथर्ववेद २०/९०/३ ३. अथर्ववेद १२/१/१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar